'मैंने सौ से ज़्यादा लोगों को मारा और मुझे कोई अफ़सोस नहीं'

पुनः संशोधित शनिवार, 5 मई 2018 (16:49 IST)
सीरिया में सात सालों से वीभत्स युद्ध चल रहा है। राष्ट्रपति बशर अल असद की सरकार विद्रोहियों और जैसे जेहादी समूहों से मुक़ाबला कर रही है। उत्तरी शहर रक़्क़ा युद्ध में शामिल कई गुटे के बीच भीषण लड़ाई का रणक्षेत्र रहा है। ये एक ऐसे शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारी की कहानी है जो हिंसा के चक्र में फंस गया और ख़तरनाक हत्यारा बन गया।
चेतावनीः इस लेख में उत्पीड़न और हिंसा का वर्णन है। कुछ लोग इससे आहत हो सकते हैं। कुछ किरदारों के नाम बदल दिए गए हैं।

ख़ालिद (बदला हुआ नाम) ने रक़्क़ा में चल रही हिंसा के प्रभाव में हत्यारा बनने का फ़ैसला नहीं किया था। बल्कि उन्हें एक विशेष निमंत्रण भेजा गया था। छह लोगों को उत्तर-पश्चिम सीरिया के अलेप्पो के एक एयरफ़ील्ड में पहुंचने के लिए कहा गया। यहां एक फ्रांसीसी प्रशिक्षक उन्हें पिस्टल, स्नाइपर राइफ़ल और बिना आवाज़ वाले हथियारों से हत्याएं करने का प्रशिक्षण देने वाला था। यहां उन्होंने विधिपूर्वक हत्याएं करना सीखा।

उन्होंने क़ैदियों को निशाना बनाया। वो बताते हैं, "हम हिरासत में लिए गए सरकारी बलों के सिपाहियों पर अभ्यास किया करते थे। उन्हें मुश्किल जगह पर छुपा दिया जाता। फिर हम स्नाइपर राइफ़ल के ज़रिए उन्हें निशाना बनाते। कई बार वो क़ैदियों का एक समूह भेजते और बाक़ी को नुक़सान पहुंचाए बिना किसी एक को मारने के लिए कहते।"

"अधिकतर बार हम मोटरसाइकिल पर बैठकर हत्याएं करते। एक व्यक्ति मोटरसाइकिल चलाता और हम पीछे बैठते। मोटरसाइकिल को जिसे निशाना बनाया जा रहा है उसकी कार के करीब चलाया जाता और फिर गोली मारी जाती। उसके पास बचने का कोई मौक नहीं होता।"
ख़ालिद ने लोगों का पीछा करना सीखा। कारों के काफ़िलों का ध्यान भंग करने का प्रशिक्षण लिया ताकि दूसरा हत्यारा निशाना लगा सके। ये एक रक्तरंजित अमानवीय शिक्षा थी जो ख़ालिद हासिल कर रहे थे। लेकिन 2013 के मध्य में जब सीरियाई सेना रक़्क़ा से पीछे हट रही थी तब यहां जड़े जमा रहे कट्टरपंथी समूह अहरार-अल-शाम के कमांडरों को यही तरीका भा रहा था। ये समूह इस उत्तरी समूह को अपने क़ब्ज़े में लेना और विरोधियों का खात्मा करना चाहता था।
मैं थोड़ा धार्मिक था..
ख़ालिद भी इस समूह के कई कमांडरों में से एक थे और वो रक़्क़ा के सुरक्षा कार्यालय के ज़िम्मेदार थे। लेकिन बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया है कि साल 2011 में जब सीरिया में क्रांति की शुरुआत हो रही थी उस समय वो एक साधारण शांतिपूर्ण इंसान थे। वो बताते हैं, "मैं थोड़ा बहुत धार्मिक था और धर्म को लेकर बहुत सख़्त नहीं था। मैं धार्मिक यात्राएं आयोजित करने का काम करता था।"
सरकार विरोधी प्रदर्शन में शामिल होने के अपने पहले दिन को याद करते हुए वो कहते हैं, "वो आज़ादी का एक शानदार अहसास था जिसमें सरकार का डर भी घुला हुआ था।" "हमें लग रहा था कि हम अपने देश के लिए कुछ कर रहे हैं, हम आज़ादी ला रहे हैं और बशर अल असद के अलावा किसी और को राष्ट्रपति चुनने में सक्षम हो रहे हैं। हम एक छोटा सा समूह थे जिसमें 25-30 से ज़्यादा लोग नहीं थे।"

