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#अधूरीआजादी : काश! नेहरू ने 62 के युद्ध में इसराइल के सामने शर्त न रखी होती...

डोकलाम विवाद के बीच के एक प्रमुख सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स ने एक बार फिर सीधे-सीधे मोदी सरकार को चेतावनी जारी कर दी है। सरकारी अखबार ने लिखा है कि मोदी सरकार भारत को जंग की ओर धकेल रही है। यह कोई छोटा मोटा आरोप नहीं है और अगर स्थिति बिगड़कर 1962 में चीन के साथ युद्ध से पहले और बाद की हो गई तो अखबार ने यहां तक कहा कि युद्ध होने की स्थिति में नतीजा जगजाहिर है।
 
संभव है कि हम अपने आत्मसंतुष्ट रवैए के कारण ऐसा न सोचें तो चीनी अखबार ने साफ-साफ लिखा कि डोकलाम में भारतीय सेना पीछे नहीं हटी तो युद्ध तय है और जंग होने पर नतीजा जगजाहिर है। चीनी अखबार की दंभोक्ति के साथ यह भी कहा है कि भारत ही नहीं, चीन ने भी अपनी सेना को 50 साल में सबसे मजबूत बताया है। 
 
हम भले इस तथ्य को स्वीकारें या नहीं कि चीन भारत से बड़ी सैन्य ताकत है, लेकिन कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार के संपादकीय में यह भी लिखा गया है कि मोदी सरकार अपने ही लोगों से झूठ बोल रही है कि 2017 वाला भारत 1962 से अलग है। पिछले 50 सालों में दोनों देशों की ताकतों में बहुत अंतर आया है। अगर मोदी सरकार युद्ध करना चाहती है तो उसे कम से कम अपने देश के लोगों को सच्चाई बतानी चाहिए? इसमें कोई भी गलत बात नहीं है कि नेहरू से अलग मोदी को भी अपने देश के लोगों को बताना चाहिए कि अगल चीनी सैनिक डोकलाम में कोई अल्पकालिक, अस्‍थायी या कामचलाऊ उपाय अपनाते हैं कि इसके मुकाबले पर भारत की क्या योजना होगी?
 
भारत और चीन के बीच 1962 में एक बडा युद्ध हुआ था जो कई दिनों तक चला। और उस युद्ध में तीन हजार से ज्यादा भारतीय सैनिकों की जान गई। इस युद्ध में चीन ने भारत को बुरी तरह हरा दिया क्योंकि भारत के सैनिकों की संख्या चीन के सैनिकों के सामने बहुत कम थी। फिर भी भारतीय सैनिकों ने डटकर मुकाबला किया था। उस समय भारत में कांग्रेस की सरकार थी और पंडित जवाहरलाल नेहरु भारत के प्रधानमंत्री थे। अगर चीन अब भी हमें 1962 के युद्ध की याद दिला कर नीचा दिखाने की कोशिश करता है तो उसका कारण भी साफ है क्योंकि भारत की हार के बहुत सारे कारण थे? लेकिन सबसे बडा कारण थे जवाहरलाल नेहरू। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू कुछ बड़ी गलतियां नहीं करते तो नतीजा कुछ और होता।
 
भारत की हार का जो पहला कारण था उसको जानकर आप को हैरानी होगी। प्रधानमंत्री और 'कार्यपालक रक्षामंत्री नेहरू' ने अपने एक दूर के रिश्तेदार को मिलिट्री सलाहकार बनाया था जिनका नाम जनरल बीएम कौल था। उन्हें सेना और उसकी जरूरतों सहित युद्ध के बारे में कुछ भी जानकारी नहीं थी। नेहरू ने अपने रिश्तेदारों को सेना के जिम्मेदार पदों के लिए चुन लिया। इसका परिणाम हुआ भारत की हार और इस वजह से नेहरू को काफी आलोचना का सामना भी करना पड़ा।
 
इन सभी बातों के अलावा अपने सैन्य अधिकारियों को पर्याप्त अधिकार देने के पक्ष में नहीं थे जबकि यह युद्ध लगभग 14000 फुट की ऊंचाई पर लड़ा गया था जिसमें लगभग 3968 सैनिकों ने अपने देश के लिए लड़ते हुए जान गंवा दी थी। नेहरू पर यह भी आरोप लगा कि नेहरू ने सेना को लड़ने के लिए ज्यादा अधिकार नही दिए। सेना को लड़ने के लिए उचित और पर्याप्त मात्रा में गोला-बारूद भी नहीं मिल पाया। स्वाभाविक है कि भारतीय सेना, चीन के सामने कमजोर पड़ गई। इस युद्ध की हार की वजह से भारत का कैलाश मानसरोवर नामक स्थान चीन ने अपने हिस्से में ले लिया। 
 
