इथियोपिया की लोककथाएं यानी अफ्रीका का पंचतंत्र

Author सुशोभित सक्तावत|
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दुनिया के पहले मनुष्यों की उत्पत्त‍ि इथियोपिया में हुई थी, यह एक सर्वमान्य तथ्य है। ऐसे में क्या आश्चर्य की दुनिया की सबसे पहली कहानियां भी इथियोपिया में ही उपजी हों। ने हाल ही में दो खंडों में इथियोपिया की कहानियों का एक संकलन प्रकाशित किया है और यह अनेक मायनों में एक महत्वपूर्ण सूचना है।
 
कम ही लोग जानते हैं कि इथियोपिया अफ्रीका का इकलौता ऐसा देश है, जिसके पास अपनी स्वयं की लिपि है। शेष सभी मुल्क अपनी भाषाएं लिखने के लिए रोमन लिपि का प्रयोग करते हैं। और इसका कारण भी स्पष्ट है। जहां समूचा अफ्रीका ही औपनिवेशिकता से ग्रस्त रहा है, वहीं इथियोपिया ही ऐसा देश है, जिस पर कभी किसी औपनिवेशिक ताक़त का राज नहीं रहा, बशर्ते इटली के पांच साल के एक छोटे-से उपनिवेश-‍काल को हटा दें तो। इसका यह भी अर्थ है कि इथियोपिया की स्थानीय लोकसंस्कृति पाश्चात्य हस्तक्षेप से बहुत कुछ मुक्त रही है और उसके सामूहिक अवचेतन पर औपनिवेशिकता का दबाव सबसे कम है।
 
प्रभात प्रकाशन इन दिनों "देश विदेश की लोककथाएं" शीर्षक से विश्व की लोककथाओं का एक संकलन तैयार कर रहा है, जिसमें 600 से अधिक कहानियां संकलित की जा चुकी हैं। इनमें अफ्रीका की लोककथाओं को वहां के क्षेत्रों के अनुपात में पांच भागों में बांटा गया है। इथियोपिया, नाइजीरिया, घाना, तंज़ानिया और दक्षिण अफ्रीका की लोककथाएं इनमें बहुतायत में हैं।
 
भारत में पंचतंत्र, हितोपदेश की कहानियां पढ़-सुनकर हम बड़े हुए हैं। जातक कहानियां भी हमारे मानसिक परिवेश का हिस्सा रही हैं। बाद के सालों में जंगल बुक्स की कहानियां भी इनका हिस्सा बन गईं। इन कहानियों का एक विशेष तत्व होता है : पशुओं के संसार का मनुष्य की दृष्ट‍ि से अवलोकन। इन कहानियों के पशु मनुष्यों की तरह सोचते, बोलते और व्यवहार करते हैं। हम कभी नहीं जान सकते कि पशुओं का सामूहिक अवचेतन कैसा होता है और स्वयं को व्यक्त करने के उनके तरीक़े क्या हैं, और शायद यही कौतूहल हमें ये कहानियां रचने के लिए प्रेरित करता है। और ऐसा केवल बाल साहित्य में ही नहीं होता, जॉर्ज ओरवेल के एनिमल फ़ार्म में भी वैसा देखा जा सकता है।
 
इथियोपिया की ये कहानियां भी पंचतंत्र या हितोपदेश से भिन्न नहीं हैं। वैसी ही सरसता, वैसी ही सुरुचि और वैसा ही बोध। हर कहानी के अंत में एक सीख है, एक ज़रूरी सबक़ है। अत्यंत सरल सुबोध शैली में इन कहानियों को अनूदित किया गया है और आवश्यक सूचनाएं पाद-टिप्पणियों के रूप में अंग्रेज़ी में दी गई हैं, जिन्हें आप हर पृष्ठ पर पाएंगे। बाल साहित्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए पूरी किताब में सुरुचिपूर्ण रंगीन चित्रों का संकलन किया गया है और ग्लेज़ पेपर पर उम्दा छपाई की गई है। 
 
80-90 के दशक के बच्चे अमर चित्रकथा, टिंकल, चंपक आदि बाल पत्रिकाओं के साथ बड़े हुए थे। लेकिन आज की पीढ़ी मोबाइल फ़ोन, गेम्स और गैजेट्स के साथ बड़ी हो रही है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है, क्योंकि गैजेट्स की यह दुनिया बच्चों के कल्पनालोक को गहरे अर्थों में क्षति पहुंचाती है। कहना ना होगा, प्रभात प्रकाशन ने एक ज़रूरी हस्तक्षेप के रूप में इन लोककथाओं का यह संकलन प्रकाशित किया है और इन्हें हमारे बच्चों के हाथों तक अवश्य पहुंचना चाहिए।
 
इथियोपिया को "लैंड ऑफ़ थर्टीन मंथ्स ऑफ़ सनशाइन" कहा जाता है, क्योंकि यहां के साल में 12 नहीं 13 महीने होते हैं। यानी 30-30 दिन के 12 महीने और 5-6 दिन का 13वां महीना। इस अनूठे देश की कहानियों का यह संकलन हर अभिभावक को अपने बच्चों को भेंट करना चाहिए।
 
पुस्तक : "इथियोपिया की लोककथाएं" : खंड 1 और 2
प्रकाशक : प्रभात प्रकाशन 
संकलनकर्ता : सुषमा गुप्ता
मूल्य : 500 रुपए (दोनों खंड)
पृष्ठ : 240 रंगीन और सचित्र पृष्ठ (दोनों खंड)
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