विश्व हिन्दी सम्मेलन : इतिहास के झरोखों से

हिन्दी। हम सबकी भाषा। एक ऐसी भाषा जो अपने वर्चस्व को लेकर जितनी निश्चिंत है उतनी ही अस्तित्व के सवाल पर असमंजस में। कैसा विरोधाभास है कि भारत के कण-कण में व्याप्त होने के बाद भी भारत के ही कोने-कोने से उसकी अस्मिता के खिलाफ साजिश रची जा रही है। भारत के बाहर अपनी महक से निरंतर सौंधापन बढ़ाने वाली हिन्दी भारत के भीतर ही विकृत की जा रही है। लेकिन हिन्दी का सौभाग्य तब निखर जाता है जब विश्व हिन्दी सम्मेलन का अलग-अलग देशों में आयोजन होता है। > >
इतिहास के झरोखों से : विश्व हिन्दी सम्मेलन हिन्दी का सबसे भव्य अन्तर्राष्ट्रीय सम्मेलन है, जिसमें विश्व भर से हिन्दी भाषा के विद्वान, साहित्यविद्, प्रखर पत्रकार, भाषा शास्त्री, विषय विशेषज्ञ तथा हिन्दी को चाहने वाले जुटते हैं। यह सम्मेलन अब प्रत्येक चौथे वर्ष आयोजित किया जाता है।

वैश्विक स्तर पर भारत की इस प्रमुख भाषा के प्रति जागरुकता पैदा करने, समय-समय पर हिन्दी की विकास यात्रा का मूल्यांकन करने, हिन्दी साहित्य के प्रति सरोकारों को मजबूत करने, लेखक-पाठक का रिश्ता प्रगाढ़ करने व जीवन के विवि‍ध क्षेत्रों में हिन्दी के प्रयोग को प्रोत्साहित करने के उद्देश्य से 1975 से विश्व हिन्दी सम्मेलनों की श्रृंखला आरंभ हुई।

यह सम्मेलन प्रवासी भारतीयों के ‍लिए बेहद भावनात्मक आयोजन होता है। क्योंकि ‍भारत से बाहर रहकर हिन्दी के प्रचार-प्रसार में वे जिस समर्पण और स्नेह से भूमिका निभाते हैं उसकी मान्यता और प्रतिसाद भी उन्हें इसी सम्मेलन में मिलता है।

हिन्दी को सम्मानजनक स्थान दिलाने के लिए जब एक सुनियोजित, सुव्यवस्थित और स्वतंत्र मंच की आवश्यकता महसूस की गई तब इस परिकल्पना को सबसे पहले पूर्व प्रधानमन्त्री स्व.श्रीमती इंदिरा गांधी ने मूर्त रूप दिया।

पहला विश्व हिन्दी सम्मेलन राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के सहयोग से नागपुर में संपन्न हुआ जिसमें विनोबाजी ने संदेश भेजा था। तब से लेकर अब तक आठ विश्व हिन्दी सम्मेलन आयोजित हो चुके हैं- मॉरीशस, नई दिल्ली, मॉरीशस, त्रिनिडाड व टोबेगो, लंदन, सूरीनाम और न्यूयार्क में। नौवां विश्व हिन्दी सम्मेलन 22 से 24 सितंबर 2012 तक में आयोजित हुआ। इस बार भारत की ह्रदयस्थली की राजधानी भोपाल में 10 से 12 सितंबर 2015 को आयोजित होने जा रहा है। 


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