पपीता : विटामिन 'ए' का खजाना

सेहत डेस्क

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पपीता एक सदाबहार मधुर फल है, जो स्वादिष्ट और रुचिकर होता है। यह हमारे देश में सभी जगह उत्पन्न होता है। यों तो यह बारहों महीने होता है, लेकिन यह फरवरी-मार्च और मई से अक्टूबर के मध्य विशेष रूप से पैदा होता है। इसका कच्चा फल हरा और पकने पर पीले रंग का हो जाता है।

पका पपीता मधुर, भारी, गर्म, स्निग्ध और सारक होता है। इसके सेवन से पित्त का शमन है तथा भोजन के प्रति रुचि उत्पन्न करता है।

रासायनिक तत्व : पपीते में पानी का अंश 89.6 प्रतिशत होता है, जबकि प्रोटीन 0.5 प्रतिशत, चर्बी 0.1 प्रतिशत, कार्बोदित पदार्थ 9 प्रतिशत, क्षार तत्व 0.5 प्रतिशत, कैल्शियम 0.01 प्रतिशत और फॉस्फोरस 0.01 प्रतिशत होता है। इसमें लौह तत्व 0.4 मि.ग्रा./100 ग्राम पाया जाता है।

पपीते में विटामिन 'ए' अत्यधिक मात्रा में पाया जाता है, अर्थात्‌ इसमें विटामिन 'ए' 2025 आं.रा.इ./100 ग्राम होता है तथा विटामिन 'सी' 46 से 136 मि.ग्रा./100 ग्राम पाया जाता है। पपीते में स्थित कुल शर्करा का आधा भाग ग्लूकोज के रूप में और आधा फल शर्करा के रूप में होता है।

आम के बाद सबसे अधिक विटामिन 'ए' पपीते में ही होता है। जैसे-जैसे यह पकता जाता है, वैसे-वैसे इसमें विटामिन 'सी' की मात्रा बढ़ती जाती है।

वैज्ञानिक शोधों से पता चला है कि कच्चे पपीते में विटामिन 'सी' 40 से 90 मि.ग्रा., अधपके पपीते में 50 से 90 मि.ग्रा. और पके पपीते में 60 से 140 मि.ग्रा. होता है। इसमें शर्करा और विटामिन 'सी' मई से अक्टूबर महीने तक अधिक होता है। पपीते में विटामिन 'बी1' व 'बी2' भी किंचित मात्रा में होता है।

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पपीता खाने से धातु संबंधी विकार एवं वीर्य की कमी दूर होती है। यह पाचन शक्ति को सुधारता है तथा पेट के विकारों को दूर करता है। कच्चा पपीता खाने से कफ-वात की वृद्धि होती है, लेकिन यह अजीर्ण, यकृत विकार, बवासीर आदि रोगों के लिए गुणकारी होता है।


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