विचार-मंथन
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फलक नहीं रही। फलक, तीन अक्षर का खूबसूरत‍ नाम, मासूम चेहरा, एकदम कच्ची उम्र तथा अव्यक्त वेदना और अनवरत बहते आंसुओं से लिखी उसकी किस्मत।

Phalak
PTI


दो साल की नाजुक उम्र में जब कि बच्चों को गोद से नीचे उतारने का भी मन नहीं होता, एक ऐसी उम्र जब कि नन्हों की मीठी-सी हंसी से पूरे घर का मन नहीं भरता। ऐसी कोमल वय में फलक ने वह सब सहा जिसकी कल्पना भी हमारी रूह को सिहरा देती है लेकिन फलक की मासूमियत ने सबकुछ सहा और कुछ नहीं कहा। वेदना की यह कैसी 'अति' है कि वह बच्ची यह तक नहीं जानती थी कि उसके साथ जो वह हुआ उसकी भयावहता क्या है? नितांत नाजुक काया पर ना जाने कितने और कैसे-कैसे जुल्म वह सह गई लेकिन मौत के आगे अंतत: सहम गई ... और चली गई फिर अंगारों की तरह सुलगते सवालों को समाज की ठंडी सतह पर छोड़कर।

कहां से शुरुआत करें और किस कलेजे से कुछ कहना आरंभ करें? नारी और उसके प्रति नृशंसता इन दो लफ्जों ने जैसे एक साथ ही अखबारों और टीवी में आने की कसम खा रखी है। चलिए बात यहां नारी से आरंभ ना करें और सामान्य जरूरी मानवता की करें तो भी हम सब शर्मसार होकर स्तब्ध हैं। होना चाहिए। नैतिकता का यह घृणित पतन आखिर कहां जाकर थमेगा? दया, ममता, वात्सल्य, मानवता क्या सचमुच विलुप्त होते शब्द हैं? अगर ये शब्द अस्तित्व में हैं तो क्या बस शब्द 'मात्र' हैं या इनका कहीं कोई अर्थ भी बचा है?

क्या हमारे भावनात्मक धरातल पर ऐसी मार्मिक खबरों से कोई हलचल नहीं होती? भीतर कोई बेचैनी या व्यग्रता उबकाई नहीं लेती? भीतर ही भीतर कहीं कुछ नहीं भीगता? कुछ नहीं टूटता, दरकता और चरमराता?

कभी गौर कीजिए दो वर्ष के नन्ही लाड़लियों पर, कैसे गुलाबी-गुलाबी हाथ, गुदगुदे गाल और हिरनी जैसी चमकती आंखें होती है उनकी? फलक भी तो ऐसी ही थी। कैसा पाषाण होगा वह जिसने उसे जगह-जगह काटा होगा, कैसा दरिंदा होगा वह जिसने उसका चांद-सा दमकता माथा दीवार पर दे मारा होगा।

एक कोमल कचनार की कली, फिर अत्याचारों के कंटीले जंगल में उलझ कर मुरझा गई। उसके लहूलुहान शरीर से कहीं अधिक आज भारतीय संस्कारों की आत्मा रंक्तरंजित है। शब्द कुंठित है, भावनाएं अवरुद्ध और आंखों में पीड़ा का डबडबाता सागर है। चीखती बहस, उबलता 'नारीवाद' और अकुलाते आलेख बेमानी है अगर हमारी आत्मा के किसी कोने में फलक की कहानी नहीं सिसकती।

फलक को श्रद्धांजलि हम किस मुंह से दें? वह तो महज दुनिया से गई है। हम तो जीते जी मृत हैं अगर सभ्य समाज कहलाते हुए हमारे सामने ऐसी असभ्य खबरें जन्म ले रही हैं, लेती जा रही हैं... तो मृत ही तो हुए ना?

पीड़ा की घनी अवस्था में बस इतना ही कह सकती हूं कि फलक, तुम इस दुनिया में लौटकर मत आना। यह दुनिया संवेदनात्मक रूप से मृत लोगों की दुनिया ह। तुम जन्नत में ही रहना। हो सके तो अपने सुलगते सवाल ईश्वर के समक्ष रखना... हमारे पास नहीं है तुम्हारे लिए कोई जवाब... हमें माफ करना फलक... हम अपने ही गुलाबी नवांकुरों को सहेजने के काबिल नहीं रहे।
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