बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी

बेटी की यादों में पिता

Book review
ND
'की बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी' लगभग दो-तीन दर्जन सफल फिल्मों और धारावाहिकों की पटकथा एवं संवाद लेखिका का अपने पिता सुप्रसिद्ध अमृतलाल नागर के संबंध में लिखे गए संस्मरणों का संग्रह है। इन संस्मरणों में उन्होंने अपने होश संभालने से लेकर पिता की मृत्यु तक के विभिन्न कालखंडों का जीवंत चित्रण किया है। चित्रण की इस जीवंतता के कारण ही यह अत्यंत पठनीय और रुचिकर बन पड़ी है। इसमें अमृतलाल नागर के लेखकीय और गैर-लेखकीय दोनों व्यक्तित्व बखूबी उभर कर सामने आए हैं। यह लेखिका के रचनात्मक कौशल का कमाल है।

इन संस्मरणों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि ये संस्मरण एक बेटी का अपने साहित्यकार पिता के प्रति भावुक उद्गार नहीं है बल्कि इनमें उन्हीं पक्षों को उठाया गया है जिनका महत्व निजी के साथ-साथ सार्वजनिक भी हो। घटनाओं के चयन संबंधी इस लेखकीय विवेक के कारण ये संस्मरण स्थायी महत्व के हो गए हैं।

के सामान्य पाठक, विद्यार्थी, गंभीर अध्येता आदि सबके लिए इन संस्मरणों में कुछ न कुछ है। चूँकि ये संस्मरण बीसवीं सदी के एक महत्वपूर्ण रचनाकार पर हैं इसलिए इसकी साहित्यिक महत्ता तो स्वयंसिद्ध है ही। अमृतलाल नागर ने हिंदी साहित्य को कई अनमोल उपन्यास दिए। इन संस्मरणों से उन उपन्यासों की रचना प्रक्रिया की सारगर्भित जानकारी मिलती है। 'बूँद और समुद्र', 'मानस का हंस', 'नाच्यो बहुत गोपाल', 'खंजन नयन' आदि उपन्यासों के पात्रों और इन उपन्यासों के लिखे जाने के कारणों की पुख्ता जानकारी इन संस्मरणों के माध्यम से हमारे सामने आती है।

नागर जी अपने एक-एक उपन्यास के पीछे काफी फील्डवर्क करते थे। वे अपने उपन्यासों को शब्दों से रचते भर नहीं थे बल्कि उसे पूरी तरह जीते भी थे। रचनात्मक कर्म और जीवन को वे इस हद तक एकाकार करते थे कि तुलसीदास के जीवन पर आधारित 'मानस का हंस' लिखते समय उन्होंने अपनी पत्नी से झगड़ा किया और अलग ही रहकर उपन्यास लिखा ताकि 'रत्ना' के विरह की ईमानदार छवि उतारी जा सके।

इसी तरह 'बूँद और समुद्र' के लेखन के सात-आठ वर्ष पूर्व ही उन्होंने आगरा, लखनऊ के गली मोहल्लों के बालकों, जवानों और बूढ़ों से बातें करके 'ताई' के जादू-टोने का संसार बना-बसा लिया था। 'नाच्यो बहुत गोपाल' का वास्तविक हरिजन संसार रचने के लिए वे महीनों तक हरिजन बस्ती में जाकर रहें। आज जब ड्राइंग रूम में बैठकर ही रचना लिखने का चलन आम हो चुका है वहाँ यह ध्यान रखने की जरूरत है कि नागर जी ने आर्थिक असुरक्षा के बीच जीते हुए भी रचनात्मक कर्म की ईमानदारी से कभी समझौता नहीं किया।

शायद यही कारण है कि आर्थिक अभावों के बावजूद अमृतलाल नागर ने कई क्लासिक रचनाएँ दीं जबकि आज लेखकीय समृद्धि के बावजूद कोई क्लासिक रचना नहीं हो पा रही है। यह पुस्तक मूल रूप से तो संस्मरण है लेकिन लेखिका ने घटनाओं को इस तरह संजोया है कि कई बार यह कृति लेखिका की आत्मकथा लगने लगती है। हालाँकि, लेखिका इसके प्रति बहुत सतर्क है फिर भी कहीं-कहीं फोकस अमृतलाल नागर पर कम लेखिका के अपने जीवन पर अधिक हो गया है। बावजूद इसके इस पुस्तक को हिंदी के कुछ श्रेष्ठ संस्मरणों की सूची में रखा जा सकता है।

पुस्तक : अमृतलाल नागर की बाबूजी-बेटाजी एंड कंपनी
लेखिका : अचला नागर
प्रकाशक : किताबघर, नई दिल्ली
ND|
दिनेश कुमार
मूल्य : 195 रुपए


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