#वेबदुनियादिवस : वेबदुनिया के 18 वर्ष

Author डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी| Last Updated: शनिवार, 23 सितम्बर 2017 (00:44 IST)
-डॉ. प्रकाश हिन्दुस्तानी
जब 'वेबदुनिया' शुरू हुआ तब गूगल महज एक साल का था और फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, कोरा आदि का अस्तित्व भी नहीं था। 'वेबदुनिया' के साथ सबसे विशिष्ट बात यह थी कि यह हिन्दी में शुरू होने वाला पहला पोर्टल था। 'वेबदुनिया' के पहले कोई इस बात की कल्पना भी नहीं कर सकता था कि पर हिन्दी या अन्य भारतीय भाषाओं का उपयोग किया जा सकेगा। 'वेबदुनिया' के प्रयासों को कई लोग अजीब सी निगाहों से देखते थे। वेबदुनिया! वह भी हिन्दी में! ऊपर से मध्यप्रदेश के इंदौर से, जहां न तो सही कनेक्टिविटी उपलब्ध है और न ही बिजली ठीक से मिल पाती है।

इंटरनेट के तमाम बड़े-बड़े दिग्गज सिलीकॉन वैली में डेरा जमाए थे। उन दिग्गजों के पास निवेश की कोई चुनौती नहीं थी। 'वेबदुनिया' के पास संसाधन सीमित थे, लेकिन इरादे बुलंद और मजबूत। 18 साल में 'वेबदुनिया' हिन्दी इंटरनेट ही नहीं, भारतीय भाषाओं के पोर्टल का पर्याय बन चुका है। हिन्दी को स्थापित करने में 'वेबदुनिया' का महत्व बेमिसाल है और उसकी क्षमताओं का लोहा सभी मान चुके है।

वेबदुनिया सिर्फ एक पोर्टल नहीं है। 18 वर्षों से 'वेबदुनिया' पूरी दुनिया में फैले भारतीय लोगों के लिए संस्कृति, भाषा और परंपरा का अग्रदूत है। 'वेबदुनिया' के शुभारंभ के बाद अनेक बड़े-बड़े औद्योगिक घरानों ने भारी पूंजी लगाकर इस क्षेत्र में प्रवेश किया था, लेकिन उनमें से कई का आज कोई नामलेवा भी नहीं है। कई कंपनियां डूब चुकी है और उनका योगदान भी नगण्य रहा है।

'वेबदुनिया' अगर आज 18 वर्ष का युवा पोर्टल है, तो वह इसलिए की उसके पीछे सुविचारित सोच वाले लोगों का एक बड़ा संगठन है। इससे जुड़े लोग भारत और भारतीय भाषा, भारतीय संस्कृति, भारतीय दर्शन और भारतीय मनोभाव को अच्छी तरह समझते हैं। उनके लिए 'वेबदुनिया' कोई बिजनेस वेंचर मात्र नहीं है। 'वेबदुनिया' में केवल निवेशकों का पैसा ही नहीं, विचारवान पत्रकारों, प्रबंधकों, तकनीकी विशेषज्ञों का खून और पसीना भी लगा है। सैकड़ों लोगों ने रात-दिन काम करके 'वेबदुनिया' को यहां तक पहुंचाया है।
विषम से विषम परिस्थितियों में और साधनहीनता के बावजूद वे अपने मिशन में डटे रहे। व्यावसायिक प्रतिस्पर्धा के दौर में उनके सामने भी बहुतेरे लालच रखे गए, लेकिन प्रबंधकों का रवैया स्पष्ट था कि 'वेबदुनिया' केवल व्यावसायिक उपक्रम नहीं है। लोकप्रियता बढ़ाने के लिए बड़े-बड़े संस्थानों के नामी पोर्टल्स सेमी पोर्नो कन्टेन्ट परोसने में संकोच नहीं करते। वैसे में भी 'वेबदुनिया' ने आई बॉल्स लपकने के बजाय समसामयिक मुद्दों, भारतीय संस्कृति, धर्म, साहित्य, कारोबार, सिनेमा, खेल, पर्यटन, शेयर मार्केट, राजनीति आदि पर अपनी पकड़ मजबूत बनाए रखी। हिन्दी के बाद अन्य भारतीय भाषाओं में भी इसका विस्तार होता गया। रामशलाका की प्रश्नावली से लेकर कुंडली मिलान तक और टेरो कार्ड से लेकर वास्तुशास्त्र की जानकारी तक 'वेबदुनिया' में उपलब्ध है।

पूरा इंटरनेट जगत जब हिन्दी फोंट की चुनौतियों से जूझ रहा था, तब 'वेबदुनिया' ने अपने लिए नए रास्ते बनाए और उन रास्तों को विश्व की जानी-मानी कंपनियों के लिए भी खोल दिया। इसके पीछे शायद यहीं उद्देश्य रहा होगा कि हिन्दी और भारतीय भाषाओं को अपनी बपौती मानने के बजाय विश्व की धरोहर बनाया जाए। वसुधैव कुटुम्बकम का यह वर्च्‍युअल अध्याय कहा जा सकता है।

