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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर का चुनावी इतिहास
भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में चुनावों की शुरुआत वर्ष 1951 में संविधान सभा के लिए हुए चुनाव से हुई। इस चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सभी 75 सीटें जीतीं और शेख अब्दुल्ला ने राज्य की कमान संभाली। यहाँ तक कि चुनावों में 73 सीटों पर तो नेशनल कॉन्फ्रेंस के उम्मीदवार बिना किसी विरोध के ही चुन लिए गए।

इसके बाद विधानसभा के लिए 1957, 1962, 1967, 1972, 1977, 1983, 1987, 1996 और 2002 में चुनाव हुए। इनमें से कई चुनावों के दौरान धाँधली होने के आरोप लगे और खासा विवाद पैदा हुआ।

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1957 एनसी की जीत, विपक्ष के आरोप : इसके बाद संविधान सभा विधानसभा में तब्दील हो गई और वर्ष 1957 में हुए चुनावों में नेशनल कॉन्फ्रेंस 'नया कश्मीर' के घोषणा-पत्र और नारे के साथ मैदान में उतरी। एनसी को 75 में से 68 सीटों पर जीत हासिल हुई। प्रजा परिषद को पाँच सीटें, एक सीट हरिजन मंडल को और एक सीट निर्दलीय को मिली।

विपक्ने 1957 के चुनावों में धाँधली के आरोप लगाए और ताजा चुनावों की माँग भी की और कुछ दलों ने तो चुनावों का बहिष्कार भी किया। महत्वपूर्ण है कि वर्ष 1953 में नेशनल कॉन्फ्रेंस के शेख मोहम्मद अब्दुल्ला को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया गया था। इसके बाद इंदिरा-शेख सहमति के बाद वे पूरी तरह से चुनावी मैदान में 1976-77 में ही लौटे।

1962 एनसी की जीत, 1967 और 1972 कांग्रेस को बहुमत : वर्ष 1962 में जम्मू-कश्मीर में तीसरी बार चुनाव हुए, जिनमें नेशनल कॉन्फ्रेंस को 75 में से 70 सीटें मिलीं, जबकि प्रजा परिषद को तीन और निर्दलीयों को दो सीटें मिलींवर्ष 1967 में कांग्रेस पार्टी को 61 सीटें मिलीं, जबकि जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस को आठ, भारतीय जनसंघ को तीन और स्वतंत्र उम्मीदवार तीन सीटों पर जीते।

पाँचवीं बार जम्मू-कश्मीर विधानसभा के लिए चुनाव 1972 में हुए और कांग्रेस को 58, भारतीय जनसंघ को तीन, जमाते इस्लामी को पाँच और निर्दलीय उम्मीदवारों को नौ सीटें मिलीइन चुनावों में लगातार आरोप लगते रहे कि विपक्षी दलों के उम्मीदवारों के नामांकन पर्चे छोटे-छोटे कारणों से रद्द कर दिए गए थे।

1977 शेख अब्दुल्ला का नेतृत्व, एनसी की जीत : वर्ष 1975 में इंदिरा-शेख सहमति के तहत शेख अब्दुल्ला को जेल से रिहा किया गया था। वर्ष 1977 में भारत में इंदिरा विरोधी जनता लहर चल रही थी। शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने फिर अपना लोहा मनवाया और उसे 76 में से 47 सीटें हासिल हुईं।

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इस चुनाव में खासा मतदान हुआ, जो लगभग 67 प्रतिशत था। इस भारी मतदान की वजह चुनावी मैदान में शेख मोहम्मद अब्दुल्ला की वापसी बताया जाता है। उनकी पार्टी को 46 प्रतिशत वोट मिले। कांग्रेस को मात्र ग्यारह सीटें मिल पाईं. जनता पार्टी को 13, जमाते इस्लामी को एक और जनसंघ से बागी हुए निर्दलीय उम्मीदवारों को चार सीटें मिलीं।

शेख अब्दुल्ला ने सरकार बनाई और जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने प्रस्ताव पारित और जम्मू-कश्मीर के संविधान में संशोधन कर विधानसभा की अवधि पाँच से बढ़ाकर छह साल कर दी। वर्ष 1982 में शेख अब्दुल्ला के देहांत के बाद फारूक अब्दुल्ला मुख्यमंत्री बने।
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