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वर्षों बाद ऐसा संयोग
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भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व इस बार अनूठा संयोग लेकर आ रहा है। 52 वर्ष का बाद ऐसा संयोग आया है जब माह, तिथि, वार और चंद्रमा की स्थिति वैसी ही बनी है, जैसी कृष्ण जन्म के समय थी। रोहिणी नक्षत्र की स्थिति में मामूली अंतर भर आया है।

भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि, बुधवार, रोहिणी नक्षत्र और वृषभ के चंद्रमा की स्थिति में हुआ था। इससे पहले ऐसा योग 1958 में बना था। 52 साल बाद ऐसा संयोग दोबारा आया है।

ज्योतिषी पं. अमर डिब्बेवाला के मुताबिक कृतिका नक्षत्र का काल क्रम 9 घंटे 32 मिनट का होता है। मान्यता है कि भगवान कृष्ण का जन्म अष्टमी की रात्रि रोहिणी नक्षत्र के आरंभ काल के संयोग में हुआ। इस बार तिथि का क्षय होने या कालगणना के आधार पर तिथि का समय चक्र कम होने से रोहिणी नक्षत्र का आरंभ नवमी तिथि से होगा।

वहीं दूसरी तरफ पं. ब्रम्हदत्त मिश्र का मानना है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर बन रहा यह त्रिगुण संयोग 14 वर्ष बाद आया है। ऐसा योग 1996 में बना था, जिसमें अष्टमी के साथ रोहणी नक्षत्र, वृषभराशिस्थ और चंद्र मध्यरात्रि का योग बना। इस वर्ष भी एक सितंबर को श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का उत्सव मनाया जाएगा।

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इस वर्ष की श्रीकृष्ण जन्माष्टमी अन्य वर्षों की जन्माष्टमी से खास होगी, क्योंकि 14 वर्ष बाद त्रिगुण योग बन रहा है। पंडितों के मुताबिक हिन्दू धर्म एक होते हुए भी गृहस्थ और संन्यासी संप्रदाय में बँटा है, जिसे शास्त्रों में स्मार्त और वैष्णव संप्रदाय कहा गया है। ये दोनों संप्रदाय भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव अलग-अलग ढंग से मनाते हैं।

श्रीमद्भागवत को प्रमाण मानकर स्मार्त संप्रदाय के मानने वाले चंद्रोदय व्यापनी अष्टमी अर्थात रोहणी नक्षत्र में जन्माष्टमी मनाते हैं। इसी तरह वैष्णव संप्रदाय के मानने वाले उदयकाल व्यापनी अष्टमी और उदयकाल रोहणी नक्षत्र को श्रेष्ठ मानकर जन्माष्टमी मनाते हैं। शास्त्रों के अनुसार गृहस्थों के लिए 1 सितंबर को जन्माष्टमी मनाना उचित होगा।

क्योंकि भगवान श्रीकृष्ण का जन्म भादो कृष्ण पक्ष की अष्टमी, दिन बुधवार, रोहणी नक्षत्र, वृषभराशिस्थ चंद्र मध्यरात्रि में हुआ था। यह त्रिगुण योग 1 सितंबर की सुबह 10.55 बजे के बाद निर्मित हो रहा है। यह त्रिगुण योग 14 वर्ष के बाद बन रहा है। इसी तरह 2 सितंबर को सुबह 10.38 मिनट तक अष्टमी और मध्यान्ह 1.40 मिनट तक रोहणी नक्षत्र रहेगा। लिहाजा वैष्णव मंदिरों और वैष्णव संप्रदाय के मानने वाले जन्माष्टमी का पर्व 2 सितंबर को मनाएँगे।

खास बात यह है कि कुछ पंडित मानते है कि इस वर्ष मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि और रोहणी नक्षत्र का संयोग करीब 35 वर्षों बाद हुआ है। इस संयोग को जयंती जन्माष्टमी कहते हैं। इन योगों में व्रत करने का सौभाग्य मिलने वाले श्रद्धालु विशेष पुण्यात्मा होंगे।

इस दिन अष्टमी तिथि सूर्योदय से लेकर लगभग सम्पूर्ण रात्रि है वहीं रोहिणी नक्षत्र जिसमें भगवान कृष्ण का जन्म हुआ था, दूसरे दिन गुरुवार को केवल प्रातः काल तक ही है। इस प्रकार एक सितम्बर बुधवार को कृष्ण के जन्म समय मध्यरात्रि में अष्टमी तिथि तथा रोहिणी नक्षत्र दोनों ही होंगे।
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