ख़ालिद बताते हैं कि प्रदर्शनों के शुरुआती दिनों में किसी ने नहीं सोचा था कि उन्हें हथियार उठाने पड़ेंगे। "हमारे अंदर इतनी हिम्मत ही नहीं थी लेकिन सुरक्षाबलों ने लोगों को गिरफ़्तार किया और बुरी तरह पीटा।"
एक दिन ख़ालिद को भी हिरासत में ले लिया गया। "उन्होंने मुझे मेरे घर से उठाया और क्रिमनल सिक्यूरिटी डिपार्टमेंट ले गए। इसके बाद कई और विभागों में ले जाया गया। राजनीतिक सुरक्षा, राष्ट्रीय सुरक्षा और फिर आख़िर में केंद्रीय कारागार भेज दिया गया जहां मैं क़रीब एक महीने तक रहा। जब मैं केंद्रीय कारागार गया तो मैं न चल पा रहा था और न सो पा रहा था। मेरी कमर में बहुत ज़्यादा दर्द था।"
ख़ालिद कहते हैं कि उनका सबसे ज़्यादा उत्पीड़न क्रिमनल सिक्यूरिटी विभाग के एक गार्ड ने किया जिसने उन्हें राष्ट्रपति बशर अल असद की तस्वीर के आगे घुटने टेकने पर मजबूर किया। गार्ड ने उनसे कहा, "तुम्हारा अल्लाह मर जाएगा लेकिन ये नहीं मरेंगे। अल्लाह ख़त्म हो जाएगा लेकिन असद हमेशा रहेंगे।"

"हर दूसरे दिन उस गार्ड की ड्यूटी लगती थी। उसे देखकर ही मैं समझ जाता था कि अब मेरा उत्पीड़न किया जाएगा। वो मुझे छत से बांधकर लटका देता। कपड़े उतारने के लिए मजबूर करता, मेरी कमर पर कोड़े बरसाता। वो मुझसे कहता कि मैं तुमसे नफ़रत करता हूं और चाहता हूं कि तुम्हारी मौत मेरे हाथों हो।"
जेल से अधमरा निकला
"मैं उसकी जेल से अधमरा निकला। जब मैं केंद्रीय कारागार पहुंचा तो बाक़ी क़ैदी मुझे देखकर रो पड़े। मुझे स्ट्रेचर पर लिटाकर लाया गया था। मैंने तय कर लिया था कि अगर अल्लाह ने मेरी जान बचाई तो मैं उसे ज़रूर मार दूंगा चाहे वो जहां भी रहे। भले ही वो दमिश्क़ चला जाए लेकिन मैं उसकी जान लेकर रहूंगा।"
जेल से रिहा होने के बाद ख़ालिद ने सरकार के ख़िलाफ़ हथियार उठा लिए। वो बताते हैं कि उन्होंने सीरिया सेना की 17वीं रिज़र्व डिवीज़न के पैंतीस जवानों को सेना से निकलने में मदद की। ये डिवीज़न उत्तर-पूर्व में तैनात थी। कुछ सैनिकों को उन्होंने बंधक बना लिया और उनके पास जो भी कुछ मौजूद था उसे बेच दिया ताक़ि बंदूकों ख़रीदी जा सकें।

ख़ालिद बताते हैं कि उन्होंने कुछ ख़ूबसूरत लड़कियों की मदद ली और प्रदर्शनकारियों के प्रताड़ित करने वाले लोगों को शादी के झांसों में फंसवा लिया। ख़ालिद ने उनकी जान तो बख़्श दी लेकिन बदले में सेना छोड़ने की घोषणा करने वाले वीडियो बनवा लिए ताकि वो दोबारा राष्ट्रपति बशर अल असद की सेना में शामिल न हो सकें।
अपने पहले बंधक से उन्होंने फ़िरौती में पंद्रह एके-47 या उन्हें ख़रीदने के लिए ज़रूरी पैसा मांगा था। लेकिन एक व्यक्ति ख़ालिद से नहीं बच सका। वो गार्ड जो उन्हें प्रताड़ित करता था। "मैंने लोगों से क्रिमनल सिक्यूरिटी विभाग के उस गार्ड के बारे में पता किया और हम उसके घर तक पहुंच गए। हमने उसे अग़वा कर लिया।"

