ईंट के भट्टों से इंटरनेट के आकाश तक

कोमल हाथों से पहचान गढ़ते मजदूर बच्चे

वॉल मैग्जीन से ब्लॉग तक का सफर
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कौन है
पिछड़े इलाकों से शहरों में काम की तलाश में मजदूर बरसों से आते रहें हैं। जैसे औद्योगिक नगर में इनकी संख्या दूसरे शहर की अपेक्षा बढ़ जाती है। कानपुर में वर्तमान में लगभग 270 ईंट-भट्टे संचालित हैं। यहाँ काम करने वाले मजदूर अपने ठेकेदारों से अग्रिम धनराशि ले लेते हैं।

जिसके बदले में उन्हें तमाम जिंदगी बंधुआ मजदूर के रूप काम करना पड़ता है। पीढ़ी दर पीढ़ी यह चक्र चलता है और इसके शिकार होते हैं मजदूरों के मासूम बच्चे, जो सुकोमल हाथों से ईंटों की भराई और निकासी के काम में लग जाते हैं,‍बिना यह जाने कि बचपन की शरारतें क्या होती हैं और बचपन की निश्छल मुस्कान के क्या मायने है?

कदम कैसे बढ़ा आगे
आरंभ में सामाजिक कार्यकर्ता विजया रामचन्द्रन ने (उनकी एक और पहचान है कि वे पूर्व राष्ट्रपति स्व. वेंकटरमन की पुत्री है) 1984 में ईंटों के भट्टे पर ही शिक्षा केन्द्र की स्थापना की। नाम रखा गया 'अपना स्कूल'। इस 'अपना स्कूल' की समूची जिम्मेदारी मजदूरों और उनके बच्चों को ही दी गई।

समस्या यह सामने आई कि नवंबर से जून तक तो इन बच्चों को पढ़ाना आसान था लेकिन बारिश की वजह से भट्टों पर काम बंद होने से वापस मजदूर अपने गाँव लौट जाते और शिक्षा की रोशनी मंद होने लगती। समाधान के रूप में 'अपना घर' नाम से होस्टल खोला गया। विजया जी, संदीप पांडेय(मैग्सेसे अवॉर्ड प्राप्त) व के मिलेजुले प्रयासों से 9 बच्चे को प्रवेश दिया गया जहाँ वर्तमान में 12 बच्चे अपने जीवन की सतरंगी आशाओं का इन्द्रधनुष रच रहे हैं।

वॉल मैग्जीन में बाल रचनाएँ
स्मृति आदित्य| Last Updated: बुधवार, 1 अक्टूबर 2014 (19:03 IST)
यहाँ बच्चों की रचनात्मकता को निखार देने और उनकी विविध रंगी सोच को कैनवास देने के लिए एक वॉल मैग्जीन आरंभ की गई। प्रति शनिवार हस्तलिखित इस पत्रिका में 12 बच्चे अपनी मधुर कल्पना और अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने लगे। अब इन बच्चों ने नए सपनों, नए अरमानों और नए हौंसलों की कच्ची-पक्की परिभाषाएँ रचना शुरु की। कविता, कहानी और संस्मरणों का अनगढ़ सिलसिला आरंभ हुआ।

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