कृषि संभावनाओं का दोहन करे चंबा...



- कुलभूषण उपमन्यु

चंबा को देश के पिछड़े 115 जिलों में शामिल करने के बाद से पिछड़ेपन को दूर करने के लिए चर्चाएं शुरू हो रही हैं। केंद्र सरकार द्वारा विशेष योजनाओं पर भी कार्य आरंभ होगा। चंबा जिले का पिछड़े जिलों में चयन न तो कोई उपलब्धि है और न ही शर्म की बात।
अब अगला कदम यह होना चाहिए कि सभी संबंधित पक्ष समन्वित प्रयास करें और जिले को इस स्थिति से बाहर निकालने का प्रयास करें। चंबा में बीआरजीएफ और वनबंधु योजना के अंतर्गत कुछ प्रयास हुए भी हैं किंतु जल्दबाजी, गंभीरता के अभाव और अधूरी समझ से बनाए गए कार्यक्रमों के चलते अपेक्षित फल प्राप्त नहीं हो सके। फिर भी जो कुछ हुआ, उसका सही आकलन करना और उसके आधार पर अगली दिशाओं की समझ बनाने की जरूरत है।
पुराने कार्यक्रमों में हुई उपलब्धियों और गलतियों का विशेषज्ञों द्वारा आकलन किया जाना चाहिए ताकि पुरानी गलतियों से बचते हुए नई सकारात्मक दिशाओं की पहचान की जा सके। इसी आधार पर भविष्य के लिए व्यावहारिक कार्यक्रम बनाए जा सकते हैं और स्थायी परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।

हमें ढांचागत सुविधाओं और लक्षित समूहों की आय संवर्धन गतिविधियों में संबंधों को समझकर ही आय-सृजन उत्पादक अवसर पैदा करने होंगे ताकि जरूरतमंद लोग अपने पैरों पर खड़े हो सकें। चंबा में 54 प्रतिशत परिवार गरीबी रेखा से नीचे हैं, उनके अलावा भी काफी बड़ा वर्ग सीमांत पर खड़ा है। 90 प्रतिशत आबादी गांवों में बसती है और कृषि पर निर्भर है इसलिए कृषि की ओर ध्यान देना पहली प्राथमिकता होना स्वाभाविक ही है। औसत जोत 8-9 बीघा के आस-पास है, 50 प्रतिशत जोतें तो 2-3 बीघा ही हैं। ऐसे में कृषि को पूर्णकालिक व्यवसाय नहीं माना जा सकता है।
कृषि के सहयोगी व्यवसाय पशुपालन, भेड़-बकरी पालन, मुर्गीपालन, मछलीपालन, की अपार संभावनाएं हैं। कृषि और इन सहयोगी व्यवसायों के समन्वय के गंभीर प्रयासों से प्रभावी बदलाव की दिशा में ऐसा पहला कदम निश्चित रूप से उठाया जा सकता है। जिले में 54 प्रतिशत के लगभग चरागाह भूमि है। यह और के लिए बड़ा संसाधन है। यह संसाधन खरपतवारों के आक्रमण और चीड़ के अत्यधिक रोपण से नष्टप्राय: हो चुका है। इसे विकसित करने के लिए लंबे समय चक्र की भी जरूरत नहीं है। खरपतवार नष्ट करके उन्नत घास रोपण से 2 वर्ष में परिणाम प्राप्त हो सकते हैं।

