द्रविड़ वास्तुकला शैली में निर्मित नीलकंठ मंदिर है देवाधिदेव की श्रद्धास्थली

- गौरव पांडे  
को देवभूमि यूं ही नहीं कहा गया। यहां के तमाम प्राचीन मंदिर, गंगा-यमुना जैसी जीवनदायिनी नदियों का उद्गम और 4 धामों को पूजने तो लोग आते ही हैं, साथ ही यहां के अद्भुत मंदिरों से लोगों की श्रद्धा भी जुड़ी है। 
हरिद्वार के समीप ऋषिकेश से कुछ ही दूरी पर स्थित नीलकंठ मंदिर भी ऐसा ही है। भक्तों के दुखों को दूर करने वाले सभी श्रद्धालुओं की मनोकामना पूरी करते हैं। 
 
भगवान नीलकंठ महादेव के बारे में एक कथा है कि देवताओं और राक्षसों के मध्य किसी कारणवश युद्ध चल रहा था तब शीर्ष देवताओं की सलाह पर उनके मध्य तय हुआ कि समुद्र मंथन किया जाए और मंथन से जो भी रत्न प्राप्त होंगे, उन्हें समान रूप से आपस में बांट दिया जाएगा। 
 
मंथन से 14 रत्न प्राप्त हुए जिसमें एक 'कालकूट' नामक विष भी था। उस विष के ताप से चारों दिशाओं में व्याकुलता फैलने लगी, त्राहि-त्राहि मचने लगी। इस संकट के निवारण हेतु सभी सुर-असुर भगवान ब्रह्मा व विष्णु के पास गए। तब उन्होंने भगवान शिव की उपासना करने को कहा। 
 
सरल हृदय और भक्तों की पुकार पर शीघ्र ही द्रवित होने वाले शिव प्रकट हुए और समस्त प्राणियों के हित को ध्यान में रखते हुए उन्होंने हलाहल को अपने कंठ में धारण किया। यद्यपि भगवान शंकर ने योगबल से उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने दिया किंतु उसके प्रभाव से वे बेचैन हो उठे और विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया, तभी से भगवान शिव 'नीलकंठ' कहे जाने लगे।
 
विष के प्रभाव को शांत करने के निमित्त भगवान शिव ऋषिकेश के पास गंगा तट के समीप स्थित मणिकूट पर्वत की घाटी में मणिभद्रा व चन्द्रभद्रा नदी के संगम पर स्थित बरगद की छांव तले पूर्णत: एकांत समाधिस्थ हो गए।
 
मणिकूट, विष्णुकूट तथा ब्रह्मकूट के मूल में स्थित मणिभद्रा व चन्द्रभद्रा नदियों का यह संगम अत्यंत शीतलता प्रदान करने वाला है। यहां पर 60,000 वर्ष पर्यंत समाधिस्थ रहने के बाद विष का प्रभाव शांत होने पर भगवान शिव की समाधि टूटी। भगवान शिव जिस वटवृक्ष के मूल में समाधि लगाकर बैठे थे, वे वहां पर स्वयंभू लिंग रूप में प्रकट हुए। यहां आप स्वयंभू शिवलिंग का अत्यंत निकटता से दर्शन कर सकते हैं।
 
यह शिवलिंग देखने में जिव्हा के आकार जैसा है जिसके मूल में कंठ के नीचे की हंसुली स्पष्ट देखी जा सकती है। संपूर्ण शिवलिंग के दर्शन केवल प्रात: व सायं की अभिषेक, पूजा व आरती के समय ही किए जा सकते हैं अन्यथा कवच लगा होने के कारण मात्र शीर्ष भाग के ही दर्शन किए जा सकते हैं। 
 
मध्यकालीन स्थापत्य कला का उत्कृष्ट उदाहरण श्री नीलकंठ महादेव मंदिर का निर्माण लगभग 300 वर्ष पूर्व किया गया है। द्रविड़ (दक्षिण भारतीय वास्तुकला शैली) के अनुरूप इस मंदिर की साज-सज्जा एवं भव्यता अतिविशिष्ट है। सभा मंडप से शिखर तक तक इसकी ऊंचाई 51 फीट आंकी जाती है। 
 
मंदिर के गर्भगृह में स्वयंभू शिवलिंग धातुनिर्मित नाग से आच्छादित है। सभामंडप में नंदी महाराज ध्यानस्थ मुद्रा में विराजमान हैं। वर्तमान में यह स्थान धार्मिक, आध्यात्मिक तथा प्राकृतिक सौन्दर्य की दृष्टि से विशेष स्थान पा रहा है। 
 
