एक प्रार्थना, कुछ सवाल.....


-शैली बक्षी खडकोतकर

इन का क्या कोई इलाज है....

सारा स्तब्ध है. इंदौर ही क्यों, जहां-जहां इस दर्दनाक हादसे की आंच पहुंची, हर संवेदनशील मन स्तब्ध है.... शब्द पिघल कर आंसू बन गए हैं और आंसू नेत्र-कोरों पर ही जम गए हैं। क्या कहा जाए, क्या किया जाए कि सब कुछ पहले जैसा हो जाए। फिर से उस दिन का सूरज उगे पर उन पांच घरों के चिराग न बुझे। हंसते खेलते, दौड़ते-चिल्लाते बच्चे फिर घरों को, दिलों को रोशन कर दे।

काश...! काश, हमारी प्रार्थनाओं में इतनी ताकत होती, तो सचमुच दुनिया में किसी माता-पिता को इस असहनीय पीड़ा से नहीं गुजरना पड़ता। 20 साल का हंसमुख शशांक डम्पर की चपेट में आ जाता है और आखरी सांस तक यही कहता है, 'माँ, मेरी गलती नहीं थी' और जाते-जाते 10 जरुरतमंदों को अंगदान कर अमर हो जाता है....

फिर गलती किसकी थी? हादसों के बाद हम इन सवालों से जूझते हैं पर तब जवाब से क्या फर्क पड़ता है। दरअसल हादसे तो हमारी सडकों पर बिखरे पड़े हैं। बच्चा जब घर से निकलता है, तो मां का दिल ऐसी ही आशंकाओं से घिरा रहता है, जो सकुशल लौटने पर ही राहत की सांस लेता है। सड़कों पर ये रोज कौन-सा खेल खेला जाता है? रफ़्तार और रोमांच के दीवाने निकलते हैं। अपने दो या चार पहिया वाहनों पर सवार.......इन्हें क्या संबोधित करूं ? नाम तो कुछ भी हो सकता हैं, राजा, सलीम, सनी, कुछ और. हम इन्हें नहीं जानते पर ये हमें रोज़ मिलते हैं, किसी न किसी रूप में.. .

सड़क पर अंधाधुंध बाइक, कार, वैन या बस दौड़ते. भीड़ भरे बाजारों में तेज़ हार्न बजाते हुए, आड़ी तिरछी कर गाड़ी चलाते, चौराहों पर ट्रैफिक नियमों की धज्जियां उड़ाते या अचानक किसी मोड़ पर यमदूत की तरह प्रगट होते, ये रोज़ दिख जाते हैं। शक्लें अलग होती हैं, नाम भी जुदा होंगे पर हम जैसे सभी राहगीरों के लिए इन सबकी एक ही पहचान हैं... दहशत गर्द... सड़कों पर आतंक फैलाते रोड़ टेररिस्ट.. .

अफ़सोस यह कि आतंक को खत्म करने के लिए प्रतिबद्ध पुलिस और प्रशासन की आंखों के सामने यह लोग दिन-रात दहशत फैलाते बेखौफ घूमते हैं।
और अधिकांश इनका कुछ नहीं बिगड़ता, जब तक की कोई बड़ा नुकसान न हो... ऐसा लगता है, मानो हम सड़क पर नहीं युद्ध के मैदान में हो, बच गए तो किस्मत. और यह लोग हमेशा जीतना चाहते हैं। सबसे आगे रहना चाहते हैं। रफ़्तार का जूनून है, रोमांच का नशा है, बहादुरी रग-रग में समाई हो जैसे, कितना अच्छा है... ये सब साहसी युवा होने के लक्षण हैं...
(?)

लेकिन इन सबके प्रदर्शन के लिए सिर्फ सड़क ही क्यों ?

जिन्दगी में इतनी बार गलत होता हैं, अन्याय होता हैं, दूसरों के साथ या खुद इनके साथ। तब क्या इसी शक्ति के साथ खड़े हो पाते हैं, इनके विरुद्ध?