खेती के तरीकों, जैविक कृषि और जीरो बजट खेती की दिशा में बढ़कर खेती को लाभदायक बनाया जा सकता है। इसके लिए उन्नत किस्म के देशी पशुओं पर ध्यान देना पड़ेगा। साहीवाल, सिन्धी, थारपारकर, गिर जैसी नस्लें आसानी से 5 से 10 किलो दूध दे सकती हैं जबकि इनकी क्षमता 20 से 40 किलो प्रतिदिन पाई गई है। जैविक खेती के लिए देशी नस्लों का गोबर और गोमूत्र ही उपयोगी है। इनके गोबर में सूक्ष्म जीवाणुओं की संख्या यूरोपीय नस्लों के मुकाबले 50 गुना ज्यादा पाई गई है। इसी से यह गोबर जल्दी सड़ता है और अच्छा खाद दे सकता है।
गोमूत्र से भी उत्कृष्ट जीवाश्म खाद बनाई जा सकती है। इनका दूध भी ए-2 किस्म का होता है, जो अधिक गुणवत्ता वाला होता है। ऑस्ट्रेलिया में यह दूध दूसरे के मुकाबले दुगनी कीमत पर बिकता है। जिले में दूध की खपत काफी है। ट्रकों के हिसाब से दूध और दुग्ध पदार्थ रोज बाहर से आ रहे हैं। इतनी चरागाह भूमि होने के कारण हमें तो दूध निर्यातक क्षेत्र होना चाहिए। भेड़-बकरियों के लिए उनके उपयुक्त झाड़ियों वाले वन पनपाने चाहिए। वनबंधु योजना में यह काम किया जा सकता था। बकरियों की मांग मांस के लिए लगातार बढ़ रही है। राजस्थान से भी बकरियां लाई जा रही हैं। यहां बकरीपालन को बढ़ावा देकर सबसे सीमांत भूमियों पर भी लोगों को लाभकारी व्यवसाय दिया जा सकता है।
जिले में ग्रामीण भूमिहीनों की संख्या के 14,450 परिवार हैं। संभवत: ये सबसे गरीब लोग हैं। इनमें से जो कृषि कार्य में रुचि और योग्यता रखते हों, उन्हें गुजारेयोग्य भूमि दी जानी चाहिए। शेष भूमिहीनों को कौशल विकास का विशेष लक्षित समूह मानकर प्रशिक्षित किया जाना चाहिए। इसमें कुछ स्वरोजगार से जुड़े कौशल हो सकते हैं और कुछ व्यावसायिक मांग के अध्ययन के आधार पर चिन्हित किए जा सकते हैं।
कृषि क्षेत्र में केवल धान, मक्का व गेहूं तक ही सीमित नहीं रहा जा सकता। छोटी जोतों के चलते यह फसल चक्र गुजारे योग्य आय जुटाने में सक्षम नहीं बचा है इसीलिए खेत खाली पड़ते जा रहे हैं। बंदर और सूअर भी खेती को घाटे की ओर धकेलते जा रहे हैं। इनका नियंत्रण करके कुछ वैकल्पिक नकदी फसलों को फसल चक्र में शामिल करना होगा। इस कार्य के लिए उद्यान विभाग, आयुर्वेद विभाग और हिमालयन जैव प्रौद्योगिकी संस्थान पालमपुर का संयुक्त कार्यसमूह बनाया जाना चाहिए। इस समूह के हवाले बेमौसमी सब्जी, सुगंधित एसेंशियल तेल, औषधीय जड़ी-बूटियों के तेल, जड़ी-बूटी खेती और बागवानी का कार्य सौंपा जा सकता है।
जैव प्रौद्योगिकी संस्थान, पालमपुर के पास कुछ अच्छी तकनीकें हैं और कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण द्वारा मूल्य संवर्द्धन के गुर भी हैं। इनके लिए अलग विशेष परियोजना बनाकर काम हो और इन उत्पादों की बिक्री व्यवस्था खड़ी करने का कार्य भी साथ जोड़ा जाए तो वैकल्पिक आय के स्रोत पैदा हो सकते हैं।

इस क्षेत्र में ध्यान देने योग्य बात यह है कि कृषि का वैकल्पिक मॉडल, मुख्य धारा कृषि पद्धति में लागू करने योग्य हो जिससे कि कोई बड़ा बदलाव लाया जा सके। ऐसे मॉडल न खड़े किए जाएं, जो सीमांत किसानों की पहुंच से बाहर हों और टिकाऊ भी न हों। ऐसा अनुभव हम पौली हाउस खेती में कर चुके हैं। उपलब्ध तकनीकों के क्षेत्रीय ट्रॉयल लगाने और नए शोध के लिए बजट उपलब्ध करवाया जाए जिसके अनुभवों के आधार पर आगे बड़े पैमाने पर प्रसार कार्य किया जा सके।
कृषि उत्पादों के प्रसंस्करण के लिए जगह-जगह छोटे-छोटे उद्योग लगाए जाएं, जिसके लिए कुशल कार्यकर्ता स्थानीय स्तर पर तैयार किए जाएं। चंबा में उपलब्ध निश उत्पादों (जो केवल यहीं हो सकते हैं) जैसे पांगी की ठांगी (हैजल नट), चिलगोजा, भरमौर के राजमाह और चिलगोजा, मिलेट्स, भटियात की बासमती के लिए उपयुक्त प्रोत्साहन और बिक्री व्यवस्था की जाए। चुराह तहसील और चंबा के साहो-जडेरा क्षेत्रों के बराबर स्वादिष्ट मक्की मिलना दुर्लभ है। इससे कुछ उत्पाद बनाने के लिए उद्योग स्थापित हों। ऐसे उद्योगों का लाभ आम आदमी तक पंहुचेगा।
सीमेंट जैसे उद्योगों का तो हो-हल्ला ज्यादा होगा लेकिन लाभ तो कुछ समृद्ध लोगों तक ही पहुंच पाएगा। बीपीएल श्रेणी या अन्य मध्यम श्रेणी के परिवार ट्रक डालकर कहां कमा पाएंगे, उल्टा उनकी कृषि भूमियां और चरागाह संसाधन उनके हाथ से निकल जाएंगे। औद्योगिक विकास के लिए कृषि प्रसंस्करण और जैव उत्पाद प्रसंस्करण को ही प्राथमिकता दी जाए और इन उत्पादों की बिक्री व्यवस्था के लिए विशेष सेल का गठन किया जाए तो कृषि क्षेत्र अपने हिस्से का योगदान विकास में दे सकता है। (सप्रेस)
(कुलभूषण उपमन्यु स्वतंत्र लेखक हैं व हिमालय नीति अभियान के अध्यक्ष हैं।)


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