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जो विवाह को छोड़कर साथ रहना तय करते हैं उनका पतन तय है!

अंधकार काल में विवाह जैसा कोई संस्कार नहीं था। कोई भी पुरुष किसी भी स्त्री से यौन-संबध बनाकर संतान उत्पन्न कर सकता था। समाज में रिश्ते और नाते जैसी कोई व्यवस्था नहीं होने के कारण मानव जंगली नियमों को मानता था। पिता का ज्ञान न होने से मातृपक्ष को ही प्रधानता थी तथा संतान का परिचय माता से ही दिया जाता था। धरती पर सर्वप्रथम आर्यों या कहें कि वैदिक ऋषियों ने ही मानव को सभ्य बनाने के लिए सामाजिक व्यवस्थाएं लागू की और लोगों को एक सभ्य समाज में बांधा। पाशविक व्यवस्था को परवर्ती काल में ऋषियों ने चुनौती दी तथा इसे पाशाविक संबध मानते हुए नए वैवाहिक नियम बनाए। ऋषि श्वेतकेतु का एक संदर्भ वैदिक साहित्य में आया है कि उन्होंने मर्यादा की रक्षा के लिए विवाह प्रणाली की स्थापना की और तभी से कुटुंब-व्यवस्था का श्री गणेश हुआ।
 
विवाह परिवार का आधार है। विवाह नहीं तो परिवार भी नहीं। विवाह का प्रचलन आदिकाल में ही वैदिक ऋषियों ने प्रारंभ करवा दिया था। विवाह करके ही जीवन निर्वाह करना सभ्य होने की निशानी है। विवाह= वि+वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है- विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) वहन करना। इसे कहते हैं। यह हिन्दू धर्म के 16 संस्कारों में से एक है। हिन्दू धर्म संस्कारों में 'त्रयोदश संस्कार' है। स्नातकोत्तर जीवन विवाह का समय होता है, अर्थात् विद्याध्ययन के पश्चात विवाह करके गृहस्थाश्रम में प्रवेश करना होता है।
 
कुलनाशक विवाह : विवाह करके एक पत्नी व्रत धारण करना ही सभ्य मानव की निशानी है। इस प्रथा से व्यक्ति जहां पिता, दादा और ससुर आदि बनता है वहीं वह अपने कुल-खानदान को तारने वाला भी होता है, लेकिन जो पुरुष या स्त्री किसी धार्मिक रीति से विवाह न करके तथाकथित आपसी समझ के माध्यम से संबंधों में रहते हैं उनका व्यक्तित्व और जीवन इसी बात से प्रकट होता है कि वे क्या हैं। वर्तमान काल में कुछ लोग में रहकर समाज को दूषित कर विवाह संस्था को खत्म करने में लगे हैं, लेकिन यह उनकी भूल है। यह विवाह संस्था की उपयोगिता को और मजबूत करेगी, क्योंकि लीव इन में रहने वालों का पतन तभी सुनिश्चत हो जाता है जबकि वे ऐसा रहने का तय करते हैं। इस मामले में लड़का हमेशा फायदे में ही रहता है क्योंकि जहां यह बहुविवाह का एक आधुनिक रूप है वहीं यह पाशाविक संबध है। 
 
वर्तमान में देखा गया है कि उक्त निषेध तरह के विवाह का प्रचलन भी बढ़ा है जिसके चलते समाज में बिखराव, पतन, अपराध, हत्या, आत्महत्या आदि को स्वाभाविक रूप से देख सकते हैं। इस तरह के विवाह कुलनाश और देश के पतन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते आए हैं। आधुनिकता के नाम पर निषेध विवाह को बढ़ावा देना देश और धर्म के विरुद्ध ही है। खैर..
 
मनमानी रीति से विवाह : ऐसे भी कई लोग हैं जो विधिवत वैदिक हिंदू रीति से विवाह न करके अन्य मनमानी रीति से विवाह करते हैं। वे यह मुहूर्त, समय, अष्टकूट मिलान, मंगलदोष आदि की भी परवाह नहीं करते हैं। इसका दूष्परिणाम भी स्वत: ही प्रकट होता है।

दरअसल, हिन्दू धर्म में विवाह एक संस्कार ही नहीं है यह पूर्णत: एक ऐसी वैज्ञानिक पद्धति है जो व्यक्ति के आगे के जीवन को सुनिश्चत करती है और जो उसके भविष्य को एक सही दशा और दिशा प्रदान करती है।

हिन्दू धर्म में विवाह एक अनुबंध या समझौता नहीं है यह भलीभांति सोच समझकर ज्योतिषीय आधार पर प्रारब्ध और वर्तमान को जानकर तय किया गया एक आत्मिक रिश्ता होता है। इस विवाह में किसी भी प्रकार का लेन-देन नहीं होता है। हिन्दू विवाह संस्कार अनुसार बेटी को देना ही सबसे बड़ा दहेज होता है। हालांकि शास्त्रों में कहीं भी दहेज शब्द का उल्लेख नहीं मिलता है। यह प्रथा समाज द्वारा प्रचलित है।
 
