कांग्रेस के बाद अब भाजपा की बारी

पुनः संशोधित सोमवार, 23 जनवरी 2017 (18:19 IST)
नई दिल्ली। राजनीतिक पंडितों का कहना है कि चुनाव सर्वेक्षणों में भाजपा की सरकार बनने की संभावना जाहिर की जा रही है लेकिन इसके बावजूद पार्टी के नेता बहुत परेशान हैं। पार्टी में टूट-फूट, उठापटक और दलबदल की घटनाओं से की सरकार दो-चार हो चुकी है। लेकिन अब पार्टी में दलबदल, अनुशासनहीनता और बागी प्रत्याशियों के भीतरघात से पार्टी का नेतृत्व परेशान है। कांग्रेस में जो उखाड़-पछाड़ होनी थी, उसके पूरे होने के बाद अब भाजपा में अनुशासन की ऐसी-तैसी होने का समय आ गया है। 
जिन 5 राज्यों में फिलहाल चुनाव होने जा रहे हैं, उनमें से मात्र उत्तराखंड ही एकमात्र ऐसा राज्य है, जहां मुख्य लड़ाई कांग्रेस और भाजपा के बीच ही है। अभी तक जो चुनावी सर्वेक्षण आए हैं, उनमें भाजपा को इस राज्य में स्पष्ट बहुमत मिलता दिख रहा है लेकिन इसके बावजूद अगर यहां भाजपा नेतृत्व काफी चिंतित नजर आ रहा है तो उसके कुछ ठोस कारण भी हैं।
 
बागी बने पार्टी के गले की हड्डी
 
प्रदेश में विधानसभा की मात्र 70 सीटें हैं और अधिकतर मतदाता सर्वेक्षण दर्शा रहे हैं कि इस चुनाव में भाजपा को 33 से 40 सीटें मिल सकती हैं। लेकिन यह स्थिति तब है, जब हाल ही भाजपा में शामिल हुए 10 कांग्रेसी बागियों को भाजपा के टिकट से जीतता हुआ दर्शाया जा रहा है। इसके अलावा अन्य सीटों पर भी सर्वेक्षणों के जो आंकड़े भाजपा को बहुमत मिलता दर्शा रहे हैं, वे यह भी साबित कर रहे हैं कि भाजपा अपने बूते आज भी बहुत पीछे है, क्योंकि अगर कांग्रेस से आए बागियों को हटा दिया जाए तो इन्हीं आंकड़ों के अनुसार भाजपा बहुमत से बहुत पीछे दिख रही है। 
 
बागियों को चुनावी मैदान से हटाने की बात आज भाजपा में भी सबसे बड़ी चिंता का विषय है। अधिकतर बागी आज भाजपा के गले में फंसी ऐसी हड्डी बन गए हैं, जो न निगलते बनती है न उगलते। हरक सिंह रावत, कुंवर प्रणव ‘चैंपियन’, सुबोध उनियाल, विजय बहुगुणा, प्रदीप बत्रा, उमेश शर्मा ‘काऊ’, रेखा आर्य और शैलेंद्र मोहन सिंघल इतने मजबूत प्रत्याशी माने जाते हैं कि इनका किसी भी सूरत में जीतकर आना लगभग तय है। ऐसे में यदि भाजपा इन्हें टिकट नहीं देती है तो यह उसके लिए आत्मघाती कदम माना जा रहा है। दूसरी तरफ हाल ही में पार्टी में शामिल हुए इन लोगों को टिकट देने का मतलब है कि अपनी पार्टी के सालों पुराने कार्यकर्ताओं और टिकट के दावेदारों को नाराज करना और फिर इन पर चुनाव के बाद भरोसा करना भी उतना आसान नहीं है। लेकिन कांग्रेस के इन बागियों को भाजपा में शामिल करते समय इस बात पर गंभीरतापूर्वक विचार नहीं किया गया था।
 
इन बागियों के अलावा बाकी सीटों पर टिकट बंटवारे की समस्या भाजपा के लिए एक बड़ा सिरदर्द बन गई है, क्योंकि कुल 70 सीटों के लिए भाजपा में ढाई हजार से ज्यादा लोगों ने दावेदारी ठोकी है और इनमें भी सबसे ज्यादा दावेदारियां बागी प्रत्याशियों वाली सीटों पर ही की गई हैं। ऐसी प्रत्येक सीट पर भाजपा में 40 से ज्यादा दावेदार खड़े हो गए हैं। एक वरिष्ठ पत्रकार का कहना है, 'किसी भी सीट पर एक पार्टी में कम से कम 3 मजबूत दावेदार तो होते ही हैं। लेकिन अब भाजपा बाहर से आए बागियों को 10 टिकट देती है तो इसका मतलब है वह अपने 30 मजबूत दावेदारों को नाराज करती है। इसका नुकसान अंतत: भाजपा को ही उठाना पड़ेगा।'
 
