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विनोद खन्ना : सत्य से साक्षात्कार को विलीन बेजोड़ कलाकार

Author ऋतुपर्ण दवे|


बेजोड़ कलाकार, अजीम शख्सि‍यत, हरफनमौला अंदाज, सत्य को खोजता सन्यासी, अपने वजूद से जुड़ाव और सबके लिए कुछ करने का जज्बा। बस यही नाम था विनोद खन्ना का, लेकिन किसको पता था कि दर्द झलकाती आखिरी तस्वीर में भी मुस्कुराहट से कोई समझौता नहीं करने वाला सबका चहेता, स्मार्ट और हैंडसम कलाकार, बस 70 साल की उम्र में यूं धोखा देकर चला जाएगा! शायद नीयति को यही मंजूर था। जुदा अंदाज, दबंग आवाज के लिए मशहूर विनोद खन्ना का जन्म 6 अक्टूबर,1946 को पेशावर (अब पाकिस्तान) में हुआ था। 1947 के बंटवारे बाद, परिवार मुंबई आकर बस गया। पिता किशनचंद का टेक्सटाइल्स का कारोबार था और माता कमला गृहिणी।  
 
स्कूली शिक्षा नासिक बोर्डिग स्कूल बार्नेस में हुई वहीं उन्होंने सिद्धेहम कॉलेज से वाणिज्य में स्नातक किया। बीच-बीच में मुंबई के सेंट मैरी स्कूल, दिल्ली के सेंट जेवियर्स हाईस्कूल और दिल्ली पब्लिक स्कूल में दाखिला भी लिया। पिता चाहते थे पारिवारिक कारोबार संभालें, लेकिन उनका झुकाव फिल्मों में था। पहली रोल 1968 में सुनील दत्त ने, फिल्म ‘मन के मीत’  में विलेन का दिया। दत्त साहब ने फिल्म अपने भाई को लांच करने बनाई थी। इसमें दर्शकों को, खलनायकी कम, सूरत और सीरत ज्यादा भाई? फिर भी ‘पूरब और पश्चिम (1970)', ‘सच्‍चा झूठा' (1970) और ‘मेरा गांव मेरा देश (1971)' में नकारात्मक भूमिका ही निभाई। लेकिन कामियाबी कहीं और ले जाना चाहती थी।
 
स्टारडम के बावजूद बेहद सादगी, शालीनता, सौम्यता और एक सन्यासी के रूप में सत्य की खोज के लिए सब कुछ छोड़ना विनोद खन्ना ही कर सकते थे। अध्यात्म से जुड़ाव, उसे जीने का ख्वाब, रमने-बसने की तड़प इतनी ऊंचाई पर पहुंचे इंसान में देखकर हर कोई हैरान था। लेकिन दुनिया का विरला उदाहरण भी वो बने और दिल नहीं, मन की सुनी। फिल्मी चकाचौंध छोड़, ओशो के साथ ऐसा रमे कि 1982 में एकाएक फिल्मों से किनारा कर गए। रजनीश के अनुयायी बनकर पूरे 5 साल पुणे में रहे जबकि दौर, उनके बेजोड़ अभिनय और शीर्षतम का था। ओशो संग भी वो नहीं रम पाए, 1987 में दोबारा वापसी की वापसी की, बॉलीवुड लेकिन वैवाहिक जीवन टूट की कगार पर जा पहुंचा। राजनीति में सक्रिय हुए और राजनीतिक किरदारों को भी न केवल बखूबी जिया बल्कि मौत से रू-ब-रू होने तक वो निभाते रहे।
 
1998, 1999 और 2004 में गुरदासपुर लोकसभा सीट से लगातार निर्वाचित हुए। 2009 में पराजित हुए लेकिन 2014 में इसी सीट से जीते। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में संस्कृति एवं पर्यटन राज्यमंत्री और फिर विदेश राज्यमंत्री बने। क्षेत्र में कम जाने के बावजूद लोकप्रियता में कोई कमीं नहीं आई। 
 