इस तरह करें विवाह:-
1.ब्रह्म विवाह : दोनों पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना 'ब्रह्म विवाह' कहलाता है। सामान्यतः इस विवाह में वैदिक रीति और नियम का पालन किया जाता है। इस विवाह में कुंली मिलान को उचित रीति से देख लिया जाता है। मांगलिक दोष मात्र 20 प्रतिशत ही बाधक बन सकता है। वह भी तब जब अष्टमेश एवं द्वादशेश दोनों के अष्टम एवं द्वादश भाव में 5 या इससे अधिक अंक पाते हैं। मांगलिक के अलावा यदि अन्य मामलों में कुंडली मिलती है तो विवाह सुनिश्चित कर दिया जाता है। अत: मंगल दोष कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं होती है।
 
वर द्वारा मर्यादा स्वीकारोक्ति के बाद कन्या अपना हाथ वर के हाथ में सौंपे और वर अपना हाथ कन्या के हाथ में सौंप दे। इस प्रकार दोनों एक दूसरे का पाणिग्रहण करते हैं। यह क्रिया हाथ से हाथ मिलाने जैसी होती है। मानों एक दूसरे को पकड़कर सहारा दे रहे हों। कन्यादान की तरह यह वर-दान की क्रिया तो नहीं होती, फिर भी उस अवसर पर वर की भावना भी ठीक वैसी होनी चाहिए, जैसी कि कन्या को अपना हाथ सौंपते समय होती है। वर भी यह अनुभव करें कि उसने अपने व्यक्तित्व का अपनी इच्छा, आकांक्षा एवं गतिविधियों के संचालन का केन्द्र इस वधू को बना दिया और अपना हाथ भी सौंप दिया। दोनों एक दूसरे को आगे बढ़ाने के लिए एक दूसरे का हाथ जब भावनापूर्वक समाज के सम्मुख पकड़ लें, तो समझना चाहिए कि विवाह का प्रयोजन पूरा हो गया।
 
मनुष्य के ऊपर देवऋण, ऋषिऋण एवं पितृऋण- ये तीन ऋण होते हैं। यज्ञ-यागादि से देवऋण, स्वाध्याय से ऋषिगण तथा उचित रीति से ब्रह्म विवाह करके पितरों के श्राद्ध-तर्पण के योग्य धार्मिक एवं सदाचारी पुत्र उत्पन्न करके पितृऋण का परिशोधन होता है। इस प्रकार पितरों की सेवा तथा सदधर्म का पालन करने की परंपरा सुरक्षित रखने के लिए संतान उत्पन्न करना विवाह का परम उद्देश्य है। यही कारण है कि हिन्दू धर्म में ब्रह्म विवाह को एक पवित्र-संस्कार के रूप में मान्यता दी गयी है।
 
पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का संबंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संबंध से अधिक आत्मिक संबंध को महत्व दिया जाता है और यह संबंध धार्मिक रीति से किए गए विवाह और उस विवाह के वचन और फेरों को ध्यान में रखने तथा विश्वास को हासिल करने से कायम होते हैं। जिस व्यक्ति ने अपने जीवन में बचपन में धर्म, अध्यात्म और दर्शन का अध्ययन नहीं किया है उसके लिए विवाह एक संस्कार मात्र ही होता है।
 
वासना का दाम्पत्य-जीवन में अत्यन्त तुच्छ और गौण स्थान है, प्रधानतः दो आत्माओं के मिलने से उत्पन्न होने वाली उस महती शक्ति का निमार्ण करना है, जो दोनों के लौकिक एवं आध्यात्मिक जीवन के विकास में सहायक सिद्ध हो सके। श्रुति का वचन है- दो शरीर, दो मन और बुद्धि, दो ह्रदय, दो प्राण व दो आत्माओं का समन्वय करके अगाध प्रेम के व्रत को पालन करने वाले दंपति उमा-महेश्वर के प्रेमादर्श को धारण करते हैं, यही विवाह का स्वरूप है। 
 
इसलिए कहा गया है 'धन्यो गृहस्थाश्रमः'। सद्गृहस्थ ही समाज को अनुकूल व्यवस्था एवं विकास में सहायक होने के साथ श्रेष्ठ नई पीढ़ी बनाने का भी कार्य करते हैं। वहीं अपने संसाधनों से ब्रह्मचर्य, वानप्रस्थ एवं सन्यास आश्रमों के साधकों को वाञ्छित सहयोग देते रहते हैं। ऐसे सद्गृहस्थ बनाने के लिए विवाह को रूढ़ियों-कुरीतियों से मुक्त कराकर श्रेष्ठ संस्कार के रूप में पुनः प्रतिष्ठित करना आवश्क है।

आलेख संदर्भ : श्रीराम शर्मा आचार्य के विचारों को पढ़ते हुए, अखंड ज्योति से साभार
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