उज्जैन में विराजित हैं अष्ट भैरव, जानिए क्या है भैरव का मूल स्थान, कैसे करते हैं मृत्युतुल्य कष्ट को समाप्त


29 नवंबर को भैरवाष्टमी है। इस बार भैरवाष्टमी गुरुवार के दिन आ रही है। माह की कृष्ण पक्ष की अष्टमी भैरव जयंती के नाम से जानी जाती है। इस दिन मध्यरात्रि में भैरव जी के जन्म की मान्यता है। महाकाल की नगरी में भैरव पूजन की विशेष मान्यता है।

इस अवसर पर उज्जैन की अष्टभैरव यात्रा का विशेष महत्व माना गया है। स्कंद पुराण के अवंति खंड के अंतर्गत उज्जैन में अष्ट महाभैरव का उल्लेख मिलता है। भैरव जयंती पर अष्ट महाभैरव की यात्रा तथा दर्शन पूजन से मनोवांछित फल की प्राप्ति तथा भय से मुक्ति मिलती है। भैरव तंत्र का कथन है कि जो भय से मुक्ति दिलाए वह भैरव है।

क्या है भैरव का मूल स्थान :- श्मशान तथा उसके आसपास का एकांत जंगल ही भैरव का मूल स्थान है। संपूर्ण भारत में मात्र उज्जैन ही एक ऐसा स्थल है, जहां ओखलेश्वर तथा चक्रतीर्थ श्मशान हैं। अष्ट महाभैरव इन्हीं स्थानों पर विराजमान है।
उज्जैन में विराजित हैं अष्ट भैरव :- स्कंद पुराण की मान्यता अनुसार उज्जैन में अष्ट भैरव कई स्थानों पर विराजमान है। जानिए कहां-कहां है उनका स्थान :-

* भैरवगढ़ में काल भैरव,

* दंडपाणी भैरव,

* रामघाट पर आनंद भैरव,

* ओखलेश्वर श्मशान में विक्रांत भैरव,
* चक्रतीर्थ श्मशान में बम-बटुक भैरव,

* गढ़कालिका के समीप
काला-गौरा भैरव मंदिर,

* कालिदास उद्यान में चक्रपाणी भैरव,

* सिंहपुरी में आताल-पाताल।

भैरव-साधना से पीड़ामुक्ति:- शनि, राहु, केतु तथा मंगल ग्रह से जो जातक पीड़ित हैं, उन्हें भैरव की साधना अवश्य ही करनी चाहिए। अगर जन्मपत्रिका में मारकेश ग्रहों के रूप में यदि उक्त चारों ग्रहों में से किसी एक का भी प्रभाव दिखाई देता हो तो भैरव जी का पंचोपचार पूजन जरूर करवाना चाहिए।

भैरव के जाप, पठनात्मक एवं हवनात्मक अनुष्ठान मृत्युतुल्य कष्ट को समाप्त कर देते हैं।

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