मधुमती तथा पंकजा नामक नदियों के निर्मित जलकुंड में स्नान कर यात्री तरोताजा होते हैं। स्थान की आध्यात्मिकता, मंदिर एवं कल्पवृक्ष की विशालता इस स्थल के गौरव को विशेष समृद्ध बनाती है। यहां पर शिवार्चन, रुद्रपाठ, हवन आदि का विशेष महात्म्य है।
 
श्रावण मास में भक्तों के अतिरिक्त श्री नीलकंठ महादेव को जल अर्पित करने हजारों की संख्या में कावड़िए पहुचते हैं। इस स्थान विशेष को अष्टसिद्धि एवं वाणी की सिद्धि को प्रदान करने वाला पुण्य क्षेत्र कहा गया है। नीलकंठ महादेव की गणना उत्तर भारत के प्रमुख शिव मंदिरों में की जाती है संभवत: इसीलिए भगवान नीलकंठ महादेव का मंदिर सर्वाधिक लोकप्रिय व महत्वपूर्ण है।
 
नीलकंठ महादेव का मंदिर जनपद पौड़ी के यमकेश्वर विकासखंड के उदयपुर में स्थित है। उत्तराखंड की पहाड़ियों में स्थित इस मंदिर के चहुंओर प्रकृति की सुंदरता बिखरी हुई है। तीर्थनगरी ऋषिकेश से नीलकंठ तक पहुंचने के 2 मार्ग हैं। > सड़क मार्ग से नीलकंठ जाने के लिए स्वर्गाश्रम रामझूला टैक्सी स्टैंड से लक्ष्मण झूला, गरूड़चट्‌टी होते हुए यमकेश्वर-दुगड्‌डा मार्ग द्वारा लगभग 32 किलोमीटर का रास्ता तय करना पड़ता है। दूसरा लगभग 12 किलोमीटर का पैदल मार्ग है। श्री नीलकंठ महादेवजी के मंदिर जाने के लिए लक्ष्मण झूला के पास से स्थानीय टैक्सी मिलती है जिसके द्वारा बहुत ही कम समय में नीलकंठ पहुंच सकते है। 
 
नीलकंठ तक पैदल यात्रा करने के लिए स्वर्गाश्रम के उत्तरी पार्श्व से एक मार्ग जाता है। इस मार्ग से आगे-जाने पर पर्वत की तलहटी से लगा हुआ समतल मार्ग चिल्लाह-कुन्हाव को जाता है। उसी मार्ग पर डेढ़ किलोमीटर चलने पर एक पहाड़ी झरना है।> इस झरने की सुंदरता देखते ही बनती है। उस झरने को पार करते ही उस मार्ग को छोड़कर बाईं ओर मुड़ जाना होता है। वहां पर तीर के निशान सहित श्री नीलकंठ महादेवजी के नाम का बोर्ड लगा हुआ है। तीर के निशान द्वारा उसी दिशा की ओर आगे बढ़कर श्री नीलकंठ महादेवजी का वास्तविक मार्ग आरंभ होता है। इस मार्ग पर डेढ़ किलोमीटर आगे चलने पर नीचे की ओर स्वर्गाश्रम, लक्ष्मण झूला एवं गंगाजी का दॄश्य बहुत सुंदर है। 
 
लगभग 2 किलोमीटर आगे चलने पर पानी का एक छोटा-सा तालाब है। इसमें पहाड़ी से पानी हर समय बूंद-बूंद निकलता रहता है। इसमें बारहों महीने पानी रहता है। इसे 'बीच का पानी' कहते है। यह पानी स्वर्गाश्रम तथा श्री नीलकंठ महादेवजी के मध्य में माना जाता है। यहां से चढ़ाई समाप्त हो जाती है। 
 
यहां से लगभग 200 मीटर की दूरी चलने पर पर्वतों के शिखरों के परस्पर मिलने से बने हुए एक छोटे-से मैदान में पहुंच जाते हैं। यहां पूर्वाभिमुख खड़े होने पर बाईं ओर मणिकूट पर्वत, दाहिनी ओर विष्णुकूट पर्वत और सम्मुख ब्रह्मकूट पर्वत के शिखर पर श्री भुवनेश्वरी पीठ एवं तीनों पर्वतों के संधिमूल में श्री नीलकंठ महादेव दिखाई देते हैं।
 
गंगाजी के प्रवाह से मणिकूट पर्वत की ऊंचाई 4,500 फिट है। मणिकूट पर्वत शिखर से लगभग 1,500 फिट गहराई पर श्री नीलकंठ महादेवजी का मंदिर है। मंदिर परिसर में पहुंचने पर नीलकंठ महादेव के भव्य मंदिर के दर्शन होते हैं। 

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