60 वर्ष की हुई 'मदर इंडिया'

समय ताम्रकर| पुनः संशोधित गुरुवार, 26 अक्टूबर 2017 (13:59 IST)
25 अक्टोबर 2017 को हिंदी फिल्म इतिहास की सर्वोत्तम फिल्मों में से एक 'मदर इंडिया' को रिलीज हुए 60 वर्ष पूरे हो गए। इतने समय बाद भी इस फिल्म को याद किया जाना दर्शाता है कि कुछ कृतियों पर समय का कोई असर नहीं पड़ता है। 'मदर इंडिया' को देख कर भारत और उसकी नारी के आदर्शों को समझा जा सकता है। यह उस भारतीय ग्रामीण जीवन की झलक दिखलाती है जिसमें 60 वर्ष गुजरने के बाद भी बहुत ज्यादा परिवर्तन नहीं हुआ है। सूदखोर और व्यापारियों का दमन चक्र अभी भी किसानों पर जारी है और किसान आत्महत्या करने पर मजबूर हैं। तेज धूप, कड़क सर्दी और घनघोर बारिश के बीच वे दिन-रात मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें अपनी मेहनत का वाजिब दाम नहीं मिल पाता है।

मदर इंडिया ऐसे ही एक किसान की कहानी है जो सूदखोर के ब्याज के तले दब कर अधमरा है और हताश हो कर अपनी पत्नी और दो छोटे बच्चों को छोड़ कर चला जाता है। यह फिल्म नारी शक्ति को भी दर्शाती है। विभिन्न परिस्थितियों में फिल्म की नायिका राधा संघर्ष करती है और अपने बच्चों को पाल-पोस कर बढ़ा करती है। वह चाहती तो सूदखोर से विवाह रचा कर आरामदायक जिंदगी भी बिता सकती थी, लेकिन बच्चों की खातिर वह यह त्याग करती है। उसके दिल में पति के अलावा किसी के लिए कोई जगह नहीं है। उसके अपने सिद्धांत हैं। शायद यही बात ऑस्कर पुरस्कार वाले समझ नहीं पाए थे और यह फिल्म ऑस्कर से वंचित रह गई थी।

राधा बेहद सुलझी, ईमानदार और न्यायप्रिय भी है। उसके दो बेटों में से एक समझदार और दूसरा बिरजू थोड़ा बदमाश है। उसकी बदमाशी से परेशान होकर वह उसे गोली मारने से भी नहीं चूकती। मां के दिल का इस फिल्म में जबरदस्त चित्रण किया गया है और इस मामले में यह ट्रेंड सेटर है। इसके बाद मां का हिंदी फिल्मों में दर्जा और रोल काफी बढ़ गया। बिरजू के किरदार के भी कई शेड्स देखने को मिले। सलीम-जावेद द्वारा लिखी 'दीवार' 'मदर इंडिया' से ही प्रेरित है। अमिताभ ने बिरजू जैसा पात्र कई फिल्मों में अभिनीत किया है। यहां तक की राधा का किरदार निभाने वाली अभिनेत्री के बेटे संजय दत्त के व्यवहार में भी बिरजू की परछाई देखी जा सकती है। जावेद अख्तर ने तो कहा भी है कि सारी हिंदी फिल्में 'मदर इंडिया' से ही निकलती है।

इस महान फिल्म को ने बनाया था। दरअसल यह मेहबूब खान द्वारा निर्देशित‍ फिल्म 'औरत' (1940) का रीमेक थी। औरत को खास कामयाबी नहीं मिली थी और मेहबूब को इस फिल्म पर अगाध विश्वास था इसलिए इसे दोबारा बनाया गया। उन्होंने इसे बड़े पैमाने पर बनाया और यह उस समय की सर्वाधिक महंगी फिल्म थी। फिल्म को देश-विदेश में भारी सफलता के साथ प्रशंसा भी मिली। वर्ल्ड की टॉप 100 फिल्मों की सूचियों में भी फिल्म को स्थान मिला और कई पुरस्कार प्राप्त हुए।
फिल्म में नरगिस ने लीड रोल निभाया और उनकी उम्र के कई पड़ाव और अभिनय में शेड्स देखने को मिले। दो जवान बेटों की मां बनीं नरगिस की तब उम्र मात्र 26 वर्ष थी। यह नरगिस की बेहतरीन फिल्म मानी जाती है। देखा जाए तो किसी भी भारतीय अभिनेत्री के सर्वश्रेष्ठ अभिनय में से यह एक है। बिरजू के लिए साबू दस्तगीर नामक हॉलीवुड कलाकार के नाम पर मेहबूब खान ने विचार किया था जो कि भारतीय मूल के थे, लेकिन कई कारणों से बात नहीं बन पाई। बाद में दिलीप कुमार का नाम फाइनल कर लिया गया, लेकिन नरगिस ने इस पर आपत्ति ली। उनका मानना था कि दिलीप के साथ वे कई रोमांटिक फिल्म कर चुकी हैं और दर्शक मां-बेटे के रूप में उन्हें नहीं स्वीकारेंगे। आखिरकार को लिया गया।

फिल्म की शूटिंग के दौरान एक सीन फिल्माया जा रहा था जिसमें आग लगाई गई थी। नरगिस सचमुच आग से घिर गई थीं। सुनील दत्त रियल लाइफ में भी हीरो बन कर आग में कूद गए और नरगिस को सकुशल बचा कर ले आए। साथ में उन्होंने नरगिस का दिल भी जीत लिया। बाद में दोनों ने शादी कर ली।

इस फिल्म को मेहबूब खान, वजाहत मिर्जा और एस. अली राजा ने मिलकर लिखा था। फिल्म में नरगिस, राजकुमार, राजेन्द्र कुमार, सुनील दत्त और कन्हैयालाल ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। नौशाद द्वारा संगीतबद्ध गाने सुपरहिट रहे। 'नगरी नगरी द्वारे द्वारे', 'दुनिया में हम आए हैं तो', 'ओ गाड़ीवाले', 'दुख भरे दिन बीते रे भैया', 'होली आई रे कन्हाई', 'ना मैं भगवान हूं' जैसे गाने आज भी पसंद किए जाते हैं।

इस फिल्म को हर सिने प्रेमी द्वारा देखा ही जाना चाहिए।

वेबदुनिया हिंदी मोबाइल ऐप अब iOS पर भी, डाउनलोड के लिए क्लिक करें। एंड्रॉयड मोबाइल ऐप डाउनलोड करने के लिए क्लिक करें। ख़बरें पढ़ने और राय देने के लिए हमारे फेसबुक पन्ने और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं।



और भी पढ़ें :