आलोक श्रीवास्तव की रचना 6 : ख़्वाब तुम्हारे लेकर

शुक्रवार,जुलाई 3, 2015
सखी पिया को जो मैं न देखूं तो कैसे काटूं अंधेरी रतियां,1 कि जिनमें उनकी ही रौशनी हो, कहीं से ला दो मुझे वो ...
धड़कते, सांस लेते, रुकते, चलते, मैंने देखा है, कोई तो है जिसे अपने में पलते, मैंने देखा है। तुम्हारे ख़ून से मेरी ...
धड़कते, सांस लेते, रुकते, चलते, मैंने देखा है, कोई तो है जिसे अपने में पलते, मैंने देखा है। तुम्हारे ख़ून से मेरी रगों ...

अनबूझा-सा इक तेवर थे बाबूजी

रविवार,अक्टूबर 12, 2014
घर की बुनियादें, दीवारें, बामो-दर थे बाबूजी, सबको बांधे रखने वाला ख़ास हुनर थे बाबूजी.
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मेरे हिस्से आई अम्मा...

गुरुवार,सितम्बर 18, 2014
धूप हुई तो आंचल बनकर कोने-कोने छाई अम्मा, सारे घर का शोर-शराबा, सूनापन, तन्हाई अम्मा. उसने ख़ुद को खोकर मुझमें एक नया ...
आलोक श्रीवास्तव उस युवा रचनाकार का नाम है जिसने अपनी दिलकश रचनाओं से हिन्दी-उर्दू के पाठकों के बीच खास मुकाम हासिल किया ...