काबिल : फिल्म समीक्षा

बदला फिल्मों का बहुत पुराना विषय है और इस पर हजारों फिल्में बनी हैं। में बदला लेने की जो वजह दिखाई गई है वो हिंदी फिल्मों में लंबे समय बाद नजर आई है। अपनी पत्नी के बलात्कार का बदला हीरो लेना चाहता है। ट्वीस्ट यह है कि हीरो दृष्टिहीन है और वह बदला कैसे लेगा? 
 
काबिल की कहानी को दो भागों में बांटा गया है। इंटरवल के पहले और इंटरवल के बाद में। पहले हिस्से की बात पहले। यहां पर दिखाया गया है कि दृष्टिहीन रोहन भटनागर (रितिक रोशन) एक डबिंग आर्टिस्ट है। वह 'बेचारा' नहीं है। अपने सारे काम खुद करता है। सुप्रिया (यामी गौतम) से उसकी मुलाकात कराई जाती है। सुप्रिया भी दृष्टिहीन है। दोनों शादी कर लेते हैं। इस लव स्टोरी को काफी जल्दबाजी में निपटाया गया है। मुलाकात, शादी और सुहागरात। निर्देशक संजय गुप्ता को थ्रिलर बनाना पसंद है और रोमांस से वे दूर ही रहते हैं। इसलिए सुप्रिया और रोहन का रोमांस दर्शकों के दिल को नहीं छूता। 
अमित (रोहित रॉय) और वसीम (सहिदुर रहमान) सुप्रिया के साथ बलात्कार करते हैं। सुप्रिया और रोहन की शिकायत पर पुलिस वाले ध्यान नहीं देते क्योंकि अमित का भाई माधवराव (रोनित रॉय) ताकतवर नेता है। ये लोग सुप्रिया के साथ फिर बलात्कार करते हैं और सुप्रिया आत्महत्या कर लेती है। कहानी कितनी पिछड़ी हुई है कि बलात्कार का शिकार हुई महिला खुद को अपने पति के लायक नहीं समझती है। वह ग्लानि से पीड़ित दिखाई गई है। आज के दौर में ऐसी बातें? ऐसा अस्सी के दौर में होता था जब हीरोइन, हीरो से कहती थी कि मैं तुम्हारे लायक नहीं रही।  
फिल्म का दूसरा हिस्सा थ्रिलर है। इसमें दर्शाया गया है कि किस तरह रोहन अपना बदला लेता है। यहां पर होना ये चाहिए था कि दर्शक दम साध कर देखे कि किस तरह रोहन अपना इंतकाम लेता है, लेकिन वह इतनी आसानी से सारे काम करता है कि यकीन नहीं होता। जहां यकीन नहीं होता वहां पर दर्शक कैसे किरदार और फिल्म से जुड़ाव महसूस कर सकता है। रोहन को कोई अड़चन या परेशानी नहीं होती। वह जहां जिसे बुलाता है वो सीधे वहीं पहुंच जाता है। रोहन भी कहीं भी आसानी से पहुंच जाता है। ये सारी बातें फिल्म देखते समय परेशान करती हैं। 
 
फिल्म में कई बातें अधूरी छोड़ दी गई है। सुप्रिया और रोहन के बारे में विस्तापूर्व कुछ भी नहीं बताया गया है‍ कि  क्यों वे दुनिया में अकेले हैं? रोहन बदला लेने के लिए किस तरह की तैयारी करता है या योजना बनाता है। 
 
'काबिल' देखते समय कत्ल (1986), आखिरी रास्ता (1986) और गजनी (2008)  जैसी फिल्मों की याद आती है। कत्ल में एक दृष्टिहीन अपनी बेवफा पत्नी और उसके प्रेमी से बदला लेता है। आखिरी रास्ता का हीरो अपनी पत्नी से बलात्कार करने वालों की हत्या अलग-अलग तरीकों से करता है। गजनी भी बदले पर आधारित फिल्म थी जिसमें ट्वीस्ट ये था कि हीरो आखिरी पन्द्रह मिनट की बातें ही याद रख पाता है, यहां हीरो दृष्टिहीन है। इन फिल्मों में मनोरंजन था, थ्रिल था, लेकिन 'काबिल' में  मनोरंजन का बहुत ज्यादा अभाव है। पूरी फिल्म में एक उदासी छाई रहती है जो मनोरंजन की आस में आए दर्शकों को उदासी से भर देती है। 
 
निर्देशक संजय गुप्ता के पास  अच्‍छी कहानी थी, लेकिन उन्हें कहने का तरीका नहीं आया। वे ड्रामे को विश्वसनीय नहीं बना पाए। सब कुछ नकली सा लगता है। इस बार उन्होंने अपनी तकनीकी बाजीगरी नहीं दिखाई। बजाय ग्रीन या ब्राउन टोन के उन्होंने ब्राइट कलर्स का उपयोग फिल्म में किया है। लेकिन जिस तरह से उन्होंने नकली आसमान और बादल दिखाए हैं वे आंखों को चुभते हैं। कुछ जगह वे कैरेक्टर को स्टाइलिश बनाने के चक्कर में भी फिल्म का कबाड़ा कर बैठे हैं। जैसे, माधवराव बेवजह सुप्रिया की मौत का शोक मनाने के लिए रोहन के घर जाता है। अमित की हत्या वाले प्रसंग को भी स्टाइलिश बनाने की कोई वजह नहीं थी। रोहन पुलिस को चैलेंज देकर क्यों मुसीबत मोल लेता है? ये सारी बातें फिल्म को कमजोर बनाती हैं। 
 
फिल्म को उठाने की भरसक कोशिश करते हैं, लेकिन स्क्रिप्ट और निर्देशक का साथ उन्हें नहीं मिला। हालांकि उनका अभिनय ठीक ही कहा जा सकता है। दृष्टिहीन का रोल निभाने के पहले सभी कलाकारों को फिल्म 'स्पर्श' में नसीरुद्दीन शाह का अभिनय देखना चाहिए। यामी गौतम को 'विकी डोनर' के बाद एक जैसी भूमिकाएं मिल रही हैं। रोनित रॉय पर नाना पाटेकर का प्रभाव था तो नरेन्द्र झा पर डैनी का। गिरीश कुलकर्णी और रोहित रॉय छोटी भूमिकाओं में असर छोड़ते हैं। 
 
फिल्म के गाने ठीक हैं। नया संगीतकारों को सूझ नहीं रहा है और यहां पर वर्षों पुराने हिट गीत 'सारा जमाना' से भी काम चलाया गया है, जिसका फिल्मांकन अच्छा है। 
 
कुल मिलाकर काबिल में मनोरंजन करने की काबिलियत नहीं है। 
 
बैनर : फिल्मक्राफ्ट प्रोडक्शन्स 
निर्माता : राकेश रोशन
निर्देशक : संजय गुप्ता
संगीत : राजेश रोशन   
कलाकार : रितिक रोशन, यामी गौतम, रोनित रॉय, रोहित रॉय, उर्वशी रौटेला (आइटम नंबर)   
सेंसर सर्टिफिकेट : यूए * 2 घंटे 19 मिनट 48 सेकंड्स > रेटिंग : 2/5 

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