क्या महानदी की सभ्यता सिंधु सभ्यता से भी प्राचीन है?

अनिरुद्ध जोशी 'शतायु'|
मानव सभ्यता का उद्भव और संस्कृति का प्रारंभिक विकास नदी के किनारे ही हुआ है। छत्तीसगढ़ और उड़ीसा की सबसे बड़ी नदी महानदी का प्राचीन नाम चित्रोत्पला था। इसके अलावा इसे महानंदा और नीलोत्पला के नाम से भी जाना जाता है।

महानदी का उद्गम रायपुर के समीप धतरी जिले में स्थित सिहावा नामक पर्वत से हुआ है। इस नदी का प्रवाह दक्षिण से उत्तर की ओर है। इस नदी को 'छत्तीसगढ़ की गंगा' भी कहा जाता है। छत्तीसगढ़ में कई ऐसे क्षेत्र हैं जहां दस हजार वर्ष पूर्व प्राचीन सभ्यता होने के प्रमाण मिले हैं। अबूझमाड़ के जंगल की गुफाएं हो या लीलर-अरौद जैसे तट पर बसे प्राचीन स्थान।

प्राचीन काल में छत्तीसगढ़ को 'दक्षिण कोशल' के नाम से जाना जाता था। इस क्षेत्र का उल्लेख रामायण और महाभारत में भी मिलता है। यह दंडकारण्य वन का एक हिस्सा था। अत्रि ऋषि के आश्रम में कुछ दिन रुकने के बाद श्रीराम ने मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के घने जंगलों को अपना आश्रय स्थल बनाया था। यह जंगल क्षेत्र था दंडकारण्य। दंडक राक्षस के कारण इसका नाम दंडकारण्य पड़ा। दंडकारण्य में महानदी और गोदावरी बहती है। वर्तमान में करीब 92,300 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल में फैले इस इलाके के पश्चिम में अबूझमाड़ पहाड़ियां तथा पूर्व में इसकी सीमा पर पूर्वी घाट शामिल हैं। दंडकारण्य में छत्तीसगढ़, ओडिशा एवं राज्यों के हिस्से शामिल हैं। इसका विस्तार उत्तर से दक्षिण तक करीब 320 किमी तथा पूर्व से पश्चिम तक लगभग 480 किलोमीटर है।
'अत्रि-आश्रम' से 'दंडकारण्य' आरंभ हो जाता है। छत्तीसगढ़ के कुछ हिस्सों पर श्री राम के नाना और कुछ पर बाणासुर का राज्य था। यहां की नदियों, पहाड़ों, सरोवरों एवं गुफाओं में राम के रहने के सबूतों की भरमार है। यहीं पर राम ने अपना वनवास काटा था। यहां वे लगभग 10 वर्षों से भी अधिक समय तक रहे थे।

इसी दंडकारण्य का ही हिस्सा है आंध्रप्रदेश का एक शहर भद्राचलम। गोदावरी नदी के तट पर बसा यह शहर सीता-रामचंद्र मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। यह मंदिर भद्रगिरि पर्वत पर है। कहा जाता है कि श्रीराम ने अपने वनवास के दौरान कुछ दिन इस भद्रगिरि पर्वत पर ही बिताए थे।
मध्यप्रदेश एवं छत्तीसगढ़ क्षेत्रों में नर्मदा व महानदी नदियों के किनारे 10 वर्षों तक उन्होंने कई ऋषि आश्रमों का भ्रमण किया। दंडकारण्य क्षेत्र तथा सतना के आगे वे विराध सरभंग एवं सुतीक्ष्ण मुनि आश्रमों में गए। बाद में सतीक्ष्ण आश्रम वापस आए। पन्ना, रायपुर, बस्तर और जगदलपुर में कई स्मारक विद्यमान हैं। उदाहरणत: मांडव्य आश्रम, श्रृंगी आश्रम, राम-लक्ष्मण मंदिर आदि।