"उसने मुझसे एक बात कही थी जो मुझे याद रही। उसने कहा था कि अगर मैं उसकी जेल से ज़िंदा बच जाऊं और बाद में वो मेरे हाथ आ जाए तो मैं उस पर दया न करूं। मैंने वही किया जैसा उसने कहा था।"
ऐसे बन गया हत्यारा
"मैं उसे केंद्रीय कारागार के पास एक खेत में ले गया। मैंने उसके दोनों हाथ काट दिए। उसकी ज़बान बाहर निकालकर कैंची से काट दी। लेकिन फिर भी मेरा दिल नहीं भरा। उसने अपनी जान लेने की भीख मांगी। मैंने अपना बदला ले लिया। मुझे कोई डर नहीं था।"... "मैंने उसका बहुत उत्पीड़न किया। टॉर्चर के कई तरीके उस पर अपनाए। लेकिन मुझे इसका अफ़सोस नहीं होता। बल्कि अगर वो फिर से ज़िंदा हो जाए तो मैं उसके साथ फिर वही सब करूंगा।"
"अगर उसकी शिकायत करने की कोई जगह होती। कोई होता जिससे मैंने उसकी शिकायत की होती तो शायद मैंने उसके साथ ये सब न किया होता। लेकिन उस समय कोई नहीं था जिससे उसकी शिकायत की जा सके, कोई सरकार नहीं थी जो उसे रोक सके।" ख़ालिद को क्रांति में विश्वास नहीं रहा था। बल्कि उनका एक ही मक़सद है, ज़िंदा रहने के लिए रोज़ संघर्ष करना। और जल्द ही वो वीभत्स सीरियाई संघर्ष के एक और स्याह पक्ष से जुड़ गए। वो इस्लामिक स्टेट के हत्यारे बन गए।
दोस्ती या धोखा, रणनीति को लेकर लड़ाइयां, सत्ता संतुलन में बदलाव। इन वजसों से सीरिया के बदलते रहे। कई बार तो बहुत जल्दी-जल्दी। इसी पृष्ठभूमि में, ख़ालिद ने अपने आप को प्रशिक्षण देने वाले अहरार-अल-शाम समूह को छोड़ दिया और नुसरा फ्रंट से जुड़ गए। उस समय ये संगठन सीरिया में अल-क़ायदा से अधिकारिक रूप से जुड़ा था।
2014 की शुरुआत में ही, इस्लामिक स्टेट ने, जिसका ख़ालिद और उन जैसे अन्य लड़ाके मज़ाक बनाया करते थे, विद्रोही गुटों को रक़्क़ा से बाहर खदेड़ दिया। रक़्क़ा शहर इस्लामिक स्टेट की स्वघोषित राजधानी बन गया। लड़ाकों ने नागरिकों को डराने के लिए चौहारों पर लोगों के सर काट दिए, जिसने आवाज़ उठायी उसे गोली मार दी।

ख़ालिद कहते हैं, "इस्लामिक स्टेट छोटी-छोटी बातों पर लोगों की जान ले लेता और उनकी संपत्तियों को ज़ब्त कर लेता।" "अगर आपने कह दिया कि ओ मोहम्मद तो वो ईशनिंदा का आरोप लगाकर जान ले लेते। फोटो लेने, मोबाइल का इस्तेमाल करने पर सज़ा दी जाती। सिगरेट पीने पर जेल भेज दिया जाता। वो सब कर रहे थे- हत्याएं, लूटमार और यहां तक की बलात्कार।" "वो किसी शरीफ़ औरत पर यौन संबंधों का आरोप लगा देते और फिर उसे चौराहे पर पत्थरों से पीट-पीटकर मार देते। मैंने तो कभी अपने छोटे भाई बहनों के सामने मुर्गा भी हलाल नहीं किया था।"
डबल एजेंट बनने का फ़ैसला और...
जेहादी ने विद्रोही गुटों के शीर्ष कमांडरों को भारी पैसों और सत्ता के पदों के बदले ख़रीद लिया। ख़ालिद को सुरक्षा प्रमुख का पद दिया गया। उन्हें दफ़्तर दिया गया और इस्लामिक स्टेट लड़ाकों को आदेश देने का हक़ दिया गया। वो समझ गए कि इससे इनकार करने का मतलब है अपनी मौत के वारंट पर दस्तखत करना। उन्होंने एक ख़ौफ़नाक़ व्यक्तिगत समझौता कर लिया।
"मैंने हां बोल दी लेकिन अल-नुसरा के वरिष्ठ नेता अबु-अल-अब्बास की सहमति से मैं डबल एजेंट बन गया। मैं सामने से इस्लामिक स्टेट का दोस्त था लेकिन पीछे से दुश्मन। मैंने इस्लामिक स्टेट के लड़ाकों को अग़वा किया और उनकी हत्याएं की। मैंने जिस पहले लड़ाकों को अग़वा किया था वो एक सीरियाई था और इस्लामिक स्टेट के ट्रेनिंग कैंप का नेता था।"