जिन सडकों को इन्होनें खेल का मैदान बना रखा हैं, मैंने तो वहीं से इन्हें दुम दबाकर भागते देखा हैं, कई बार... जब बस-स्टॉप पर किसी लड़की को मनचले छेड़ रहे हो या कोई घायल मदद की गुहार लगा रहा हो।

वैसे भी इनसे संवेदनशीलता की उम्मीद कैसे करें? बेसुध रफ़्तार कितनों को चोटिल करती हैं, जख्म देती हैं, यहां तक कि उनके प्राण तक ले लेती हैं। कई बार तो गाडियों की जूं-जूं की आवाज से ही बुजुर्ग-बच्चे हडबडाकर संतुलन खो देते हैं।

कभी जानने की कोशिश की होगी कि इस आतंक की परिणिति क्या होती हैं? हो सकता हैं, जिस मासूम को ये टक्कर मार कर निकलते हैं, वह किसी जरुरी इम्तेहान के लिए जा रहा हो, जरा-से झटके से किसी वयोवृद्ध ने हमेशा के लिए बिस्तर पकड़ लिया हो या कोई इकलौता कमाने वाला सदस्य घर बैठ गया हो। हमारी न्याय-व्यवस्था में ही यह प्रावधान हो कि हादसे के लिए जिम्मेदार व्यक्ति ही पीड़ित और उसके परिवार कि देखभाल करें। तब शायद अहसास हो कि जरा-सा मजा कैसे जिन्दगी भर का दर्द बन जाता है।

हद तो यह हैं कि इसी तेवर के साथ यह लोग स्कूल बस या वैन चलाने से भी नहीं झिझकते। इंदौर हादसे में ड्राईवर की चूक थी या प्रबंधन की लापरवाही, पता नहीं। लेकिन वैसे भी आए दिन अखबारों में स्कूल बस और वैन के हादसों की सुर्ख़ियां छपती हैं। सबसे भयावह दृश्य है, जहां माता-पिता अपने लाडले या प्यारी बिटिया को तैयार कर हंसी-ख़ुशी वैन/बस में विदा करते हैं और कुछ पलों के बाद खून से लथपथ-कहराता बच्चा उनके हाथों में होता है।

मैंने कई बार, दो पहिया या चार पहिया वाहनों पर सवारों को समझाने की कोशिश की है। कभी सुना, कभी अनसुना किया और कभी फर्राटे से गाड़ी भगाते चले गए।

ये लोग जिन्दगी को किस तरह देखते हैं, मैं समझ नहीं पाती। इन्हें चुनौतियां पसंद हैं, जोश और जूनून दिखाना हैं तो भारतीय सेना को हिस्सा बनें। यह
वीरता और हौसला सीमा पर दिखाएं। देश को साहसी नौजवान की जरुरत है। पर नहीं, वहां तो कड़े अनुशासन और समर्पण की जरुरत होगी। वह इनमें कहां?

अगर जीवन में रोमांच चाहिए, थ्रिल चाहिए तो भाई, जाओ बंजी जम्पिंग करो, पैराग्लाइंडिंग करो, पहाड़ पर चढ़ाई करो, जंगलों की खाक छानो लेकिन नन्ही पलकों पर बड़े-बड़े सपने सजाए स्कूल जाते मासूमों की जान बख्शो। अपनी जीवन संध्या में किसी तरह आत्म निर्भरता टिकाए रखने की जद्दोजहद करते बुजुर्गो पर रहम खाओ। अपने परिवारों के लिए सीधे-सादे लोगों को अपने घरौंदों तक सुरक्षित पहुंचने दो।

एक निवेदन, एक आह्वान..... हम रोकें इन्हें, टोके। स्कूल कॉलेज प्रबंधन को रश ड्राइविंग की सूचना दें। ट्रैफिक-पुलिस को सूचित करें। पुलिस तेज रफ्तार वाहनों को शहरों के अंदर चलाने का परमिट ही न दें। सड़कें नागरिकों के आवागमन के लिए हैं, न कि कोई रेस-कोर्स है। हम सब इस अभियान को हाथ में लें। आखिर बच्चों को सुरक्षित दुनिया देने की जिम्मेदारी हम सबकी है।


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