पाकिस्तान का दोहरा चरित्र कभी विश्वसनीय नहीं हो सकता

Pakistan
इस सप्ताह की आधारशिला रखकर ने भारत और दुनिया को यह दिखाने की कोशिश की कि पाकिस्तान अमन पसंद है, अन्य धर्मों का सम्मान करता है और वह भारत के साथ दोस्ताना संबंधों की शुरुवात करना चाहता है। भारतवासी सामान्य तौर पर बहुत भावुक और किसी पर भी जल्दी से विश्वास करने वाले होते हैं अतः ऐसे किसी भी भले कदम के पीछे वे किसी साजिश की कल्पना नहीं करते। जानते हुए भी कि दुश्मन पर विश्वास करके हमने एक नहीं अनेक बार धोखे खाए हैं।

पीठ पर खंजर खाने की कहानियों से पिछले सत्तर साल का इतिहास भरा पड़ा है किन्तु हमारे संस्कार हैं कि दुश्मन को हर बार एक नया मौका देना चाहते हैं। हम यदि अधिक पीछे भी न जाएं तो लाहौर घोषणा पत्र के तुरंत पश्चात् कारगिल का धोखा हुआ, आगरा शिखर सम्मलेन के बाद संसद पर हमला, इंडो-पाक व्यापार वार्ता के पश्चात मुंबई हमला, मोदी शरीफ स्को शिखर सम्मेलन के पश्चात उधमपुर/ गुरुदासपुर हमला और फिर मोदीजी की पाकिस्तान यात्रा के तुरंत बाद पठानकोट हमला इत्यादि मात्र पिछले बीस वर्षों की दरिंदगी की कहानी है। संकेतों के अनुसार भारत की वर्तमान सरकार अब किसी नए प्रयोग करने के मूड में दिखाई नहीं देती है क्योंकि इतने आघात सहने के बाद भारत समझ चुका है कि पाकिस्तान पर विश्वास करना अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारना है।

भारत अब किसी और आतंकी हमले की जोखिम नहीं उठाना चाहता। इसमें कोई संदेह नहीं कि पाकिस्तान की नीति अभी तक यह रही है कि आतंक को इतना बढ़ाओ कि भारत को वार्ता की मेज़ पर आने के लिए मजबूर होना पड़े। इस नीति को तोड़ने के लिए भारत ने पाकिस्तान के आतंकी मंसूबों को दुनिया के सामने बार-बार उजागर किया और उसे दुनिया से अलग-थलग करने में सफलता प्राप्त की। परिणामतः पश्चिमी देशों द्वारा दी गई वित्तीय सहायता (दान) में कमी आई या बंद कर दी गई। उसके मित्र देशों में सेंध लगाई। कश्मीर से बहने वाले पानी को रोककर पाकिस्तान को घुटने पर लाने की कोशिश की।

कश्मीर में आतंकियों का दृढ़तापूर्वक सफाया किया जा रहा है। वैसे ही सीमा पर भारतीय सेना ने इतना तूफान मचा रखा है कि आजकल पाकिस्तान की तरफ से बिना वजह गोलीबारी करने की ख़बरें लगभग बंद हैं। इस तरह विभिन्न क्षेत्रों में भारत ने पाकिस्तान पर जो दबाव बनाया है उससे पाकिस्तानी सेना की आतंकी गतिविधियों पर लगाम कस चुकी है। पाकिस्तान इस स्थिति से बाहर आना चाहता है और उतावला है वार्ता की मेज़ पर आने के लिए जबकि भारत को कोई जल्दी नहीं है। पाकिस्तान कितना धर्मनिरपेक्ष है हमें मालूम है।

अन्य धर्मों के नागरिकों के साथ वहां कैसा सलूक किया जाता है किसी से छुपा नहीं है, तो फिर अचानक उसके मन में सिक्ख धर्म के लिए यह सम्मान क्यों आया? क्योंकि वह भारत के दबाव को किसी तरह कम करना चाहता है। दुनिया को मालूम है कि इमरान खान सेना की कठपुतली हैं और जब तक वे उसकी पसंद रहेंगे तब तक तो सेना उनका साथ देगी किन्तु जिस दिन सेना की आंख से उतरे, उनकी हालत भी पुराने प्रधानमंत्रियों की तरह हो जाएगी। उपरोक्त पृष्ठभूमि में करतार सिंह साहब कॉरिडोर के शिलान्यास समारोह में देश के सेनाध्यक्ष मौजूद होने का तर्क समझ में आता है। हमने अपने यहां तो कभी प्रधानमंत्री को किसी धार्मिक कार्यक्रम में सेनाध्यक्ष को साथ ले जाते नहीं देखा।

दूसरी ओर खालिस्तानी समर्थकों को इस समारोह के लिए आमंत्रण भी पाकिस्तान के दोहरे चरित्र को उजागर करता है। धर्म स्थल पर अपने भाषण में इमरान ने जो कश्मीर का राग अलापा वह सीधा-सीधा सेना की मंशा की ओर इशारे करता दिखता है। जाहिर है निष्कर्ष सीधा है। भारतवासियों को इस कॉरिडोर को लेकर बहुत आशाएं बांधने की आवश्यकता नहीं है और न ही अपनी ओर से किसी दबाव को कम करने की। दुनिया में आज तक कभी ऐसा नहीं हुआ कि किसी दो दुश्मन देशों द्वारा किसी धार्मिक या ऐतिहासिक स्थल खोल देने मात्र से संबंधों में सुधार हुआ हो। भारत को अपनी रीढ़ की हड्डी सीधी रखनी होगी। यदि उसने जरा सी भी शिथिलता दिखाई तो सीमा पर बैठी पाक सेना मौके की तलाश में है।

हम जानते हैं कि पाकिस्तान की सेना भारत का डर दिखाकर ही अपना महत्‍व पाकिस्तान में बनाए हुए है। उसे तो आतंकियों को सीमा पार भेजना ही है क्योंकि भारत के साथ मैत्री, पाकिस्तान की सेना और उसके अधिकारियों के व्यक्तिगत हितों के विरुद्ध है और भारत के रक्षा विशेषज्ञ ये अच्छी तरह समझते हैं कि इमरान खान और सिद्धू तो पाकिस्तानी सेना द्वारा इस्तेमाल किए जा रहे हैं। उनकी व्यक्तिगत मंशा से पाक सेना को कोई लेना-देना नहीं है।


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