इस बीच एक और महत्वपूर्ण परिवर्तन हुआ और 1962 के युद्ध के समय देश हमारी मदद करने के लिए तैयार था, लेकिन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इसराइल के सामने ऐसी शर्त रख दी की उस का खामियाजा हमें अब तक भुगतना पड़ रहा है। दरअसल जब चीन ने भारत पर धोखे से हमला कर दिया था तो इसराइल भारत की मदद करने के लिए आगे आया। लेकिन उस समय में भी नेहरू ने एक शर्त रख दी। नेहरू ने कहा इसराइल से आने वाले हथियारों पर इसराइल की मार्किंग नहीं होनी चाहिए और इसराइल से आने वाले जहाजों पर इसराइल का झंडा नहीं होना चाहिए। 
 
स्वाभाविक है कि इसराइल के तत्कालीन प्रधानमंत्री को यह बात पसंद नहीं आई और उन्होंने भारत की मदद करने से मना कर दिया। अगर नेहरू यह शर्तें नहीं रखते तो भी भारत की जीत पक्की थी। लेकिन हमारे देश के प्रधानमंत्री और तत्कालीन कार्यवाहक रक्षामंत्री नेहरू ने इस मामले में अपने रक्षामंत्री वीके कृष्णामेनन की सिफारिशों को दरकिनार कर दिया। वास्तव में नेहरू के साथ मुश्किल यह थी कि वे प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ रक्षामंत्री, वित्तमंत्री और पूरी कैबिनेट ही खुद थे।   
 
इनमें से पंडित नेहरू की थोड़ी बहुत आदतें वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मेल खाती हैं और वे भी परिणामों की ज्यादा चिंता नहीं करते हैं। वैसे भी आत्मतुष्ट भारतीय भारत-चीन युद्ध के परिणामों, निष्कर्षों के बारे में जानना भी नहीं चाहते हैं। 
 
एक ऑस्ट्रेलियाई पत्रकार नेविल मैक्सवेल ने इस युद्ध से संबंधित गोपनीय हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट को हासिल किया है, लेकिन यह अभी भी रक्षा सचिव के कमरे की आलमारियों में कैद है। डोकलाम सीमा विवाद को लेकर क्या भाजपा सरकार, कांग्रेस या किसी भी नेता ने इस रिपोर्ट को पढ़ने की उत्सुकता जाहिर की? नहीं क्योंकि हम भारतीय अपनी गलतियों से नहीं सीखते हैं और दूसरी-दूसरी गलतियां करते रहते हैं?
 
इस रिपोर्ट के अनुसार तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की सरकार ने चीन से लगे सीमावर्ती इलाकों में ‘फॉरवर्ड पॉलिसी’ अपना रखी थी। इसके तहत उन इलाकों में सुरक्षा चौकियां बना दी गईं, जिन पर चीन अपना दावा करता था। इस मामले पर रक्षामंत्री कृष्णामेनन की रिपोर्ट ठीक उल्टी थी, लेकिन नेहरू ने किसी की नहीं सुनी। भारतीय सेना ने इन क्षेत्रों में गश्त भी शुरू कर दी थी। इससे चीन भड़क गया और उसने भारत पर हमला कर दिया। 
 
मैक्सवेल ने सोमवार को अपनी वेबसाइट पर कथित रूप से उस रिपोर्ट के 100 पन्ने प्रकाशित किए हैं। हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट एक विश्लेषण है। भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल हेंडरसन ब्रूक्स और ब्रिगेडियर ने यह विश्लेषण किया था। इन दोनों अफसरों ने भारत-चीन युद्ध से जुड़े विभिन्न पहलुओं की पड़ताल की थी। इसमें उस वक्त के राजनीतिक और सैन्य ढांचे पर कई विपरीत टिप्पणियां की गई हैं।
 
मैक्सवेल का कहना है कि हेंडरसन ब्रूक्स रिपोर्ट रक्षा मंत्रालय में रक्षा सचिव के कक्ष में रखी तिजोरियों में 51 साल से कैद है। तब से लेकर आज तक कई प्रधानमंत्री, रक्षामंत्री और रक्षा सचिव इसे पढ़ चुके हैं। उसे पढऩे के बाद ‘बेहद नाजुक’ बताकर इसे वापस तिजोरी में रख देते हैं और इस पर किसी तरह की कार्रवाई की जरूरत नहीं समझी जाती। 
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