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क्या मोदी को चुकानी पड़ेगी नोटबंदी की कीमत..?

नई दिल्ली| पुनः संशोधित बुधवार, 11 जनवरी 2017 (13:59 IST)
नई दिल्ली। दुनिया के अनेक अच्‍छे नेताओं ने खराब विचार दिया जो कि क्रियान्वयन में भयानक थे हालांकि कागज पर ये बहुत आकर्षक और संभावनाशील प्रतीत होते थे। दुनिया के लोकतांत्रिक देशों में यह बीमारी ज्यादा पाई जाती है क्योंकि इस तरह की व्यवस्था में नेताओं, बुद्धिजीवियों और उनके विचारों की बहुतायत होती है। इस कारण से अच्छे लोग भी बड़ी भारी गलतियां कर जाते हैं और भारत का इतिहास को इसका सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है कि स्वतंत्रता से पहले और बाद में हमारे देश का इतिहास ऐसा रहा है जिसे देखकर कहा जा सकता है कि पहली बार तो कोई नेता गलती नहीं करता है और गलती करने भी उसे आदर्श फैसला बताने का कोई मौका नहीं चूकता।
 
गांधी, नेहरू से लेकर आज की पीढ़ी के नेता ऐसे रहे हैं जिनकी गलतियों के कई बार देश के अस्तित्व को ही संकट में डाल दिया, लेकिन इन गलतियों को लेकर यह तर्क दिया जाता है कि महान गलतियां करना ही तो महान लोगों की पहचान है। भले ही महान गलतियों की सजा उन लोगों को भोगनी पड़े जिनका इस तरह के फैसलों से कोई दूर-दूर तक नाता नहीं था। लेकिन इन गलतियों ने देशों के कर्णधारों के सोचने समझने का तरीका ही बदल डाला। चालीस वर्ष पहले इंदिराजी के सुपुत्र ने नसबंदी के सहारे देश की जनसंख्या समस्या का टेक्निक से हल खोजने के विचार को क्रियान्वित किया था। बाद में जो हुआ, उसका इतिहास सभी जानते हैं। चालीस वर्ष बाद अगर नोटबंदी का परिणाम भी ऐसा हो तो कोई आश्चर्य नहीं करना चाहिए क्योंकि दोनों समय के नेता विचारों में एक जैसे ही थे।
इसके साथ के इतिहास पर भी नजर डाल लें। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के चुनाव को 1971 में रद्द कर दिया था, लेकिन इसके बाद भी जस्टिस कृष्ण अय्यर ने उन्हें क्यों लोकसभा जाने की इजाजत दी? वैसे इंदिरा को जस्टिस अय्यर ने लोकसभा में वोट का अधिकार नहीं दिया था। वह एक विद्वान जज थे लेकिन उनके इस फैसले से देश में इमरजेंसी लगाने की राह तैयार हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के तीन जजों (जिनकी काबिलियत पर किसी को शक नहीं था) को क्यों अपनी कुर्सी छोड़नी पड़ी, यह सभी जानते हैं। 
 
क्यों आर्मी चीफ जनरल सुंदरजी ने इंदिरा गांधी को यकीन दिलाया कि उग्रवादियों को स्वर्णमंदिर से निकालने का विचार बुरा नहीं था? परिणामस्वरूप इसके चार महीने बाद ही इंदिरा की हत्या कर दी गई। क्यों राजीव गांधी को बाबरी मस्जिद का ताला खोलना अच्छा आइडिया लगा? इस फैसले की वजह से यूपी से पार्टी का नामोनिशान मिट गया। क्यों नरसिंहराव को झारखंड मुक्ति मोर्चा को रिश्वत देना सही लगा? झारखंड की पार्टी ने चेक से रिश्वत ली और राव पकड़े गए। इस झटके से वह कभी नहीं उबर पाए और 1996 के लोकसभा चुनाव में उनकी हार हुई। ऐसा नहीं था कि इन लोगों में विचारशीलता की कमी थी? 
 
