रईस : फिल्म समीक्षा

शराबबंदी का मुद्दा इस समय भारत के कुछ प्रदेशों में गरमाया है। कुछ राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए इसे अहम मानते हैं। गुजरात में वर्षों से मदिरा पर रोक है, बावजूद इसके वहां पर चोरी-छिपे पच्चीस हजार करोड़ रुपये की शराब साल भर में पी जाती है। बिना भ्रष्ट पुलिस ऑफिसर्स और नेताओं के ये संभव नहीं है। माफियाओं और भ्रष्टों को इसके जरिये एक व्यवसाय हाथ लग गया है और (शाहरुख खान) जैसे लोग इस शराबबंदी की ही देन है जो अवैध रूप से शराब पियक्कड़ों तक पहुंचाते हैं। रईस की कहानी गुजरात के एक तस्कर से प्रेरित है, हालांकि फिल्म से जुड़े लोग इसे नकारते हैं। शायद उन्होंने किरदार और कुछ वास्तविक घटनाओं को लेकर कुछ कल्पना के रेशे अपने तरफ से डाल दिए हो। 
फिल्म की कहानी अस्सी के दशक में सेट है। जब टीवी ब्लैक एंड व्हाइट से रंगीन हो रहा था। रईस बेहद गरीब परिवार से है और चश्मा खरीदने के पैसे भी उसके पास नहीं है। उसकी मां की बात 'कोई धंधा छोटा या बुरा नहीं होता' उसके दिमाग में बैठ जाती है। बचपन से ही वह शराब की बोतल एक जगह से दूसरी जगह ले जाना शुरू कर देता है। जवान होते ही वह खुद का धंधा करने की सोचता है ताकि ज्यादा माल कमा सके। वह अवैध शराब के व्यवसाय को बुरा नहीं मानता क्योंकि इससे किसी का बुरा नहीं होता। 
 
देखते ही देखते नेताओं और पुलिस के संरक्षण में रईस खूब पैसा कमा लेता है। पुलिस ऑफिसर मजमूदार (नवाजुद्दीन सिद्दीकी) बेहद ईमानदार और अवैध शराब का व्यापार करने वालों का काल है, लेकिन रईस उसके हाथ नहीं लगता। हर बार वह मजमूदार को आंखों में धूल झोंक देता है। जब मजमूदार उस पर भारी पड़ता है तो रईस उसका ट्रांसफर तक करा देता है। का बिल की फिल्म स मीक्षा पढ़ने के लिए क्लिक करें
 
रईस से हारना मजमूदार को पसंद नहीं आता। वह दूसरे शहर से भी रईस पर निगाह रखता है। पैसा कमा कर रईस रॉबिनहुड जैसा व्यवहार करने लगता है। इससे उसकी लोकप्रियता बढ़ जाती है और वह नेताओं की आंखों की किरकिरी बन जाता है। धीरे-धीरे रईस को समझ आता है कि वह नेताओं के हाथ की कठपुतली बन गया है। मुसीबत में घिरे रईस से ऐसी गलती हो जाती है कि मजमूदार उसकी जान के पीछे पड़ जाता है। 
 
फिल्म को आशीष वाशी, नीरज शुक्ला और हरित मेहता ने लिखा है। स्क्रिप्ट में दर्शाया गया है कि किस तरह नेता और पुलिस अपने हित साधने के लिए रईस जैसे अपराधियों का भी इस्तेमाल करते हैं। इसे शराबबंदी, दंगों और बम ब्लॉस्ट से जोड़ा गया है। बॉलीवुड में इस तरह कई फिल्में आ चुकी हैं, लेकिन 'रईस' की स्क्रिप्ट इस तरह लिखी गई है कि दोहराई गई चीजों को एक बार फिर स्क्रीन पर देखना अच्छा लगता है। कई उतार-चढ़ाव स्क्रिप्ट में दिए गए हैं, जो दर्शकों की फिल्म में रूचि बनाए रखते हैं। बॉलीवुड कमर्शियल फिल्मों के मसाले यहां संतुलित नजर आते हैं। जोरदार संवाद, एक्शन, हीरो की अकड़, चोर-पुलिस का खेल फिल्म को रोचक बनाते हैं। 
 
फिल्म में कई ऐसे सीन हैं जिन पर तालियां और सीटियां बजती हैं। मसलन रईस की एंट्री, मजमूदार की एंट्री, मजमूदार और रईस के बीच डायलॉगबाजी, लैला गाने के बीच दिखाए गए एक्शन दृश्य, रईस के बचपन के दृश्य, मजमूदार द्वारा रईस का ट्रक पकड़ना और उसमें से चाय का गिलास निकलना, जयराज की घड़ी रईस द्वारा लौटाना, जैसे कई दृश्य फिल्म को लगातार धार देते रहते हैं। 
 
फिल्म के एक्शन सीन भी जबरदस्त हैं। हालांकि खून-खराबा ज्यादा है जिसे कुछ दर्शक नापसंद भी करे, लेकिन एक्शन दृश्यों के लिए सिचुएशन अच्छी बनाई गई है। फिल्म का पहला हाफ शानदार है। तेज गति से भागती फिल्म और रईस का किरदार छाप छोड़ता है। चोर-पुलिस का खेल रोचक लगता है, लेकिन सेकंड हाफ में फिल्म खींची हुई लगने लगती है जब रईस अपने आपको मसीहा बनाने की कोशिश करता है। यहां पर फिल्म ट्रेक से छूटने लगती है।  
 