पार्टी के पास हरीश रावत का तोड़ नहीं
 
बागियों के अलावा भाजपा के लिए चिंता का दूसरा बड़ा कारण है उसके पास कोई स्थानीय चेहरा नहीं होना। इतना ही नहीं जो सर्वेक्षण प्रदेश में भाजपा को बहुमत मिलता दिखा रहे हैं, वही यह भी बता रहे हैं कि आज भी बतौर मुख्यमंत्री प्रदेशवासियों की पहली पसंद हरीश रावत ही हैं। जानकारों का कहना है कि बीते साल के अंत में प्रदेश में भाजपा ने कांग्रेस में राजनीतिक उठापटक करवाई थी और जिसके चलते कांग्रेस में जो फूट पड़ी और जिसके बाद केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति शासन लगाया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन को गलत बताते हुए सरकार की बहाली करवाई और उसका लाभ अंतत: हरीश रावत को ही हुआ। वे आज कांग्रेस का निर्विरोध चेहरा बन गए और बहुत से लोगों की सहानुभूति भी उनसे जुड़ गई।
 
राजधानी के जानकारों का कहना है कि हरीश रावत पिछले 3 महीने से पूरी तरह से चुनावी तैयारी में उतर आए थे और रणनीति तैयार करने लगे थे। बीते कुछ समय से जो जगह-जगह ‘सबकी चाहत, हरीश रावत’ के नारे दिखाई दे रहे हैं, वे उसी रणनीति के तहत हैं। हरीश रावत ने चुनावों की कमान पूरी तरह से अपने हाथों में काफी समय पहले ही ले ली थी और आज वे कांग्रेस का एकमात्र चेहरा बन गए हैं। इसके उलट भाजपा में मुख्यमंत्री पद के दावेदार तो कई हैं लेकिन इनमें एक भी ऐसा नाम नहीं है जिस पर बाकी दावेदार सहमत दिखते हों।
 
भाजपा में रमेश पोखरियाल ‘निशंक’, भगत सिंह कोश्यारी और भुवन चंद्र खंडूरी ऐसे नाम हैं, जो पहले भी मुख्यमंत्री रह चुके हैं और आज भी इस पद की मुख्य दौड़ में शामिल हैं। लेकिन इनमें से किसी एक नाम पर सहमति बनना आज पार्टी के सामने बहुत बड़ी चुनौती है। इनके अलावा सतपाल महाराज, भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष अजय भट्ट और प्रवक्ता अनिल बलूनी भी मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदारी ठोक रहे हैं इसलिए भाजपा किसी एक नाम पर चुनावों से पहले ही मोहर लगाने से बच रही है, क्योंकि अगर कोई एक नाम तय किया गया तो बाकी दावेदार पार्टी का रायता फैलाने में पीछे नहीं रहेंगे और हो सकता है कि कांग्रेस खेमे की ओर दौड़ लगा दें। 
 
पिछले चुनाव में भाजपा ने ‘खंडूरी है जरूरी’ के नारे के साथ एकजुट होकर चुनाव लड़ा था, वहीं इस चुनाव में भाजपा किसी भी स्थानीय नेता को चेहरा बनाने से बच रही है। भाजपा के तमाम नेता और प्रवक्ता सिर्फ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम पर ही जनता से वोट मांगते नजर आ रहे हैं। स्थानीय लोग इसे हरीश रावत की पहली सफलता के रूप में भी देख रहे हैं कि उन्होंने इस चुनाव को इस हद तक तो अपने पक्ष में कर ही लिया है कि भाजपा को उनके मुकाबले अपने प्रधानमंत्री को चेहरा बनाना पड़ रहा है। राज्य के पत्रकार जयसिंह रावत कहते हैं कि प्रदेश का चुनाव कुछ समय पहले तक ‘हरीश रावत बनाम अन्य’ लग रहा था लेकिन अब यह ‘हरीश रावत बनाम नरेन्द्र मोदी’ हो रहा है। 
 
स्थानीय मुद्दों पर जुबान सिली
 
इतना ही नहीं, यह भी तय लग रहा है कि यहां जो वोट पड़ेंगे वो कांग्रेस या भाजपा से ज्यादा हरीश रावत के पक्ष में या उनके विरोध में पड़ेंगे। पार्टी ने उत्तराखंड में चुनावों की तैयारी तो काफी पहले शुरू कर दी थी लेकिन इसमें स्थानीय नेताओं के नेतृत्व के साथ ही स्थानीय मुद्दों का भी टोटा बना हुआ है। हाल ही में जब प्रधानमंत्री मोदी चुनाव प्रचार के लिए राजधानी देहरादून आए थे तो उन्होंने स्थानीय मुद्दों को उठाने की कोशिश भी की लेकिन उनका यह दांव उल्टा पड़ गया। 
 
