हिन्दी के बारे में महापुरुषों के कथन


WD| Last Updated: शुक्रवार, 12 सितम्बर 2014 (17:03 IST)
विविधताओं से भरे इस देश में हिन्दी को आज भी वह दर्जा नहीं मिल पाया है जो उसे मिलना चाहिए था। अपने ही देश में उसे राष्ट्रभाषा का दर्जा पाने के लिए इंतजार करना पड़ रहा है,लड़ना पड़ रहा है,खुद को साबित करना पड़ रहा है।
 
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फिर भी संघर्ष के पथ पर चलते हुए दिन ब दिन हिन्दी और तेजस्वी हो रही है। देश की क्या कहें,हिन्दी ने तो अब सरहद के पार जाकर अपनी धाक जमा ली है। आज पूरब से लेकर पश्चिम तक और उत्तर से लेकर दक्षिण तक,सारी दुनिया हिन्दी का लोहा मान रही है। लेकिन हम हैं कि अब भी इसकी अहमियत को पहचान नहीं पाए हैं या हकीकत से मुंह चुरा रहा हैं। जिस हिन्दी की महत्ता को हम इतने दिनों बाद भी नहीं पहचान पाए हैं उसकी खासियत को हमारे महापुरुषों ने बहुत पहले ही जान लिया था। आइए जानते हैं कि हिन्दी के बारे में क्या थे उनके विचार-

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