"मैं इस्लामिक स्टेट को हर वो जानकारी देता जो अबु-अल-अब्बास चाहते मैं उन्हें दूं। कुछ जानकारी सही होती ताकि इस्लामिक स्टेट का मुझ पर भरोसा क़ायम हो जाए। लेकिन इसी समय मैं उनके राज़ भी ले रहा था।" अल नुसरा फ्रंट ने साल 2013 में इस्लामिक स्टेट के नेता अबु बक्र अल बग़दादी के गठबंधन के प्रस्ताव को ठुकरा दिया था और दूसरे विरोधी गुटों से हाथ मिला लिया था। ऐसे में उसके पास इस्लामिक स्टेट की जासूसी करने के कारण थे।
ख़ालिद का डबल एजेंट बनने का फ़ैसला मौत को गले लगाने जैसा था लेकिन वो लोग और थे जो मारे जा रहे थे। ख़ालिद बताते हैं कि उन्होंने इस्लामिक स्टेट के कहने पर सौलह लोगों की हत्याएं की। इन लोगों को आवाज़ न करने वाली बंदूक से उन्हीं के घरों में मारा गया था। ख़ालिद कहते हैं कि उन लोगों ने पैसों के बदले अपना धर्म बेच दिया था, वो अहरार-अल-शाम और फ्री सीरियम आर्मी को धोखा दे रहे थे। पश्चिमी देशों के समर्थन वाले गुट फ्री सीरियन आर्मी ने ही सबसे पहले सरकारी सेना को रक़्क़ा से बाहर निकाला था।
जिन लोगों की ख़ालिद ने हत्याएं की उनमें से एक अल-बाब के रहने वाले इस्लामी मामलों के विद्वान थे। वो बताते हैं, "मैंने उनका दरवाज़ा खटखटाया और घर में घुसते ही बंदूक उन पर तान दी। उनकी पत्नी चिल्लाने लगी। वो समझ गए थे कि मैं उन्हें मारने आया हूं।"... "उन्होंने मुझसे कहा कि तुम क्या चाहते हो, पैसा, जितना है सब ले जाओ लेकिन मैंने उनसे कहा कि मैं पैसे नहीं चाहता। फिर मैंने उनकी पत्नी को दूसरे कमरे में बंद कर दिया। उन्होंने मुझसे कहा कि अगर तुम मेरी पत्नी के साथ सोना चाहते हो तो सो जाओ लेकिन मेरी जान बख़्श दो। उनकी बातों ने मुझे उनकी हत्या करने के लिए प्रेरित कर दिया।"
'मैं आम नागरिक हो गया हूं'
रक़्क़ा में इस्लामिक स्टेट के अमीरों (नेताओं) को ऐश पसंद था। वो उन लोगों की नियमित रूप से हत्याएं करवाते थे जो उनकी जगह ले सकते हों। कई बार वो मौतों के लिए अमेरिाक के नेतृत्व के गठबंधन के लड़ाकू विमानों को ज़िम्मेदार बता देते थे। कई बार वो मारे गए लोगों की परवाह ही नहीं करते थे। इस्लामिक स्टेट के साथ जुड़ने के महीने भर के भीतर ही ख़ालिद को अहसास हो गया था कि उनका नंबर भी कभी भी आ सकता है।
अब ख़ालिद अपनी जान बचाकर भाग रहे थे। वो पहले कार से दीर-अज्ज़ूर गए और फिर तुर्की पहुंच गए। ये पूछने पर कि क्या उन्हें कोई अफ़सोस है या एक दिन पकड़े जाने का डर है वो इतना ही कहते हैं, "मैं सिर्फ़ यही सोचता था कि कैसे बच कर निकलूं और ज़िंदा रहूं।" ..."जो मैंने किया वो अपराध नहीं है। जब कोई आपके पिता पर, भाई पर बंदूक तान दे और उन्हें मारे या आपके रिश्तेदारों को मारे, आप ख़ामोश नहीं रह सकते हैं और कोई भी ताक़त आपको नहीं रोक सकती है। मैंने जो किया आत्मरक्षा में किया।"
"मैंने सरकार के ख़िलाफ़ और इस्लामिक स्टेट के ख़िलाफ़ लड़ाई में सौ से अधिक लोगों को मारा। लेकिन मैंने एक भी ऐसे व्यक्ति को नहीं मारा जो बेग़ुनाह हो। मुझे कोई अफ़सोस नहीं हैं। अल्लाह जानता है कि मैंने किसी आम नागरिक या बेग़ुनाह व्यक्ति की जान नहीं ली है।"..."मैं जब अपने आप को शीशे में देखता हूं तो लगता है कि मैं कोई राजकुमार हूं। मुझे रात को सुक़ून से नींद आती है। क्योंकि हर वो व्यक्ति जिसे मारने के लिए मुझसे कहा गया वो मरने के ही लायक था।"
"सीरिया को छोड़ने के बाद अब मैं एक बार फिर से आम नागरिक हो गया हूं। अब जब कोई मुझसे कोई बुरी बात कहता है तो मैं बस यही जवाब देता हूं- जैसी आपकी मर्ज़ी।"

ख़ालिद को बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री सीरिया- द वर्ल्ड्स वॉर के लिए इंटरव्यू किया गया है। ये डॉक्यूमेंट्री 26 मई और 2 जून को बीबीसी वर्ल्ड न्यूज़ पर दिखायी जाएगी।
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