अपने संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने प्रदेश सरकार पर निशाना साधते हुए कहा, ‘आपने सुना होगा कि आदमी पैसा खाता है, मार लेता है। पर उत्तराखंड में तो स्कूटर भी पैसा खा जाता है। 5 लीटर की टंकी में यहां 35 लीटर तेल डाला गया।’ प्रधानमंत्री मोदी जब यह बोल रहे थे तो मंच पर उनके साथ बैठे भाजपा नेताओं की स्थिति ‘काटो तो खून नहीं’ जैसी हो गई थी। कारण यह था कि आपदा के दौरान हुए जिस घोटाले का जिक्र प्रधानमंत्री कर रहे थे, उस दौरान प्रदेश के मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा थे, जो अब भाजपा में शामिल हैं और भाषण के दौरान वे भी प्रधानमंत्री के साथ मंच साझा कर रहे थे।
 
विजय बहुगुणा ही नहीं, उनकी बहन रीता बहुगुणा जोशी जो उत्तरप्रदेश कांग्रेस की अध्यक्ष रही हैं लेकिन अब वे भाजपा में हैं, प्रधानमंत्री द्वारा कही गई ‘स्कूटर में तेल’ वाली बात ही उनकी रैली का मुख्य विषय बन गई जिसके चलते उनकी रैली में उमड़ा विशाल जनसैलाब भी गौण हो गया। अगले दिन की सुर्खियों में भीड़ में ज्यादा चर्चा इसी मुद्दे की रही जिसका सीधा फायदा कांग्रेस को मिला।
 
 
भाजपा के पास स्थानीय मुद्दों का इसलिए भी टोटा है, क्योंकि कांग्रेस के अधिकतर विवादित विधायक और मंत्री तो अब भाजपा में ही शामिल हो चुके हैं इसलिए जिन मुद्दों पर वह कांग्रेस को घेर सकती थी, वे मुद्दे अब भाजपा के ही गले की फांस बन रहे हैं। कई जानकार यह भी मानते हैं कि जो सत्ता-विरोधी लहर असल में कांग्रेस को झेलनी थी, वह अब बागी विधायकों को शामिल करने के चलते भाजपा को भी झेलनी पड़ सकती है।
 
हालांकि स्थानीय स्तर पर भुनाने के लिए भाजपा के पास यह मुद्दा जरूर है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में देश की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार लगभग सभी महत्वपूर्ण पदों पर उत्तराखंड के ही लोगों को चुना गया है। राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, नए आर्मी चीफ बिपिन रावत और नए रॉ प्रमुख अनिल कुमार धस्माना- ये तीनों ही उत्तराखंड से आते हैं लेकिन ये तीनों ही लोग गढ़वाल क्षेत्र से आते हैं, जहां भाजपा को पहले से ही मजबूत माना जा रहा है।
 
दरअसल कांग्रेस में हुई बगावत में जो विधायक शामिल थे, लगभग वे सभी गढ़वाल क्षेत्र से आते हैं इसलिए उन्होंने जब कुमाऊं क्षेत्र से आने वाले हरीश रावत के खिलाफ बगावत की, तो इस मुद्दे ने ‘गढ़वाल बनाम कुमाऊं’ का रूप भी लिया। इससे कुमाऊं क्षेत्र में हरीश रावत के प्रति सहानुभूति बढ़ी और इस कारण से वहां आज भी कांग्रेस भाजपा से ज्यादा मजबूत स्थिति में लगती है।
 
इन्हीं तमाम कारणों के चलते सर्वेक्षणों में आगे होने के बावजूद भाजपा उत्तराखंड में परेशान नजर आ रही है। कई जानकार यह भी मानते हैं कि भाजपा को अभी यह भी डर है कि टिकट बंटवारे के समय कहीं उसमें भी फूट न पड़ जाए। कहने का अर्थ है कि कांग्रेस में जो टूट होनी थी, वह हो चुकी है लेकिन भाजपा में यह टूट-फूट होना अभी होनी है। जब बाहर से आए लोगों को टिकट मिलेंगे तो निश्चित ही पुराने कार्यकर्ता नाराज होंगे। 
 
हालांकि भाजपा कैडर-बेस्ड पार्टी है और उसके वोटर प्रत्याशी से ज्यादा पार्टी के नाम पर वोट डालते हैं लेकिन टिकट न मिलने से उनके असंतुष्ट दावेदार निर्दलीय के तौर पर चुनाव में उतर आएं लेकिन वे बाहर से प्रत्याशियों के लिए काम करेंगे, यह यकीन करना मुश्किल है इसलिए हर हालत में पार्टी में असंतोष होना स्वाभाविक है।

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