पैकरे-ख़ुलूस : मक़सूद नश्तरी

बीस-बाईस साल से मेरे शहर इंदौर को न जाने क्या हो गया है? न बंबई बाज़ार में शे'रो-शायरी की महफिलें मुनअकिद हो रही हैं और न रानीपुरा में। वरना ये दोनों मोहल्ले अपनी अदबी ख़िदमात के लिए मशहूर थे। एक तरफ़ 'शादाँ' इंदौरी, 'ताबाँ' इंदौरी और 'बेधड़क' इंदौरी।


मक़सूद ने अपनी कामयाबी और कामरानी का सेहरा हमेशा अपने बुज़ुर्गों के सर बाँधा है-
जो सादगी मेरे असलाफ़ से मिली मुझको
बसद ख़ुलूस वो अपनाई सादगी मैंने

बुज़र्गों की दुआओं का असर 'मक़सूद' ै, वरना
न होता कामरां तू, और इस क़ाबिल नहीं होता

'मक़सूद' ये तो हज़रते 'नश्तर' का फैज़ है
लाज़िम है उनकी याद को दिल में बसा रखो

सुख़न फ़हमों में हो, 'मक़सूद' शामिल
सिला ये आपकी खिदमात का है

'मक़सूद' अपने इब्तिदाई दौर से ही बड़े ज़हीन और समझदार साबित हुए हैं। ख़िदमत करते थे, 'कैसर' इंदौरी, 'नश्तर' इंदौरी, 'सादिक़' इंदौरी और रौनक़ इंदौरी जैसे कोहना मश्क़ शोअरा की। साथ रहते थे, 'आदिल जाफ़री' और 'अज़ीज़' इंदौरी जैसे बा शऊर शोअरा के और अपने मुतालए में शरीक रखते थे, ऐवाने उर्दू के संगे बुनियाद, जोश, जिगर, दाग़, इक़बाल, मोमिन, ग़ालिब और मीर को

वक़ारे फ़िक्रो फ़न का क़ाफ़िला 'मक़सूद' लुट जाता
अगर इक़बाल-ओ ग़ालिब से न अर्बा बे क़लम होत

क़द्र कीजिए ऐ 'मक़सूद' वो है मोहतरम
नाम लेवा जो भी है इक़बाल, ग़ालिब, मीर का

शेर'ओ सुख़न में जीत मयस्सर न हो सकी
बाज़ी सभी तो हार गए 'मीर' के सिवा

दाग़-ओ-मोमिन को बहोत तुम ने पढ़ा है 'मक़सूद'
अपनी ग़ज़लों में जो लफ़्ज़ों के गुहर आए हैं

मुझको है 'मक़सूद' ज़ौक़े शायरी
मोअतकीद हूँ मैं कलामे 'मीर' का

'मक़सूद' नश्तरी सादा दिल और नेक सीरत इंसान है। दिल में ख़ुदा का ख़ौफ़ और महमूबे ख़ुदा की याद हमेशा रहती है। इसका सुबूत 'तहरीर' में जगह-जगह दिखाई देता है। ग़ज़ल में हम्द और नाअत के शेर कह देना उनकी कई अहम ख़ूबियों में से एक है-

पिलाई साक़ी-ए-कौसर ने जो मय-ए-वेहदत
उसी का हम तो अज़ल से ख़ुमार लाए हैं

वो ख़ालिक़े हयात है सबका खुदा भी है
वो लायक़े इबादते, हम्दो सना भी है

जब भी उस ज़ाते मुक़द्दस का ख़्याल आया है
झुक गई स़जदे में पेशानी इबादत हो गई

मैं भी इक फूल की मानिंद ही महकूँ हरसू
ऐ ख़ुदा मुझमें भी खुशबूएँ पयम्बर रख द

माह में तारों में शमऐबज़्म में हर शै में तू
तेरे जलवों से हुईं आँखें मुनव्वर रात भर

WD|
- अजीज अंसार

बीस-बाईस साल से मेरे शहर इंदौर को न जाने क्या हो गया है? न बंबई बाज़ार में शे'रो-शायरी की महफिलें मुनअकिद हो रही हैं और न रानीपुरा में। वरना ये दोनों मोहल्ले अपनी अदबी ख़िदमात के लिए काफ़ी मशहूर थे। एक तरफ़ 'शादाँ' इंदौरी, 'ताबाँ' इंदौरी और 'बेधड़क' इंदौरी का बोलबाला था तो दूसरी तरफ 'क़ैसर' इंदौरी, 'नश्तर' इंदौरी और 'ज़ंबूर' इंदौरी अवाम के दिलो-दिमाग़ पर छाए हुए थे।
इन अदबी तका़रीब में शोअरा का इंतिख़ाब और उनसे राब्ता कायम करने का काम बुजुर्ग शोअरा कर लिया करते थे। लेकिन कुछ ऐसे काम भी होते हैं, जिनमें जिस्मानी ताकत और मेहनत दरकार होती है। इस तरह के तमाम कम नौजवान और नौमश्क़ शोअरा अंजाम दिया करते थे।रानीपुरा गली नं. 3, उर्दू मैदान और बज़्मे अदब लायब्रेरी आज भी इन तक़रीबात की गवाही देते हैं। किसी ने ठीक ही कहा है कि अदब की ख़िदमत और बुजुर्गों की दुआ कभी रायगाँ नहीं जाती। इस हक़ीक़त का सुबूत आज हम सबके सामने है - 'इदराक' और 'तहरीर' का ख़ालिक 'मक़सूद' नश्तरी।
'मक़सूद' नश्तरी की ज़ौक़े शायरी और उनकी सादा दिली की जितनी तारीफ़ की जाए कम है। अगर कोई उन्हें ख़ुलूस से शेरो सुख़न की दावत दे दे तो ये कोसों दूर पैदल चलकर भी उसमें शिरकत ज़रूर करते हैं। वो भी पूरी तैयारी के साथ। वक्त की कैद या मौसम की बेरुख़ी भी इनका रास्ता नहीं रोक सकती। इनका ये ज़ौक़ेशायरी, जो जुनून की हद तक है, आज भी क़ायम है।

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