रईस का रोमांटिक ट्रेक कमजोर है। यह फिल्म में नहीं भी होता तो खास फर्क नहीं पड़ता। शायद रोमांस के बादशाह कहलाए जाते हैं इसलिए रोमांस को महत्व दिया गया है, लेकिन यह अधूरे मन से रखा गया है। गाने चूंकि लोकप्रिय नहीं हैं इसलिए फिल्म देखते समय व्यवधान उत्पन्न करते हैं। अच्छी बात यह है कि इन स्पीड ब्रेकर्स के बीच अच्छे दृश्य आ जाते हैं और फिल्म को संभाल लेते हैं। कुछ लोगों को यह भी शिकायत हो सकती है कि एक अपराधी को फिल्म महामंडित करती है, हालांकि मनोरंजन की आड़ में यह बात दब जाती है।  
 
फिल्म का निर्देशन राहुल ढोलकिया ने किया है। राहुल ने इसके पहले 'लम्हा' जैसी बुरी फिल्म बनाई थी। यहां पर उन्हें बड़ा कैनवास और सुपरस्टार का साथ मिला है। फिल्म की कहानी साधारण है, लेकिन राहुल का जोरदार प्रस्तुतिकरण फिल्म को देखने लायक बनाता है। कहानी अस्सी के दशक की है इसलिए राहुल ने कही-कही अपना प्रस्तुतिकरण उस दौर की फिल्मों जैसा भी रखा है, जैसे हीरो का बचपन दिखाया गया है। पहले, जैसे भागते हुए बच्चे, वयस्क बन जाते थे, वैसे ही यहां पर मोहर्रम में मातम बनाता हुआ हीरो जवान हो जाता है। सुपरस्टार की छवि को देखते हुए और उनके प्रशंसकों को खुश करने के लिए राहुल ने रईस के किरदार पर काफी मेहनत की है। उनकी यह कोशिश कामयाब भी रही है कि फिल्म देखने के बाद दर्शकों को रईस याद रहता है। शाहरुख की खासियत को निर्देशक ने बखूबी उभारा है। फिल्म के अंत में वे रईस के किरदार को एक हीरो का रूप देने में भी सफल रहे हैं।  
 
फिल्म के संवाद शानदार हैं। 'दिन और रात तो लोगों के होते हैं, शेरों का तो जमाना होता है' जैसे कई संवाद सुनने को मिलते हैं। राम संपत का बैकग्राउंड म्युजिक उल्लेखनीय है। गाने जरूर कमजोर हैं। पुराने गाने 'लैला' में अभी भी दम है और यही ऐसा गीत है जो देखने और सुनने में अच्छा लगता है। फिल्म की सिनेमाटोग्राफी बहुत बढ़िया नहीं कही जा सकती है।  
 
शाहरुख खान ने जिस तरीके से पिछली कुछ फिल्में की थीं उनके चयन पर उंगलियां उठने लगी थीं। इस बार शाहरुख खान ने कुछ हद तक शिकायत को दूर किया है। बहुत दिनों बाद वे देशी फिल्म में नजर आए हैं। वे अक्सर उन किरदारों में अच्छे लगते हैं जिसमें ग्रे शेड्स होते हैं। यहां पर शाहरुख अपने अभिनय और स्टारडम के बल पर पूरी फिल्म का भार उठाते हैं। पठानी सूट, चश्मा, आंखों में काजल और दाढ़ी  उनके किरदार पर सूट होती है। बनिये का दिमाग और मियां भाई की डेअरिंग उनके अभिनय में झलकती है। माहिरा खान दिखने में औसत हैं, लेकिन उनका अभिनय अच्छा है। 
 
पुलिस ऑफिसर के रोल में नवाजुद्दीन सिद्दीकी का अभिनय जबरदस्त है। खासतौर पर उनके संवाद बोलने की शैली दाद देने लायक है। वे स्क्रीन पर जब भी आते हैं छा जाते हैं। शाहरुख के दोस्त के रूप में जीशान अली अय्यूब, अतुल कुलकर्णी, नरेंद्र झा सहित तमाम कलाकारों का काम बढ़िया है। 'लैला' गाने में आकर सनी लियोन माहौल को गरमा देती हैं। 
 
रईस की कहानी रूटीन जरूर है, लेकिन इसमें दर्शकों को खुश करने का भरपूर मसाला है। 
 
बैनर : एक्सेल एंटरटेनमेंट, रेड चिलीज़ एंटरटेनमेंट 
निर्माता : फरहान अख्तर, रितेश सिधवानी, गौरी खान 
निर्देशक : राहुल ढोलकिया
संगीत : राम संपथ 
कलाकार : शाहरुख खान, माहिरा खान, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, शीबा चड्डा, मोहम्मद ज़ीशान अय्यूब, अतुल कुलकर्णी, सनी लियोन (आइटम नंबर)    
सेंसर सर्टिफिकेट : ए * 2 घंटे 24 मिनट 
रेटिंग : 3.5/5 

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