इन 10 शापों ने महाभारत युद्ध में पलट दिया था पासा

अनिरुद्ध जोशी|
संपूर्ण महाभारत चमत्कार, रहस्य, वरदान और का एक लेखा-जोखा है। महाभारत में वैसे तो सैकड़ों शाप और वरदान मिल जाएंगे लेकिन हम यहां कुछ प्रमुख शाप के बारे में ही बताएंगे, जो बहुत ही चर्चित रहे हैं। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि यदि ये शाप नहीं होते तो महाभारत के युद्ध का परिणाम और भारतीय इतिहास का मोड़ कुछ अलग ही होता। आप इस पर विचार कर सकते हैं।
वसुओं को दिया द्यु ने शाप
1.एक बार 'द्यु' नामक वसु ने वशिष्ठ ऋषि की कामधेनु का हरण कर लिया। इससे वशिष्ठ ऋषि ने द्यु से कहा कि ऐसा काम तो मनुष्य करते हैं इसलिए तुम आठों वसु मनुष्य हो जाओ। उन आठ वसुओं में से एक भीष्म थे। गंगा ने आठ में से सात वसुओं को जल में बहा दिया लेकिन शांतनु के बोलने के कारण भीष्म बच गए। भीष्म ने ब्रह्मचारी रहने की शपथ ली थी।

भीष्म को दिया अम्बा ने शाप
2.सत्यवती-शांतनु के पुत्र विचित्रवीर्य के युवा होने पर भीष्म ने बलपूर्वक काशीराज की 3 पुत्रियों का हरण कर उनका विवाह विचित्रवीर्य से कर दिया। लेकिन बाद में बड़ी राजकुमारी अम्बा को छोड़ दिया। अम्बा ने बहुत ही द्रवित होकर भीष्म को शाप दिया कि तुम्हारी मृत्यु का कारण मैं बनूंगी। अम्बा ने प्राण त्यागकर शिखंडी के रूप में जन्म लिया और युद्ध में भीष्म की मृत्यु का कारण बनीं।
पांडु को दिया ऋषि ने शाप
3.एक बार कुंती और माद्री के पति राजा पांडु आखेट कर रहे थे कि तभी उन्होंने मृग होने के भ्रम में बाण चला दिया, जो अपनी पत्नी के साथ मैथुनरत ऋषि किंदम को जाकर लगा। वे ऋषि मरते वक्त पांडु को शाप देते हैं कि तुम भी मेरी तरह मरोगे, जब तुम मैथुनरत रहोगे।

कर्ण को मिला शाप
4.परशुराम ने शपथ ली थी की ब्रह्मास्त्र का प्रयोग करना में सिर्फ किसी ब्रह्मज्ञानी को ही सिखाऊंगा। कर्ण यह सीखना चाहता था तो उसने परशुराम के पास पहुंचकर खुद को ब्राह्मण का पुत्र बताया और उनसे यह विद्या सीख ली। परशुराम को जब यह पता चला की कर्ण को सूर्यपूत्र है तो उन्होंने कर्ण को शाप दे दिया कि जब भी तुम्हें इस विद्या की सबसे ज्यादा आवश्यकता होगी, तभी तुम इसे भूल जाओगे।
अर्जुन को मिला शाप
5. एक बार अर्जुन इन्द्र-सभा में थे। अर्जुन के रूप सौंदर्य पर मोहित हो उर्वशी नामक अप्सरा ने उनसे प्रणय निवेदन किया। किंतु अर्जुन ने उन्हें मां समान मानकर इस निवेदन को ठुकरा दिया। तब उर्वशी ने क्रोधित होकर अर्जुन को 1 वर्ष तक नपुंसक होने का शाप दे दिया। अर्जुन ने उर्वशी से शापित होना स्वीकार किया, परंतु संयम नहीं तोड़ा।

