ऐसा उत्पन्न हुआ धरती पर मानव और ऐसे खत्म हो जाएगा

अनुसार प्रत्येक ग्रह, नक्षत्र, और की एक निश्‍चित आयु बताई गई है। वेद कहते हैं कि प्राकृतिकक्रम से जो जन्मा है वह मरेगा। यह सही है कि कोई अपने प्रयास से अपनी उम्र बढ़ा या घटा ले। धरती को मनुष्य वक्त के पहले ही मारने में लगा तो निश्चित ही वह भी वक्त के पहले ही मरेगा। हालांकि वेद और योग में सभी की आयु बढ़ाने के सरल और सहज उपाय बताए गए हैं।


1.गर्भकाल
करोड़ों वर्ष से धरती जल में डूबी हुई थी। जल में ही विभिन्न वनस्पतियों की उत्पत्ति हुई। वनस्पतियों की तरह ही एक कोशीय बिंदु रूप जीवों की उत्पत्ति हुई, जो न नर थे और न मादा।


2.शैशव काल : संपूर्ण धरती जब जल में डूबी हुई थी तब जल के भीतर अम्दिज, अंडज, जरायुज, सरीसृप (रेंगने वाले) केवल मुख और वायु युक्त जीवों की उत्पत्ति हुई।

3.कुमार काल : इसके बाद पत्र ऋण, कीटभक्षी, हस्तपाद, नेत्र श्रवणेन्द्रियों युक्त जीवों की उत्पत्ति हुई। इनमें मानव रूप वानर, वामन, मानव आदि भी थे।


4.किशोर काल : इसके बाद भ्रमणशील, आखेटक, वन्य संपदाभक्षी, गुहावासी, जिज्ञासु अल्पबुद्धि प्राणियों का विकास हुआ।


5. युवा काल : फिर कृषि, गोपालन, प्रशासन, समाज संगठन की प्रक्रिया हजारों वर्षों तक चलती रही।

6.प्रौढ़ काल : वर्तमान में प्रौढ़ावस्था का काल चल रहा है, जो लगभग विक्रम संवत 2042 पूर्व शुरू हुआ माना जाता है। इस काल में अतिविलासी, क्रूर, चरित्रहीन, लोलुप, यंत्राधीन प्राणी धरती का नाश करने में लगे हैं।


7. वृद्ध काल : मानव द्वारा धरती के संसाधनों का अति दोहन करने और जलवायु परिवर्तन के चलते माना जाता है कि इसके बाद आगे तक साधन भ्रष्ट, त्रस्त, निराश, निरूजमी, दुखी जीव रहेंगे।...इनकी आयु बहुत कम होगी।

8. जीर्ण काल : फिर इसके आगे अन्न, जल, वायु, ताप सबका अभाव क्षीण होगा और धरती पर जीवों के विनाश की लीला होगी। अत्यधिक ताप के चलते चारों और अग्नि का प्रकोप होगा।


9. उपराम काल : इसके बाद करोड़ों वर्षों आगे तक ऋतु अनियमित, सूर्य, चन्द्र, मेघ सभी विलुप्त हो जाएंगे। भूमि ज्वालामयी हो जाएगी। अकाल, प्रकृति प्रकोप के बाद
ब्रह्मांड में आत्यंतिक प्रलय होगा।

सबकुछ जलकर राख होकर महर्लोक में मिल जाएगा। करोड़ों वर्षों बाद पुन: ब्रह्मांड की रचना उसी भस्म से होगी।

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