तीर्थयात्रा क्या और क्यों?

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सनातन हिन्दू धर्म में 4 पुरुषार्थ बताए गए हैं- धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष। इन्हीं 4 पुरुषार्थों की 4 आश्रमों में शिक्षा मिलती है। ये 4 आश्रम हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्‍थ और संन्यास। इंसानी जिंदगी को इन्हीं 4 प्रमुख हिस्सों में बांटा गया है। जो मनमाने तीर्थ और तीर्थ पर जाने के समय हैं उनकी यात्रा का सनातन धर्म से कोई संबंध नहीं। तीर्थ से ही वैराग्य और सौभाग्य की प्राप्ति होती है।


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हिन्दू धर्म : तीर्थ करना है जरूरी

हमारे ऋषि-मुनि मानवी मनोविज्ञान के कुशल मर्मज्ञ यानी कि जानकार होते थे। प्राचीन ऋषि-मुनि लिबास से भले ही साधु-संत थे किंतु सोच और कार्यशैली से पूरी तरह से वैज्ञानिक थे। दुनिया को मोक्ष का मार्ग वैदिक ऋषियों ने ही बताया। दुनिया के किसी भी धर्म की अंतिम मान्यता यही है कि आत्मज्ञान या पूर्णता की प्राप्ति ही इंसानी जिंदगी का एकमात्र अंतिम ध्याय यानी कि मकसद है।
धरती पर पहली बार वैदिक ऋषियों ने धर्म को एक व्यवस्था दी और वैज्ञानिक विधि-विधान निर्मित किए। दुनिया के बाद के धर्मों ने उनकी ही व्यवस्था और धार्मिक विधि-विधान को अपनाया। उन्होंने संध्यावंदन, व्रत, वेदपाठ, तीर्थ, 24 संस्कार, उत्सव, यम-नियम, ध्‍यान आदि को निर्मित किया और इसे धर्म का आधार स्तंभ बनाया। उनके ही बनाए संस्कारों और नियमों को आज सभी धर्म के लोग अपना रहे हैं। धर्म के इन्हीं नियमों में से एक है तीर्थयात्रा।

अगले पन्ने पर जानिए तीर्थयात्रा का मकसद...


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