साहेब बीवी और गैंगस्टर 3 : फिल्म समीक्षा

तिग्मांशु धुलिया के नाम के आगे जहां हासिल, साहेब बीवी और गैंगस्टर और पान सिंह तोमर जैसी उम्दा फिल्में दर्ज हैं तो दूसरी ओर इसी निर्देशक ने बुलेट राजा, राग देश और शागिर्द जैसी कमजोर फिल्में भी दी हैं। यानी तिग्मांशु धुलिया अभी भी विश्वसनीयता नहीं बना पाए। साहेब बीवी और गैंगस्टर सीरिज की फिल्में उन्होंने देखने लायक बनाई थीं। हालांकि पहले पार्ट की तुलना में दूसरा पार्ट थोड़ा कमजोर था, फिर भी तीसरे पार्ट से उम्मीद थी क्योंकि यह तिग्मांशु का चिर-परिचित मैदान था, लेकिन इस बार तिग्मांशु ने बुरी तरह निराश किया।

बस, इस सीरिज को आगे बढ़ाना था इसलिए यह फिल्म बना दी गई। इस सीरिज की खासियत रहस्य, षड्यंत्र, डबल क्रॉस, धोखा है, लेकिन तीसरे पार्ट में सिर्फ बोरियत है। उन्हीं किरदारों को लेकर एक कमजोर सी कहानी लिख दी गई जो बिलकुल भी अपील नहीं करती। हैरत तो इस बात पर है कि इस तरह की कहानी पर फिल्म बनाने की हिम्मत ही कैसे की गई?

साहेब और बीवी के किरदार तो तय हैं, गैंगस्टर बदलता रहता है और यही किरदार अलग रंग लिए रहता है। पहले पार्ट में यह किरदार रणदीप हुड्डा ने निभाया था और दूसरे भाग में इरफान खान ने। तीसरे पार्ट में संजय दत्त 'गैंगस्टर' के रूप में नजर आए हैं। इस किरदार को ठीक से नहीं लिखा गया है और संजय दत्त ने भी बहुत ही बुरी एक्टिंग कर मामले को और बिगाड़ दिया है।

दो घंटे बीस मिनट की इस फिल्म में दो घंटे बोरियत से भरे हुए हैं। स्क्रीन पर चल रहे ड्रामे में बिलकुल भी रूचि पैदा नहीं होती। न यह मनोरंजक है और न ही इसमें कोई उतार-चढ़ाव। क्या हो रहा है? क्यों हो रहा है? इस बात में दर्शकों की कोई रूचि नहीं रहती। निर्देशक और लेखक क्या बताना चाहते हैं, समझ ही नहीं आता। आखिरी के बीस मिनट में जरूर थोड़ा रोमांच पैदा होता है, लेकिन तब तक फिल्म देखने की इच्छा ही खत्म हो जाती है। बीस मिनट के रोमांच के लिए दो घंटे तक बोर होना महंगा सौदा लगता है।

फिल्म की कहानी में भी कई झोल हैं। संजय दत्त और उनके पिता के संबंध क्यों खराब हैं, यह बताया ही नहीं गया है। संजय दत्त की अपने भाई से भी क्यों नहीं बनती, इसका जवाब भी नहीं मिलता। क्लाइमैक्स में 'रशियन रौलेट' नामक खेल के आधार पर जीत-हार का फैसला करना भी समझ से परे है। इतनी बड़ी समस्या न तो जिमी शेरगिल के सामने रहती है और न ही संजय दत्त के सामने की वे जिंदगी को दांव पर लगा दें। वो भी उस शख्स के कहने पर जो धोखा देने के लिए बदनाम है। इस तरह की कमियां फिल्म को और कमजोर बनाती है।

संजय चौहान के साथ मिलकर तिग्मांशु न तो ढंग की स्क्रिप्ट लिख पाए और निर्देशक के रूप में भी उन्होंने निराश किया है। तीसरे पार्ट में वे अपनी ओर से कुछ भी नया नहीं दे पाए। फिल्म का पहला घंटा उन्होंने बरबाद किया और अपनी बात कहने में बहुत ज्यादा समय लगाया। उन्हें बड़ा बजट और बड़ा सितारा मिला, लेकिन यह फिल्म की बेहतरी के कुछ काम नहीं आया। कबीर बेदी, नफीसा अली, दीपक तिजोरी, सोहा अली खान के किरदारों पर उन्होंने कोई मेहनत नहीं की और ये सब अधूरे से लगते हैं।

अभिनय में जिमी शेरगिल और माही गिल ने अपनी चमक दिखाई। साहेब के रोल में जो एटीट्यूड चाहिए उसे जिमी ने हर फिल्म में सही पकड़ा है। बीवी के रूप में माही गिल ने एक बार फिर दमदार अभिनय किया है। संजय दत्त के अभिनय को देख ऐसा लगा कि उनकी यह फिल्म करने में कोई रूचि नहीं थी। चित्रांगदा सिंह का रोल महत्वहीन है। दीपक तिजोरी, कबीर बेदी और नफीसा अली निराश करते हैं। सोहा अली खान सिर्फ नाम के लिए फिल्म में थीं।

फिल्म का संगीत बेदम है। एडिटिंग बेहद लूज़ है। सिनेमाटोग्राफी और अन्य तकनीकी पक्ष औसत दर्जे के हैं।

देखने से बेहतर है इसका पहला पार्ट फिर एक बार देख लिया जाए।

निर्माता : राहुल मित्रा, तिग्मांशु धुलिया
निर्देशक : तिग्मांशु धुलिया
संगीत : राणा मजूमदार, अंजन भट्टाचार्य, सिद्धार्ध पंडित
कलाकार : संजय दत्त, माही गिल, जिमी शेरगिल, चित्रांगदा सिंह, सोहा अली खान, कबीर बेदी, नफीसा अली, दीपक तिजोरी, ज़ाकिर हुसैन
सेंसर सर्टिफिकेट : केवल वयस्कों के लिए * 2 घंटे 20 मिनट 12 सेकंड
रेटिंग : 1.5/5

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