वरन इनके विचारों का क्रियान्वयन दोषपूर्ण था। अटलबिहारी वाजपेयी को क्यों लगा कि खुलेआम परमाणु परीक्षण करना अच्छा आइडिया था? इससे 6 साल तक भारत पर अंतरराष्ट्रीय पाबंदी लगी रही जिसकी भारी कीमत चुकानी पड़ी। मनमोहनसिंह क्यों मनरेगा के लिए मान गए, जबकि वह निजी तौर पर योजना को पैसे की बर्बादी मानते थे? इससे देश में महंगाई बेलगाम हुई और 2014 के आम चुनाव में उनकी पार्टी की जबरदस्त हार हुई।
 
दुनिया में ऐसे मामलों की कमी नहीं : सिर्फ भारत के अच्छे लीडर्स ने ही ऐसी गलतियां नहीं की हैं। दुनिया में भी ऐसी कई मिसालें हैं। मैं किसी तानाशाह की बात नहीं कर रहा हूं, जिसके राजकाज में ऐसे मामले होते ही रहते हैं। मेच्योर डेमोक्रेसी में भी नियमित तौर पर ऐसा देखा गया है। जॉन एफ कैनेडी को वियतनाम में अमेरिका का युद्ध करना अच्छा आइडिया लगा? इस वॉर में अमेरिका की हार हुई और इससे 1971 में इंटरनेशनल फाइनेंशियल सिस्टम तबाह हो गया। अमेरिका के अच्छे राष्ट्रपतियों में शामिल रिचर्ड निक्सन को डेमोक्रेटिक पार्टी के हेडक्वॉर्टर्स की जासूसी क्यों अच्छा आइडिया लगा? इससे वह शर्मसार हुए और उन्हें इस्तीफा देना पड़ा।
 
मार्गरेट थैचर को सभी ब्रिटिश नागरिकों पर एक समान टैक्स लगाने का आइडिया क्यों अच्छा लगा? इसके चलते उनकी अपनी ही पार्टी ने उन्हें पद छोड़ने के लिए कहा। डेविड कैमरन को यूरोपियन यूनियन (ईयू) में बने रहने के लिए रेफरेंडम कराना क्यों अच्छा आइडिया लगा, जिसमें वहां के लोगों ने ईयू से बाहर निकलने का फैसला किया। हालांकि जब भी इस पर अमल (अगर ऐसा होता है तो) होगा, यह ब्रिटेन के लिए तबाही साबित होगी।
 
बराक ओबामा को क्यों लगा कि अमेरिका का दूसरे देशों के मामलों में टांग नहीं अड़ाना अच्छा आइडिया है, लेकिन इससे चीन को आक्रामक होने का मौका मिल गया? इसी वजह से आखिरकार डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति चुने जाने का रास्ता खुला। पश्चिमी यूरोप और जापान में भी ऐसे मामलों की कमी नहीं है। कहने का मतलब यह है कि कोई भी देश ऐसी भयंकर गलतियों से बचा नहीं है। नोटबंदी और इसकी तबाही का असर देश पर कब दिखाई देगा यह तो आने वाला समय ही बताएगा ? 
 
मोदी के लिए सबक : इसमें नरेंद्र मोदी के लिए यह सबक है कि भयंकर गलतियों की बड़ी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ती है। 86% करेंसी को अचानक अवैध घोषित करने के उनके फैसले के बाद देश की 130 करोड़ जनता के मन में यह सवाल उठ रहा है कि मोदी भाषण देते वक्त जितने समझदार लगते हैं, क्या वह वास्तव में वैसे हैं? नोटबंदी के इतने बुरे आइडिया के लिए वह क्यों मान गए? उन्हें इसकी कितनी राजनीतिक कीमत चुकानी पड़ेगी? अगले दो साल में इस सवाल का जवाब मिल जाएगा।
 
इस बीच दबी आवाज में कई बातें कही जा रही हैं। बीजेपी के अंदर से ऐसी आवाजें उठ रही हैं कि मोदी की नीयत में खोट नहीं है, लेकिन उनका अंदाज सही नहीं है। पार्टी के अंदर से इस तरह की जो आवाजें उठ रही हैं, उनकी डिटेल अलग-अलग है, लेकिन इसका मतलब यह है कि प्रधानमंत्री मसलों का नाटकीय हल चाहते हैं। उनकी दिलचस्पी सोच-समझकर बनाई गई पॉलिसी और उसे लागू करने में नहीं है। मोदी के पास अपने कामकाज का तरीका बदलने के लिए दो साल का वक्त बचा है। चाहे ब्लैकमनी पर रोक लगाने की बात हो या ज्यादा लोगों को टैक्स के दायरे में लाने की, प्रधानमंत्री की नीयत ठीक है। इसलिए इन पर गलत तरीके से अमल करके लोगों का भरोसा गंवाने की कोई तुक नहीं बनती है? अगर बीजेपी को 2019 में लोकसभा चुनाव में जीत नहीं मिलती तो देश में फिर गठबंधन सरकारों का दौर शुरू हो जाएगा। क्या यह एक ऐसी संभावना है जिसे कोई ऐसा चाहता है?
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