छत्तीसगढ़ के धमतरी जिले में महानदी के किनारे ही सभ्यता का विकास हुआ। महानदी के रेत के नीचे हजारों साल का इतिहास दफन है। अरौद में महापाषाण काल का श्मशान घाट और महानदी के किनारे चट्टाननुमा बंदरगाह मिलने के बाद भी इस क्षेत्र की व्यापक खुदाई नहीं की गई। इसलिए जमींदोज हो चुकी प्राचीन सभ्यता के रहस्य से पर्दा नहीं उठ पा रहा है। अभी तक स्पष्ट नहीं हो पाया है कि धमतरी जिले की सभ्यता कितनी पुरानी है।
जिला मुख्यालय से 20 किमी दूर महानदी से लगा ग्राम अरौद है। पुरातात्विक महत्व के ग्राम लीलर, दरगहन और सलोनी भी महानदी तट पर इसी रोड में पड़ते हैं। इन गांवों में अब तक ज्ञात 3 हजार साल पुरानी सभ्यता का इतिहास दबा पड़ा है। महानदी किनारे अरौद के बंदरगाहनुमा चट्टान का निरीक्षण करने के बाद अधिकांश पुरातत्ववेत्ताओं और शोधकर्ताओं ने महानदी की रेत में बड़े-बड़े चट्टानों को देखकर इसे प्राचीन काल का छोटा बंदरगाह करार दिया था।
उनका तर्क था कि यहां छोटे-छोटे नाव ठहरते थे। 3 हजार साल पहले महानदी उफान पर होती थी। उस समय यातायात के लिए जल मार्ग का उपयोग होता रहा होगा। कुछ पुरातत्वविदों का अनुमान था कि ये पत्थरनुमा चट्टान नहाने और कपड़ा धोने के पुराने घाट भी हो सकते हैं। ये बंदरगाह है या घाट, इसकी वास्तविकता जानने के लिए पुरातात्विक खुदाई जरूरी है। लेकिन पुरातत्व शोध हुए 5 साल बीत गए न खुदाई शुरू हुई और न ही पुरातत्व विभाग ने दोबारा इस क्षेत्र में कोई शोध किया।
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छत्तीसगढ़ के दंडकारण्य में गिद्धराज जटायु का मंदिर है। यह वह स्थान है जब सीता का अपहरण कर रावण पुष्पक विमान से लंका जा रहा था, तो सबसे पहले जटायु ने ही रावण को रोका था। राम की राह में जटायु पहले शहीद थे। स्थानीय मान्यता के मुताबिक दंडकारण्य के आकाश में ही रावण और जटायु का युद्ध हुआ था और जटायु के कुछ अंग दंडकारण्य में आ गिरे थे। ऐसा माना जाता है कि दुनिया भर में सिर्फ यही जटायु का एकमात्र मंदिर है। दुनिया के इकलौते जटायु मंदिर को देखना काफी दिलचस्प अनुभव है। जटायु की राम से पहली मुलाकाता पंचवटी (नासिक के पास) हुई थी जहां वे रहते थे। लेकिन उनकी मृत्यु दंडकारण्य में हुई।
छत्तीसगढ़ का भू-भाग, पुरातात्विक, सांस्कृतिक और धार्मिक पर्यटन की दृष्टि से अत्यंत संपन्न है फिर चाहे वह कांकेर घाटी हो, विश्व प्रसिद्ध चित्रकोट का जलप्रपात हो या फिर कुटुमसर की गुफाएं ही क्यों न हों। प्राकृतिक सौंदर्य से सराबोर सदाबहार लहलहाते सुरम्य वन, जनजातियों का नृत्य-संगीत और घोटुल जैसी परंपरा यहाँ का मुख्य आकर्षण हैं।

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छत्तीसगढ़ के प्रयागराज कहे जाने वाले राजिम के सीताबाड़ी में पुरातत्व विभाग द्वारा खुदाई की गई। राजिम में मौर्यकाल तक के अवशेष मिले थे। हालांकि उत्खनन में अब तक मौर्यकाल से पहले के भी दो तह मिल चुके हैं, जिन्हें आज से लगभग 2800 साल पूर्व का आंका जा रहा है। वरिष्ठ पुरातत्व सलाहकार, सीताबाड़ी खुदाई के प्रभारी डॉ. अरुण शर्मा ने कहा, "सिरपुर के उत्खनन में करीब 2600 वर्ष पहले के अवशेष प्राप्त हुए थे। लेकिन राजिम में अभी तक उत्खनन के सबसे नीचे तह में करीब 2800 वर्ष पूर्व की तराशे हुए पत्थरों से निर्मित दीवारें मिल रही हैं, जिनसे बड़े-बड़े कमरे बनते हैं। उसके ऊपर की तह में कम से कम 20 गुणा 20 मीटर में काले पत्थर की तह मिल रही है, जो एक बड़े-बड़े प्रांगण की ओर इंगित करती है।"
शर्मा ने बताया, "मौर्यकाल से पहले के भी सभ्यता के अवशेष सीताबाड़ी में मिल रहे हैं। यहां सातवाहन काल का लाल पत्थर का स्तंभ भी मिला है, जिसमें शंखलिपि में लिखा हुआ है। यह छत्तीसगढ़ में दूसरा मौका है, जब शंखलिपि की लिखावट वाला स्तंभ मिला है। इससे पहले शंखलिपि की लिखावट मल्हार में मिली थी। इस स्तंभ (पिल्हर) के मिलने से यह साफ होता है कि यहां सातवाहन काल के अलावा एक बड़ा मंदिर था।"
डॉ. शर्मा ने कहा कि सीताबाड़ी की खुदाई में पांच तहों से साफ प्रमाण मिलते हैं कि यहां कम से कम पांच बार भयंकर बाढ़ आ चुकी है। अब तक हुई खुदाई में दो बड़े कमरे, लंबी दीवार, दो चूल्हे, साबूत पत्थर के बने स्तंभ, लोहे की कीलें, कीलों के ऐरो हेड और तांबे के पिन मिले हैं। खुदाई में टेराकोटा की सांड की प्रतिमा मिली है। सफेद पत्थर से निर्मित यह प्रतिमा चार इंच ऊंची और छह इंच लंबी है। इसकी खासियत है कि यह इस प्रतिमा के नीचे चक्का लगाने के लिए छेद हुआ है। यह प्रतिमा लगभग 1400 साल पूर्व की है। सिरपुर में 1956 के बाद 2006 में पुनः पुरातात्विक उत्खनन प्रारंभ कराया गया जिससे 32 प्राचीन टीलों पर अत्यंत प्राचीन संरचनाएं प्रकाश में आईं।

