अगर ऐसे करते हैं उपवास तो नहीं मिलेगा आपको फल

हिन्दू धर्म में संपूर्ण वर्ष में कई प्रकार के आते हैं, जैसे वार के उपवास, माह में दूज, चतुर्थी, एकादशी, प्रदोष, अमावस्या या पूर्णिमा के उपवास। वर्ष में नवरात्रि, या के उपवास आदि। लेकिन संभवत: बहुत कम लोगों को मालूम होगा कि उपवास का विधान क्या है। अधिकतर लोग तो खूब फरियाली खाकर उपवास करते हैं या अपने मन से नियम बनाकर उपवास करते हैं।

यह देखा गया है कि नवरात्रि में कुछ लोग चप्पल छोड़ देते हैं लेकिन गाली देना नहीं। जबकि नवरात्रि में यदि आप उपवास कर रहे हैं तो यात्रा, सहवास, वार्ता, भोजन आदि त्यागकर नियमपूर्वक उपवास अर्थात माता के पास रहना होता है। उपवास का अर्थ ही होता है कि किसी का अपने मन में वास करना। का अर्थ होता है तप या संकल्प।

हालांकि उपवास में कई लोग साबूदाने की खिचड़ी, फलाहार या राजगिरे की रोटी और भिंडी की सब्जी खूब ठूसकर खा लेते हैं। इस तरह के उपवास से कैसे लाभ मिलेगा? उपवास के शस्त्रों में उल्लेखित नियम का पालन करेंगे तभी तो लाभ मिलेगा।


1.मन : उपवास करते वक्त मन में जो विचार चल रहे हैं उस पर ध्यान देना जरूरी है। मन में बुरे-बुरे विचार आ रहे हैं या आप बुरा सोच रहे हैं तो कैसे मिलेगा लाभ?
2.वचन : आप किसी से किसी भी प्रकार की वार्तालाप कर रहे हैं तो उसमें शब्दों के चयन पर ध्यान देना जरूरी है। असत्य और अपशब्द बोल रहे हैं तो कैसे मिलेगा लाभ?
3.कर्म : आप कुछ भी कर रहे हैं तो उस कर्म पर ध्यान दें। खूब सोना, सहवास करना या क्रोध करना उपवास में वर्जित होता है।


उपवास के दौरान क्या करें?
मन, वचन और कर्म से शुद्ध और पवित्र बने रहें। इस दौरान फर्श पर सोना और सूर्योदय से पहले उठना बहुत शुभ माना जाता है। उठने के बाद अच्छे से स्नान करना और अधिकतर समय मौन रहना चाहिए।


उपवास के कई प्रकार होते हैं उन्हें अच्छे से जान लें। व्रत या उपवास में एक समय भोजन करने को एकाशना या अद्धोपवास कहते हैं। ऐसा नहीं कर सकते कि आप सुबह फलाहार ले लें और फिर शाम को भोजन कर लें। इसी तरह पूरे समय व्रत करने को पूर्णोपवास कहते हैं। पूर्णोपवास के दौरान जल ही ग्रहण किया जाता है।

कुछ दिनों तक सिर्फ रसदार फलों या भाजी आदि पर रहना फलोपवास कहलाता है। अगर फल बिलकुल ही अनुकूल न पड़ते हो तो सिर्फ पकी हुई साग-सब्जियां खानी चाहिए। नवरात्रि में अक्सर ये उपवास किया जाता है, लेकिन साबूदाने के प्रचलन के चलते लोग दोनों समय खूब डटकर साबूदाने की खिचड़ी खाकर मस्त रहते हैं। उसमें भी दही मिला लेते हैं। ऐसे में तो फिर व्रत या उपवास का कोई मतलब नहीं। व्रत या उपवास का अर्थ ही यही है कि आप भोजन को त्याग दें।

चातुर्मास के व्रत में तो दूध, शकर, दही, तेल, बैंगन, पत्तेदार सब्जियां, नमकीन या मसालेदार भोजन, मिठाई, सुपारी, मांस और मदिरा का सेवन नहीं किया जाता। श्रावण में पत्तेदार सब्जियां यथा पालक, साग इत्यादि, भाद्रपद में दही, आश्विन में दूध, कार्तिक में प्याज, लहसुन और उड़द की दाल आदि का त्याग कर दिया जाता है।


श्रावण व्रत : व्रत ही तप है। यह उपवास भी है। हालांकि दोनों में थोड़ा फर्क है। व्रत में मानसिक विकारों को हटाया जाता है, तो उपवास में शारीरिक। इन व्रतों या उपवासों को कैसे और कब किया जाए, इसका अलग नियम है। नियम से हटकर जो मनमाने व्रत या उपवास करते हैं, उनका कोई धार्मिक महत्व नहीं। व्रत से जीवन में किसी भी प्रकार का रोग और शोक नहीं रहता। व्रत से ही मोक्ष प्राप्त किया जाता है। श्रावण माह को व्रत के लिए नियुक्त किया गया है। में उपाकर्म व्रत का महत्व ज्यादा है, इसे 'श्रावणी' भी कहते हैं।

उपवास के लाभ : अगर आप उपवास करने का तरीका व उपवास के प्रकार के बारे में जानकर उपवास करेंगे तो निश्चित ही लाभ मिलेगा। उपवास में जहां शरीर स्वस्थ होता है वहीं उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है। उपवास से मानसिक सुदृढ़ता बढ़ती है और आत्मबल का विाकस होता है। उपवास जिस उद्देश्य के लिए किया गया है वह पूर्ण होता है। यदि किसी भी प्रकार की मनोकामना की गई है और उपवास नियम और ईमादनारी से किया गया है तो निश्चित ही मनोकामना पूर्ण होती है।


उपवास से पाचन क्रिया सही होती है। वजन नियंत्रित होता है। स्मरण शक्ति बढ़ती है। कोलेस्ट्रॉल की मात्रा सही बनी रहती है। शरीर से विजातीय पदार्थबाहर निकल जाते हैं।

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