‘कुर्बानी’ का ‘अमर’, ‘द बर्निंग ट्रेन’ का ‘विनोद वर्मा’, ‘मुकद्दर का सिकंदर’ का ‘विशाल आनंद’, तमिल फिल्‍म का हिंदी रिमेक ‘दयावान’ का ‘शक्ति दयावान’  की भूमिका ने खूब शोहरत और ऊंचाई दी। वहीं फिल्म ‘पहचान’ का ‘दीपक खन्ना’, ‘हिमालय पुत्र’ का ‘एसीपी सूरज खन्ना’, ‘दीवानापन’ का ‘रणवीर चौधरी’, ‘ढ़ाल’ का ‘इंसपेक्टर वरुण’, ‘मुकदमा’ का ‘कप्तान अजीत सिंह’, ‘हलचल’ का ‘एसीपी सिध्दांत’, ‘ईना मीना डीका’ का ‘डीका’, ‘इंसानियत के देवता’ का ‘बलबीर’, ‘निश्चय’ का ‘रवि यादव’, ‘परंपरा’ का ‘ठाकुर पृथ्वी सिंह’, ‘पुलिस और मुजरिम’ का ‘डॉ विशाल खन्ना’, ‘खून का कर्ज’ का ‘करन’, ‘धर्म संकट’ का ‘बिरजू’, ‘पत्थर के इंसान’ का ‘अर्जुन’, ‘सीआईडी’ का ‘इंसपेक्टर वीर’, ‘चांदनी’ का ‘ललित खन्ना’, ‘बंटवारा’ का ‘विक्रम सिंह’, ‘सूर्या’ का ‘सूरज सिंह’, ‘महादेव’ का ‘अर्जुन सिंह’, ‘आखिरी अदालत’ का ‘इंसपेक्टर अमर कौशल’, ‘फैसला’ का ‘बिरजू’, ‘सत्यमेव जयते’ का ‘इंसपेक्टर अर्जुन’, ‘दौलत के दुश्मन’ का ‘भानू’, ‘खुदा कमस’ का ‘सुमेर सिंह’, ‘जय यात्रा’ का ‘राजू वर्मा’, ‘सरकारी मेहमान’ का ‘आनंद’, ‘दो शिकारी’ का ‘सतीश’, ‘मीरा का राणा’ का ‘भोजरा सेसोडिया’, ‘मेरा गांव मेरा देश’ का ‘जब्बार सिंह’ सहित लगभग डेढ़ सौ फिल्मों में दमदार अभिनय किया।  छोटे पर्दे पर भी दिखे, सीरियल ‘मेरे अपने' में मुख्य भूमिका निभाई। आखिरी फिल्म विजयाराजे सिंधिया की बायोपिक 'एक रानी ऐसी भी' थी।
 
बचपन के शर्मीले विनोद ने, कॉलेज मित्र गीतांजलि से शादी की जिनसे अक्षय और राहुल हुए। बाद में 1990 में अपने से 15 बरस छोटी कविता से दूसरी शादी की जिनसे बेटा साक्षी और बेटी श्रद्धा है। मंहगी कारों के शौकीन विनोद खन्ना की बीएमडब्‍ल्‍यू 520 पसंदीदा गाड़ी थी। फॉक्‍सवैगन की पसाट, टोयोटा की अल्टिस, इनोवा और महिंद्रा एसयूवी के साथ इलेक्ट्रिक कार रेवा भी पसंद थी। कुल 55.2 करोड़ की संपत्ति में 19.49 करोड़ की चल, 35.71 करोड़ रुपए की अचल संपत्ति थी। मुंबई के मालाबार हिल्‍स और गुरदासपुर में एक-एक मकान के साथ उन्हें शेयर, डिबेंचर और म्‍यूचुअल फंड्स में निवेश का शौक था, जिसमें 13.63 करोड़ रुपए लगा रखे हैं। 1999 में इंडस्ट्री में योगदान के लिए फिल्मफेयर लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड से नवाजे गए विनोद खन्ना की रिक्तता हमेशा खलेगी। 
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