दुर्योधन को मिला शाप
6.एक बार महर्षि मैत्रेय हस्तिनापुर पथारे। विश्राम के बाद धृतराष्ट्र ने पूछा- भगवन् वन में पांचों पांडव कुशलपूर्वक तो हैं न। महर्षि ने कहा, वे कुशल है, लेकिन मैंने सुना कि तुम्हारे पुत्रों ने पाण्डवों को जुए में धोखे से हराकर वन भेज दिया? ऐसा कहकर पीछे मुड़ते हुए उन्होंने दुर्योधन से कहा, तुम जानते हो पाण्डव कितने वीर और शक्तिशाली हैं? महर्षि की बात सुनकर दुर्योधन ने क्रोध में अपनी जांघ पर हाथ से ताल ठोंक दी। दुर्योधन की यह उद्दण्डता देखकर महर्षि को क्रोध आ गया और उन्होंने कहा, तू मेरा तिरस्कार करता है, मेरी बात शांतिपूर्वक सुन नहीं सकता। जा उद्दण्डी जिस जंघा पर तू ताल ठोंक रहा है, उस जंघा को भीम अपनी गदा से तोड़ देगा।
द्रौपदी ने घटोत्कच को शाप दिया
7.जब घटोत्कच पहली बार अपने पिता भीम के राज्य में आया तो अपनी मां हिडिम्बा की आज्ञा के अनुसार उसने द्रौपदी को कोई सम्मान नहीं दिया। द्रौपदी को अपमान महसूस हुआ और उसे बहुत गुस्सा आया। उसने चिल्लाकर कहा दुष्ट तूने अपनी दुष्ट राक्षसी मां के कहने पर बड़ों, ऋषियों और राजाओं से भरी सभा में उसका अपमान किया है। जा दुष्‍ट तेरा जीवन बहुत छोटा होगा तथा तू बिना किसी लड़ाई के मारा जाएगा।
श्रीकृष्ण वंश के नाश का शाप
8.के पश्चात सांत्वना देने के उद्देश्य से भगवान श्रीकृष्ण गांधारी के पास गए। भगवान श्रीकृष्ण को देखते ही गांधारी ने क्रोधित होकर उन्हें शाप दिया कि तुम्हारे कारण जिस प्रकार से मेरे 100 पुत्रों का नाश हुआ है, उसी प्रकार तुम्हारे वंश का भी आपस में एक-दूसरे को मारने के कारण नाश हो जाएगा।
अश्वत्थामा को श्रीकृष्ण ने दिया शाप
9.महाभारत के युद्ध में अश्वत्‍थामा ने ब्रह्मास्त्र छोड़ दिया था जिसके चलते लाखों लोग मारे गए थे। अश्वत्थामा के इस कृत्य से श्री कृष्ण ने क्रोधित होकर शाप दिया कि 'तू इतने वधों का पाप ढोता हुआ 3,000 वर्ष तक निर्जन स्थानों में भटकेगा। तेरे शरीर से सदैव रक्त की दुर्गंध नि:सृत होती रहेगी। तू अनेक रोगों से पीड़ित रहेगा।'

राजा परीक्षित को शाप
10. एक बार राजा परीक्षित आखेट हेतु वन में गए। वन्य प्यास से व्याकुल होकर वे ऋषि शमीक के आश्रम में पहुंच गए। शमीक ऋषि ब्रह्म ध्यान में लीन बैठे थे। राजा परीक्षित ने उनसे जल मांगा किंतु ध्यानमग्न होने के कारण शमीक ऋषि ने कुछ भी उत्तर नहीं दिया। उन्हें ऋषि पर बहुत क्रोध आया तब उन्होंने पास ही पड़े हुए एक मृत सर्प को अपने धनुष की नोंक से उठाकर ऋषि के गले में डाल दिया और अपने नगर वापस आ गए। शमीक ऋषि के पुत्र ऋंगी ऋषि आ पहुंचे जब उन्हें अपने पिता के अपमान का पता चला तो उन्होंने तुरंत ही कमंडल से अपनी अंजुली में जल लेकर तथा उसे मंत्रों से अभिमंत्रित करके राजा परीक्षित को यह शाप दे दिया कि जा तुझे आज से 7वें दिन तक्षक सर्प डसेगा।

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