आत्मनिर्भरता की दिशा में एक सार्थक कदम : लक्ष्मी तरु

Ravishankar
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गाँधी के आर्थिक दर्शन के जो कुछ बहुत बुनियादी पहलू थे, जिस पर बौद्धिक विमर्शों में ही सारा वक्त जाया हुआ और जिसे कभी लागू नहीं किया जा सका, उसमें से एक था, स्वायत्त अर्थव्यवस्था का सिद्धांत। सूत कातना, नमक बनाना और मशीनों का विरोध इसी आत्मनिर्भरता की दिशा में उठाए गए कुछ कदम थे। अपनी आवश्यकताओं के लिए विदेशी आयात पर निर्भर न होकर हर कुछ खुद उत्पादित करना और इस तरह स्वतंत्र आत्मनिर्भर अस्मिता का निर्माण ही इस दर्शन का लक्ष्य था।

त़ड़का तक विदेशी तेल स
आज यह स्वायत्त अस्मिता ही नहीं है। हम अपनी तमाम आवश्यकताओं के लिए विदेशी आयात पर निर्भर हैं और देश कर्ज के बोझ से दबा हुआ है। पेट्रोलियम पदार्थों से लेकर खाद्य सामग्री तक का एक ब़ड़ा हिस्सा विदेशों से आयात किया जाता है। वास्तव में हमारा देश आज खाद्य पदार्थों के अभाव और बिजली की गति से ब़ढ़ते दामों के संकट से जूझ रहा है। आँक़ड़े बताते हैं कि देश में खाद्य तेलों की कुल खपत का आधा ही हम उत्पादित कर पा रहे हैं। बाकी का 50 प्रतिशत यानी कि सालाना लगभग 15,000 करो़ड़ रुपए का खाद्य तेल विदेशों से आयात किया जाता है।

इस संकट की भयावहता आध्यात्मिक गुरु श्री श्री रविशंकर जी को भी उद्वेलित कर रही थी। उन्होंने इस दिशा में कुछ महत्वपूर्ण कदम उठाने का निर्णय लिया है। कृषि उत्पादन और विधियों को विकसित करने के लिए उन्होंने श्री श्री इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड टेक्नॉलॉजी की स्थापना की। इस संस्था का उद्देश्य सस्ती और लाभदायक कृषि विधियों की खोज करना था, जिससे भारत में कृषि और किसानों की दशा में सुधार हो सकें। इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है लक्ष्मी तरु की खेती। इससे हमारा देश खाद्य तेलों के उत्पादन की दिशा में आत्मनिर्भर हो सके।

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- मनीषा पाण्डे
वर्ष 2005 में भारत ने कुल 1,25,000 करो़ड़ रुपए बायोडीजल पदार्थों के आयात पर खर्च किए, जिसमें से 1,10,000 करो़ड़ रुपए पेट्रोलियम और 15,000 करो़ड़ रुपए खाद्य तेलों पर खर्च किए गए थे। यह राशि वर्ष 2006-2007 की कुल 563991 करो़ड़ की व्यय राशि का 2.12% है। इन सबके बावजूद हमारा देश खाद्य तेलों के गहरे संकट से जूझ रहा है। ऐसे समय यह एक ब़ड़ा कदम है। अब महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि हम किस तरह से आत्मनिर्भरता के इस लक्ष्य को प्राप्त कर सकेंगे। यह लक्ष्य पूरा होगा, लक्ष्मी तरु वाटिका की संकल्पना के साथ। रविशंकरजी ने आर्ट ऑफ लिविंग के तहत ब़ड़े पैमाने पर ऐसे वृक्ष लगाने की योजना बनाई है, जिसके बीजों से तेल निकाला जा सकेगा। वृक्ष धरती को उर्वर बनाएँगे, वातावरण शुद्ध करेंगे और इससे खाद्य तेलों का भी ब़ड़े पैमाने पर उत्पादन होगा। यह वृक्ष अनुर्वर धरती पर भी उगाए जा सकेंगे।

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