जानिए कुंभ मेले का पावन इतिहास

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स्वामी वेदानंद  भारत धर्मप्राण देश है। साधु-संत और धर्मलाभ के लिए शत-सहस्र भारतीय नर-नारी तमाम पवित्र तीर्थों में निष्पाप होने के लिए दर्शन करने जाते हैं। प्रत्येक वर्ष लाखों नर-नारी तीर्थों पर इकट्ठे होते हैं। ऐसी स्थिति में सर्वश्रेष्ठ और साक्षात मुक्तिप्रद कुंभयोग में अगणित जन गणों का समावेश हो, तो भारतीयों के लिए कोई अकल्पनीय घटना नहीं है। कुंभ मेला कितना प्राचीन है, इस बारे में कोई निश्चयपूर्वक नहीं कह सकता। कौन इसके प्रथम उद्बोधनकर्ता थे, इसका पता लगाना भी कठिन है। अमृत कुंभयोग के बारे में शास्त्रों में जितनी चर्चा की गई है, उसका उल्लेख किया जा चुका है। संभवत: आर्य जाति जितनी प्राचीन है, उतना ही प्राचीन कुंभ मेला है।

कुंभ महामेला से साधु-संन्यासियों का संयोग किसने किया?
लक्ष-लक्ष तपोशक्ति संपन्न साधु-संन्यासी और सिद्ध महापुरुषों का अपूर्व समागम कुंभ मेला की विशेषता की महत्ता को पवित्र कर देता है। इसे सि‍द्ध करने की पहल किसने की थी? आखिर वह कौन अलौकिक प्रतिभाशाली शक्ति संपन्न महापुरुष था जिन्होंने इस कुंभ मेला में समागत लक्ष-लक्ष नर-नारियों को त्याग, संयम, ब्रह्मचर्य का स्वरूप समझाने, आत्मज्ञान पिपासु नर-नारियों की पिपासा को मिटाने के लि समग्र भारतवर्ष में धर्म की आबहवा संचार किया था। इसके संरक्षण के लिए भारत के तमाम साधु-संन्यासी और महापुरुषों को एकत्रित कर उनका संघटन किया और धर्म महायज्ञ का आयोजन किया था? वे थे सनातन वैदिक धर्म के पुन: प्रवर्तक शिवावतार शंकराचार्य। 
 
कुंभ मेला के आदि प्रवर्तक आचार्य शंकर नहीं थे
भारतीय जन-जीवन का इतिहास के अध्ययन से ज्ञात होता है कि आचार्य शंकर साधु-सम्मलेन के प्रवर्तक नहीं थे। महाभारत, भागवत, पुराणादि से ज्ञात होता है कि अनादिकाल से भारत में ऐसे सम्मेलन होते आए हैं। नै‍मिषारण्य, कुरुक्षेत्र, प्रभासादि पुण्य क्षेत्रों में असंख्य ऋषि-महर्षि और साधु-महात्मा एकत्रित्र होकर याग-यज्ञ, तपोहनुष्ठान और शास्त्रार्थ करते रहे। देश तथा समाज की स्थिति, रीति, प्रकृति पर विचार-विमर्श करते हुए धर्म की सृष्टि और संरक्षण की व्यवस्था करते रहे। बौद्ध युग में हम देखते हैं कि बौद्ध-संन्यासियों ने समय-समय पर विभिन्न पुण्य स्थानों में संघ महासं‍गीति का अधिवेशन कर संघ, धर्म और बुद्ध की अमृतवाणी का प्रचार किया था। मानव जाति की शाश्वत कल्याण के उपायों पर विचार करते रहे। बौ‍द्ध सम्राट श्री हर्षवर्धन प्रयाग में प्रति पांचवें वर्ष सर्व त्याग यज्ञ अनुष्ठित करते थे, जहां अगणित साधु और महापुरुषों का सम्मेलन होता था, जिसकी स्मृति कुंभ मेला की याद दिला रही है। 
 
आचार्य शंकर कुंभ मेला के संगठक थे
बौद्ध धर्म के बाद जब देश में अनाचार-व्यभिचार, कदाचार तेजी से फैलने लगा तब वैदिक धर्म के मूर्त विग्रह श्रीमत शंकराचार्य ने अपनी अपूर्व प्रतिभा तथा आध्यात्मिक शक्ति के जरिए समस्त भारत में वेदांत का डंका बजाया। उत्तर-दक्षिण-पूर्व-पश्चिम, भारत के चारों दिशाओं में चार मठ स्थापित कर उन्होंने संन्यासी-संघ का उद्घाटन किया। धर्म के प्रचार तथा संरक्षण के लिए कुंभयोग के अवसर पर पूर्वोक्त चारों स्थानों में उन लोगों को उपस्थित होने का आदेश दिया- उसी समय से ही वर्तमान कुंभ मेला की प्रतिष्ठा हुई है। आगे चलकर धीरे-धीरे सभी संप्रदायों का समागम होकर यह महोत्सव परिपुष्ट और महिमान्वित होकर वर्तमान समय में विराट रूप धारण कर चुका है।
 
'तीर्थीकुर्व्वन्ति माधव:'- साधु-महापुरूषों के पदार्पण से ही तीर्थ पवित्रता तथा अपने नाम की योग्यता प्राप्त करता है। अस्तु लाखों की संख्या में साधु-संन्यासी जहां एकत्रित होते हैं, वहां आकाश-पाताल, जल-वायु, धूलकल तक पवित्र मुक्तिप्रद और धर्म भाववर्धक बन जाते हैं। साधु-सम्मेलन ही कुंभ मेला की जीवन-शक्ति हैं। यहां नर-नारियों का जो समूह आता है, वह तीर्थस्‍थान के निमित्त नहीं आते जितना कि साधु-महात्माओं के दर्शन की लालसा लेकर आते हैं, उनका स्पर्श और आशीर्वाद प्राप्त करना चाहते हैं। ये जो सहस्रों की संख्या में सर्वत्यागी, तपस्वी साधु-महात्मा, जो लोग मृत्यु को जय करने के पश्चात अमृतत्व की तलाश के व्रती हैं, इनका विराट समावेश जहां है, वहीं तो अमृत का प्रस्रवण है। इसी प्रकार कुंभ मेला अमृतवर्षी है। पौराणिक कहानी का रहस्यमय रूपक इसी प्रकार वास्तविक ग्रहण कर चुका है। 
 
कलशस्य मुखे विष्णु कण्ठे रुद्र समाश्रित:।
मूलेतत्रस्‍थितो ब्रह्मा मध्ये मातृगणा: स्थिता:।।
कुक्षौ तु सागरा: सर्वे सप्तद्वीपा वसुन्‍धरा।
ऋग्वेदोऽथ यजुर्वेद: सामवेदो ह्यथवर्ण।।
अंगैश्च सहिता: सर्वे कुम्भं तु समाश्रिता:।

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