क्यों बिगड़ रहे हैं विद्यार्थी, क्या शिक्षक भी सच्चे शिक्षक नहीं रहे


बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं और बिना ज्ञान के विजय संभव नहीं। जब से इस सृष्टि की संरचना हुई, तब से ही यह परिपाटी पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही है। जो शिक्षक होते हैं, उन्हें सर्वश्रेष्ठ की श्रेणी में रखा गया है। प्राचीनकाल की गुरुकुल की शिक्षा से लेकर आज की कलयुगी शिक्षा तक का सफर बिना गुरु के मार्गदर्शन के असंभव था।
तभी तो कबीरदासजी ने कहा है कि-

'गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागौ पाय।
बलिहारी गुरु आपणै, गोविंद दियो बताय।।

शास्त्रोक्त लिखित- 'तस्मै श्री गुरुवे नम:' के व्याख्यान से हमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है।

पुराने समय में शिक्षक बनना एक सम्मान का प्रतीक था, वहीं अब शिक्षक बनना व्यवसाय का प्रतीक है। अब संपूर्ण जगत में शिक्षा का व्यवसायीकरण तेजी से हो रहा है। अब न तो ऐसे शिक्षक रहे और न ही ऐसे शिष्य। यद्यपि बहुत-सी संस्थाएं व बहुत से शिक्षक नि:स्वार्थ भाव से इस देश की युवा पीढ़ी को सद्मार्ग दिखाने हेतु कार्यरत हैं किंतु जब तक हम जागरूक नहीं होंगे, तब तक ये संस्थाएं कभी सफल नहीं हो सकतीं।

हमारे जीवन का प्रथम शिक्षक हमारे अपने अभिभावक व माता-पिता हैं। युवा पीढ़ी को सही मार्ग दिखाने में हर माता-पिता का बहुत बड़ा रोल होता है, क्योंकि बच्चे का अधिक समय उन्हीं के पास बीतता है। शिक्षा और शिक्षक की गुणवत्ता में दिन-प्रतिदिन कमी आती जा रही है।

उदाहरणत: यदि किसी विद्यालय में 2,000 बच्चे हैं तो उसमें से लगभग 5-7 प्रतिशत ही सर्वोच्चतम ज्ञान/स्थान प्राप्त करते हैं और शेष बच्चे एवरेज या बिलो एवरेज रह जाते हैं। यही अनुपात प्रतिवर्ष होने के कारण बेरोजगारी व असफलता दिनोदिन बढ़ती जा रही है।
परंतु आजकल के माता-पिता व अविभावक अत्यधिक संतानमोह के कारण अपने बच्चों को मोहपाश के मकड़जाल में इस कदर जकड़े हैं कि बच्चे स्वयं सद्मार्ग अपनाने के बजाय कुमार्ग अपनाने में ज्यादा रुचि रख रहे हैं। इसके ये मुख्य कारण हैं-

1. बच्चे को अत्यधिक सुख-सुविधा देना, उनकी गलतियों को गंभीरता से नहीं लेना, उन्हें आत्मनिर्भर बनने हेतु स्वयं निर्णय नहीं लेने देना।

2. उनकी हर जिद पूरी करना ही असफलता का कारण है।
3. सोशल मीडिया व मोबाइल सुमार्ग कम, कुमार्ग का रास्ता ज्यादा देता है।

4. उन्हें हम बचपन से ही मल्टीमीडिया मोबाइल पकड़ा देते हैं जबकि इसकी जगह बटन मोबाइल से भी उनकी पकड़ रख सकते हैं।

5. बचपन से ही उन्हें बाइक व कार पकड़ा देते हैं।

6. पैसे का हिसाब-किताब नहीं पूछते हैं।

7. उनकी सोहबत पर नजर नहीं रखते हैं।

8. परिवार में पाश्चात्य संस्कृति को बढ़ावा देना।

9. बच्चे पर निगरानी का अभाव होना।

यही कारण है कि असफल बच्चे अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने हेतु गलत मार्ग अपना लेते हैं। कहने को तो बहुत कुछ है किंतु समयाभाव के कारण मैं आपसे बस इतना ही कहना चाहूंगा कि बच्चे की परवरिश में कोई कमी न रखें किंतु यह भी याद रखें कि ज्यादातर देखा गया है कि अत्यधिक सुख-सुविधा देना ही बड़े होने पर उनके भविष्य के लिए घातक हो सकता है। हर चीज बैलेंस अनुपात में होनी चाहिए।


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