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गोपाचल के निकटवर्ती तीर्थ क्षेत्र
6. सुजवाया- तहसील गिर्द में तिगरा से लगभग 3 कि.मी. दूर दक्षिण-पश्चिम में यह ग्राम है। यह लश्कर उपनगर के पश्चिम में बारहमासी रास्ते द्वारा 16 कि.मी. की दूरी पर है। यहाँ ईस्वी सन्‌ की 11वीं शताब्दी के अनेक मंदिर समूह हैं। सबसे बड़ा समूह मालीपुरा नामक गाँव के उत्तर की ओर पहाड़ी की ढाल पर है, जो इसी सुजवाया का हिस्सा है।

7. डूंडापुरा- तहसील गिर्द में पवा के उत्तर-पूर्व में पगडंडी मार्ग से 5 कि.मी. दूरी पर है। यहाँ पर ग्यारहवीं शताब्दी का जैन मंदिर है, जो प्रायः नष्ट है। यहाँ के स्तम्भों पर वि.सं. 1598 व वि. सं. 1592 पढ़ने में आते हैं। इतिहास की कड़ियाँ खोजने के लिए शोध की आवश्यकता है।

8. मनहरदेव- श्री दि. जैन अतिशय क्षेत्र चैत्र मनहर देव ग्वालियर जिले की तहसील डबरा में स्थित है। पहाड़ी पर एक भव्य शांतिनाथ मंदिर तथा 11 जिन मंदिर जीर्ण-शीर्ण दशा में विराजमान हैं। पर्वत की तलहटी में दो मंदिर हैं। मंदिर में मूलनायक के रूप में पाड़ाशाह द्वारा प्रतिष्ठित भगवान शांतिनाथ की 15 फुट उत्तुंग कोयात्सर्गासन दिगंबर जैन प्रतिमा अब सोनागिर क्षेत्र में पहुँचा दी गई है। उखड़े हुए स्मारक स्तंभों पर तिथि युक्त लेख अंकित हैं। इनमें से एक विक्रम संवत्‌ 1183 का है, जिस पर जैन मुनि और उनके शिष्यों के नाम अंकित हैं।

9. पनिहार- तलवार की धार, ग्वालियर का ग्राम पनिहार। पुरातत्व और वीरता का अनोखा संगम। यह तहसील गिर्द (ग्वालियर) आगरा-बंबई मार्ग पर लश्कर नगर से 25 कि.मी. दूर एक गाँव है। इसमें भोंयरा का मंदिर है, जो पनिहार की चौबीसी नाम से प्रसिद्ध है। वर्तमान में अब 18 मूर्तियाँ रह गई हैं। हाल ही में इस मंदिर के पीछे खेतों में पुरातात्विक महत्व की जैन प्रतिमाएँ उपलब्ध हुई हैं।

10. बरई- उपरोक्त पनिहार ग्राम से लगभग 5 कि.मी. दूर एक छोटा-सा कस्बा है। यहाँ पर टूटे-फूटे जैन मंदिरों के दो समूह हैं। कस्बे के उत्तर में दो मंदिर समूह हैं, जिनमें से एक विशाल जैन मूर्ति है जबकि दूसरे के पास-पास बने तीन मंदिर हैं, जिनमें छोटी-छोटी जिन मूर्तियाँ हैं। एक मूर्ति पर वि.सं. 1529 (ई. सन्‌ 1472) का लेख है, जो कीर्तिसिंह तोमर के समय का है।

सिंध, पारा, लवणा, पार्वती, बेतवा और चम्बल क्षेत्र में भारत के अतीत के इतिहास की अत्यंत बहुमूल्य सामग्री बिखरी पड़ी है। हाल ही में पनिहार के एक टीले की खुदाई में जैन तीर्थंकर की मूर्तियाँ, सर्वतोभद्र की चार मूर्तियाँ एवं कायोत्सर्ग जैन तीर्थंकर आदिनाथ एवं नेमिनाथ की कई मूर्तियाँ 10वीं शताब्दी की प्राप्त हुई हैं। सुहानियाँ के पास चारों ओर टीले अपने अंचल में प्राचीन इतिहास छिपाए हैं।
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