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कुटुमसर की गुफाएं : कुटुमसर की गुफाओं में रहते थे आदि मानव। एक अध्ययन से पता चला है कि लाखों वर्ष पूर्व प्रागैतिहासिक काल में बस्तर की कुटुमसर की गुफाओं में मनुष्य रहा करते थे। फिजिकल रिसर्च लैबोरेटरी अहमदाबाद, इंस्टीट्यूट ऑफ पेलको बॉटनी लखनऊ तथा भूगर्भ अध्ययन शाला लखनऊ ने यह जानकारी दी है।

विश्वप्रसिद्ध बस्तर की कुटुमसर की गुफाएं कई रहस्यों को अभी भी अपने में समेटे हुए है जिनका भूगर्भ शास्त्रियों द्वारा लगातार अध्ययन किया जा रहा है। भूगर्भशास्त्रियों का कहना है कि करोड़ों वर्ष पूर्व क्षेत्र में कुटुमसर की गुफाऐं स्थित हैं वह क्षेत्र पूरा पानी में डूबा हुआ था। गुफाओं का निर्माण प्राकृतिक परिवर्तनों साथ साथ पानी के बहाव के कारण हुआ।
कुटुमसर की गुफाएं जमीन से 55 फुट नीचे हैं। इनकी लंबाई 330 मीटर है। इस गुफा के भीतर कई पूर्ण विकसित कक्ष हैं जो 20 से 70 मीटर तक चौड़े हैं। फिजिकल रिसर्च लेबोरेटरी अहमदाबाद के शोधकर्त्ताओं ने इन्हीं कक्षों के अध्ययन के बाद निष्कर्ष पर पहुंचे है कि करोड़ों वर्ष पूर्व यहां के आस पास के लोग इन गुफाओं में रहा करते थे। संभवत: यह प्रागैतिहासिक काल था।

