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पर्यावरण संरक्षण व प्रकृति प्रबंधन में नारी की भूमिका



डॉ. साधना सुनील विवरेकर 
प्रकृति मूक, सहनशील व गंभीर है लेकिन हद से अधिक छेड़छाड़ वह पसंद नहीं करती। उसके धैर्य व सहनशीलता को उसकी कमजोरी समझने की भूल हम बरसों से कर रहे हैं लेकिन याद रखें कि वह लाचार नहीं, वह अपना प्राकृतिक न्याय अवश्य करती है। उसकी न्याय प्रक्रिया प्रारंभ हो चुकी है। कहीं भयंकर बाढ़ तो कहीं सूखा, कभी ज्वालामुखी तो कभी भूकंप। इन्हें प्रकृति की चेतावनी समझ हमें क्षमायाचना प्रारंभ करनी चाहिए, उसे हरियाली ओढ़नी का उपहार देकर वह सहृदया स्नेही उदारमना मां शायद हम बच्चों की मूर्खता को भूल समझ माफ करे।
 
को स्वस्थ व स्वच्छ बनाने, प्रकृति के प्रबंधन के घटक जल, वायु, वसुधा व नभ के आदान-प्रदान में सहायक बन उसके संरक्षण में नारी की भूमिका अहम हो सकती है क्योंकि वह स्वयं संवेदनशील, समझदार, दूरदर्शी व स्नेह प्रेम की मूर्ति होती है। मां, बहन, बेटी या पत्नी के रूप में वह अपने बच्चों, भाइयों, पिताओं या पतियों की सबसे बड़ी हितचिंतक होती है साथ ही वह इस प्रकृति मां के अति दोहन व शोषण की पीड़ा को भी अच्छे से समझ सकती है। इसलिए वह हर रूप में हर व्यक्ति को पर्यावरण व के संस्कार बड़ी आसानी से दे सकती है।
 
आज आवश्यकता है कि जन-जन में पर्यावरण के प्रति संवेदना जागृत हो, प्रकृति से सहज जुड़ाव बढ़े, तभी पर्यावरण को दूषित करने वालों के प्रति आक्रोश होगा व हम स्वप्रेरणा से स्वयं के हित में प्रयास करेंगे। यह संस्कार नारी ही दे सकती है। प्रकृति के कोप से बचने के लिए, भावी पीढ़ी को विरासत में स्वस्थ पर्यावरण देने व प्रकृति को पुनः समृद्ध बनाने कुछ प्रयास प्राथमिकता समझ होने चाहिए।
 
1. हम अपनी मां से सबसे अधिक प्यार करते हैं और उसे विभिन्न अवसरों पर उपहार दे उसे प्रसन्न करने का प्रास करते हैं। वैसे ही प्रकृति की हरियाली लौटा पेड़-पौधों का अधिक से अधिक रोपण व संरक्षण कर धरती मां को खुश करना होगा।
 
2. पानी का अपव्यय रोकने का हर संभव प्रयास हो।
 
3. पेट्रोल आदि का किफायती उपयोग करने के लिए "पूल-कार" की आदत बनाए।
 
4. अपने घर आंगन में पेड़-पौधों के साथ पशु-पक्षियों के लिए दाना-पानी रखकर उनके प्रति संवेदना दिखाएं।
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