भारत में ई-कॉमर्स की शुरुआत भी 'वेबदुनिया' ने की है। जब भारत में अमेजॉन को लोग नहीं पहचानते थे, तब भी 'वेबदुनिया' ने दुनियाभर में रहने वाले भारतीय भाई-बहनों के लिए राखी और मिठाइयां भेजने की पहल की थी। यह सब उस दौर में किया गया, जब व्यावसायिक उड़ानों की संख्या सीमित थी, डिस्ट्रीब्यूशन सिस्टम उतने मजबूत नहीं थे और न ही बेहद कार्यकुशल और सस्ती कोरियर सेवाएं उपलब्ध थीं। आज अगर भारत में ई-कॉमर्स फलफूल रहा है, तो उसका काफी श्रेय 'वेबदुनिया' को है।

जब 'वेबदुनिया' शुरू हुआ, तब याहू का बोलबाला था। आज याहू का वह वर्चस्व खत्म हो चुका है, लेकिन 'वेबदुनिया' का वर्चस्व जारी है। 'वेबदुनिया' पोर्टल ने भारतीय भाषाओं में ई-मेल की शुरुआत ई-पत्र के माध्यम से की थी। यह सेवा काफी लोकप्रिय हुई और लोगों को यह भरोसा हुआ कि कम्प्यूटर केवल रोमन लिपि वालों के लिए नहीं है।

'वेबदुनिया' का अपना सर्च इंजन 'वेबखोज' इस मायने में अनूठा था कि वह रोबोट जनरेट नहीं था, बल्कि विशेषज्ञों की एक पूरी टीम उसके लिए कार्य कर रही थी। मैन्युअल कार्य होने के कारण 'वेबदुनिया' के सर्च इंजन के नतीजे एकदम सटीक आते थे। इस सर्च इंजन का उद्घाटन मुंबई के ताज होटल में किया गया था, जिसमें फिल्म उद्योग के अनेक विशिष्ट लोग शामिल हुए थे। सभी भाषाओं के अखबारों में 'वेबदुनिया' के सर्च इंजन की खबरें प्रमुखता से छपी थीं।

'वेबदुनिया' शुरू हुआ, तब निजी समाचार चैनलों की संख्या सीमित थी। 'वेबदुनिया' ने लाइव चैट कार्यक्रम में राजनीति फिल्म खेल व्यवसाय आदि क्षेत्रों के शीर्षस्थ नेताओं से अपने पाठकों को रूबरू कराया। हजारों लोग लाइव चैट के माध्यम से सेलिब्रिटी से चर्चा करते थे। जिन सेलिब्रिटी से केवल गिने-चुने पत्रकार ही इंटरव्यू कर पाते थे, 'वेबदुनिया' के पाठक उनसे सीधे सवाल पूछ सकते थे और जवाब पा सकते थे। 'वेबदुनिया' में प्रिंट मीडिया की खूबियां भी थीं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की भी। खबर के साथ खबर का संदर्भ और लेख के साथ उससे जुड़े वीडियो भी 'वेबदुनिया' पर उपलब्ध हैं।

भारत में मोबाइल टेलीफोन सेवा के आने के बाद एसएमएस सेवा को बेहतर और सुचारु बनाने में 'वेबदुनिया' की टीम का अहम रोल रहा है। 'वेबदुनिया' ने महाकुंभ के मौके पर भी अपनी विशिष्टता सिद्ध की है और विश्व हिन्दी सम्मेलनों में भी। गत वर्ष भोपाल में हुए विश्व हिन्दी सम्मेलन में 'वेबदुनिया' की उपस्थिति बेहद प्रभावी थी। 'वेबदुनिया' के खाते में हिन्दी ई-मेल, हिन्दी सर्च इंजन, ई-कॉमर्स, ई-वार्ता, फोनेटिक की-बोर्ड जैसी कई खूबियां दर्ज हैं। जिस जमाने में लोग खबर पढ़ने के लिए अखबारों को तोप और तलवारों से ज्यादा ताकतवर मानते थे, वहां 'वेबदुनिया' ने साबित किया कि तोप और तलवारों से ताकतवर कम्प्यूटर का माउस और की-बोर्ड हो सकता है।
बदलते वक्त के साथ कम्प्यूटर की जगह मोबाइल ने ले ली है। 'वेबदुनिया' ने वेबदुनिया टीवी के माध्यम से गंभीर समाचारों और घटनाक्रमों को विस्तृत रूप से प्रस्तुत करने का बीड़ा भी उठाया। पुरस्कारों की बात करें, तो 'वेबदुनिया' के खाते में अनेक राष्ट्रीय, अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार दर्ज हैं।

अब 'वेबदुनिया' में अंग्रेजी भाषा को भी शामिल किया गया है, लेकिन यहां अंग्रेजी केवल एक भाषा की तरह ही मौजूद है। 'वेबदुनिया' की स्वामी भाषा वह नहीं है। डिजिटल तकनीक पर हिन्दी और भारतीय भाषाएं आगे आई और उन्होंने अपना झंडा फहराया, यह 'वेबदुनिया' ने साबित कर दिया है। 'वेबदुनिया' ने ये बातें तब सोची थीं, जब इस बारे में सोचना भी मुश्किल था।

18 वर्ष की युवा 'वेबदुनिया' को शुभकामनाएं। यह बात सचमुच खुशी देने वाली है कि इसके शुरुआती सफर में मैं इसका हिस्सा था। आज भी 'मेरा हैशटैग' कॉलम के रूप में मैं 'वेबदुनिया' के साथ हूं।

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