चूना पत्थर से बनी कुटुमसर की गुफाओं के आंतरिक और बाह्य रचना के अध्ययन के उपरांत भूगर्भशास्त्री कई निष्कर्षों पर पहुंचे हैं। उदाहरण के लिए चूना पत्थर के रिसाव, कार्बनडाईक्साइड तथा पानी की रासायनिक क्रिया से सतह से लेकर छत तक अद्भूत प्राकृतिक संरचनाएँ गुफा के अंदर बन चुकी हैं। उल्लेखनीय है कि रक्षामंत्रालय की एक उच्चस्तरीय समिति ने विश्वप्रसिद्ध इस गुफा की झांकियों को 26 जनवरी के अवसर पर राजपथ पर प्रस्तुत करने की अनुमति भी प्रदान की।
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कबरा पहाड़ की गुफाएं :
रायगढ़ में है कबरा पहाड़ की गुफाएं। रायगढ़ जिला उत्तर-पूर्व से दक्षिण-पूर्व तक उड़िसा राज्य की सरहद से लगा हुआ है। प्राचीनकाल में में यहां की गुफाओं में मौसम की मार और जंगली जानवरों से बचने के लिए आदिमानव रहते थे। इन प्राकृतिक गुफाओं को शैलाश्रय (चट्टानों के घर) भी कहते हैं। ये गुफाएं रायगढ़ से लगभग 8 किमी पूर्व में ग्राम विश्वनाथपाली तथा भद्रपाली के निकट की पहाड़ी में स्थित है।
आदिमानवों ने उस समय इन गुफाओं में चित्रकारी कर अंकित किया करते थे, जिन्हें रॉक पेंटिंग (शैल चित्र) कहा जाता है। कबरा पहाड़ के शैलाश्रय पुरातात्विक स्थल है। कबरा शैलाश्रय के चित्र भी गहरे लाल खड़िया, गेरू रंग से अंकित है। इसमें कछुआ, अश्व व हिरणों की आकृतियां है। इसी शैलाश्रय में जिले का अब तक का ज्ञात वन्य पशु जंगली भैसा का विशालतम शैलचित्र है। इन चित्रों से उस काल के आदिमानवों की प्रागैतिहासिक काल की स्थिति और उनके समाज का पता चलता है।
इसके साथ ही मध्य पाषाण युग के लंबे फलक, अर्ध चंद्राकार लघु पाषाण के औजार चित्रित शैलाश्रय के निकट प्राप्त हुए थे। जिसका उपयोग आदि मानव कंदमूल खोदने में या शिकार करने में पत्थर को नुकीले करके उपयोग में लाते थे। मध्य पाषाण काल को पुरातत्वविद 9 हजार ईसा पूर्व से 4 हजार ईसा पूर्व के बीच का मानते हैं। माना जाता है कि इस काल में ही मानव ने पशुओं को पालना और उनका सवारी के रूप में उपयोग करना भी सीखा था।

छत्तीसगढ़ में ऐसी सैंकड़ों गुफाएं है। उक्त गुफाओं पर अच्छे से शोध किए जाने और उस काल के गुफा मानवों पर एक डॉक्यूमेंट्रमी फिल्म बनाएं जाने की जरूरत है। आप इस काल के लोगों की जीवनचर्या पर रितिक रोशन की फिल्म मोहनजोदड़ो की तरह की एक फिल्म भी बना सकते हैं।

हाथी पोर की गुफाएं





: रामगढ़ के पास (सरगुजा जिला)
· सीताबेंगरा गुफा







: रामगढ़ के पास (सरगुजा जिला)
· लक्ष्‍मण बेंगरा गुफा





: रामगढ़ के पास (सरगुजा जिला)
· सीतामढ़ी गुफा







: घाघरा (सरगुजा जिला)
· हरचौका की गुफा






: मरवाही, जनकपुर तहसील (कोरिया जिला)
· कांगेर करपन गुफा





: कांगेर घाटी (बस्‍तर जिला)
· दण्‍डक गुफा








: कांगेर घाटी (बस्‍तर जिला)
· देवगिरी गुफा








: कांगेर घाटी (बस्‍तर जिला)
· जोगी गुफा









: कांकेर (कांकेर जिला)
· शीत गुफा









: कांगेर घाटी (बस्‍तर जिला)
· गुप्‍तेश्‍वर गुफा







: कांगेर घाटी (बस्‍तर जिला)
· लाफा(चैतुरगढ़) की गुफा


: लाफा (कोरबा जिला)
· खुडि़या रानी गुफा






: खुडि़या रानी, बगीचा (जशपुर जिला)
· कैलाश गुफा








: बगीचा के पास (जशपुर जिला)
· अरण्‍यक गुफा







: मंगलपुरी पहाड़ी (बस्‍तर जिला)
· सरोवर गुफा








: सिहावा (धमतरी जिला)
· आरा पहाड़ की गुफाएं




: राजपुर (सरगुजा जिला)
· दंतेश्‍वरी गुफा







: सिहावा (धमतरी जिला)
· अमर गुफा









: सोनबरसा, खरसिया (रायगढ़ जिला)
· सिंघनपुर गुफा

:
· रामगढ़ गुफा


: रामगढ़ गुफा सरगुजा जिले में स्थित है।

अंत में कहने का तात्पर्य यह कि यदि दंडकाराण्य क्षेत्र की महानदी और गोदावरी नदी के तटवर्ती क्षेत्रे के अलावा अन्या पुरास्थलों पर अच्छे से शोध और खुदाई का कार्य किया जाए तो संभवत: हमें भारत की प्राचीन सभ्यता और प्राचीन भारतीयों के बारे में नई जानकारी मिलेगी। यह जरूरत सदियों से महसूस की जाती रही है कि भारतीयों को अपनी संस्कृति और सभ्यता का इतिहास खुद लिखना चाहिए।

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