आरुषि मर्डर की पेचीदा पहेली, ‘गेम ओवर’!



यही होता है। जब मामला समझ में नहीं आता अथवा उलझन जब सुलझती नहीं तो ‘गेम ओवर’ कर दिया जाता है। यह मान लिया जाता है ज्यादा माथापच्ची से कुछ होने वाला नहीं है। शायद आरुषि तलवार मर्डर मिस्ट्री में आए फैसले यही संकेत कर रहे हैं। अब तयशुदा जैसा प्रतीत हो रहा है कि आरुषि मर्डर मिस्ट्री पर अब ज्यादा बहस होने वाली नहीं है। जो होना था, हो लिया। बहुचर्चित और पेचीदा आरुषि-हेमराज हत्याकांड मामले में सीबीआई अदालत द्वारा दोषी करार दिए गए राजेश तलवार और उनकी पत्नी नूपुर तलवार को इलाहाबाद हाइकोर्ट ने दोषमुक्त कर दिया है। हाइकोर्ट के संबंधित खंडपीठ ने डासना जेल में उम्रकैद की सजा काट रहे दंपति को रिहा करने का आदेश दिया है।
खंडपीठ में शामिल दो जजों ने अलग-अलग अपना फैसला लिखा। आदेश में कहा गया है कि सीबीआई इस हत्याकांड में नूपुर दंपति की संलिप्तता संदेह से परे साबित करने में असमर्थ रही, सिर्फ शक के आधार पर किसी को सजा नहीं दी जा सकती। संभावना है कि सीबीआई इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी, क्योंकि असल सवाल बना हुआ है। गौरतलब है कि नोएडा के जलवायु विहार कॉलोनी में 16 मई, 2008 को चौदह साल की आरुषि तलवार का शव अपने बेडरूम में पाया गया था। गला काट कर उसकी हत्या की गई थी। तलवार दंपति ने हत्या का शक अपने घरेलू नौकर हेमराज पर जताया था। लेकिन अगले दिन हेमराज का शव भी उसी फ्लैट की छत से बरामद हुआ। तब पहली बार पारिस्थितिक साक्ष्य को देखते हुए हत्या का शक तलवार दंपति पर गया था।
इस मसले पर हाईकोर्ट ने माना है कि जांच में कई खामियां हैं। ऐसे मामलों में सुप्रीम कोर्ट भी इतनी कठोर सजा नहीं देता है। तलवार दंपत्ति साल 2013 से गाजियाबाद की डासना जेल में बंद हैं। उन्हें गाजियाबाद की सीबीआई कोर्ट ने इस हत्याकांड का दोषी करार देते हुए दोनों को उम्रकैद सुनाई थी। इसके बाद उनके वकीलों ने निचली अदालत के फैसले को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। तलवार दंपत्ति के वकील तनवीर अहमद ने तब सीबीआई कोर्ट के 204 पन्नों के फैसले पर उंगली उठाई थी। तब वकील तनवीर अहमद ने बताया था कि उन्होंने ट्रायल के दौरान कोर्ट का ध्यान कुछ मुद्दों पर दिलाने की कोशिश की थी लेकिन अदालत ने उस पर ध्यान नहीं दिया। बाद में उन्हीं तथ्यों का हवाला देकर तलवार दंपत्ति के वकीलों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपील की और अंतत: उन्हें इसका लाभ मिला। बचाव पक्ष के वकीलों ने हाईकोर्ट में दलील दी कि जांचकर्ता ने साक्ष्यों का बोझ आरोपियों पर डाल दिया।
चूंकि जांच एजेंसी ने मान लिया कि घटना के दिन घर पर चार लोग ही थे, जिनमें से दो की हत्या हो गई। इसलिए बाकी बचे दो लोग ही इसके गुनहगार हैं। बचाव पक्ष ने दलील दी कि सुप्रीम कोर्ट ने काली राम बनाम हिमाचल प्रदेश सरकार (1973) में फैसला दिया था कि ऐसे मामलों में आरोपी पर साक्ष्यों का बोझ नहीं डाला जा सकता। बचाव पक्ष ने दलील दी कि तलवार दंपत्ति की नौकरानी को सीबीआई ने बयान देने के लिए दवाब डाला था। नौकरानी ने कोर्ट को बताया था कि घटना की सुबह जब वो घर पर पहुंची थी, तो देखा कि दरवाजा अंदर से बंद है। सीबीआई ने इस बयान का इस्तेमाल तलवार दंपत्ति के खिलाफ किया कि हत्यारा घर में ही था। बाद में ट्रायल के दौरान नौकरानी ने बयान बदल दिया।
बचाव पक्ष ने कोर्ट में जिस तरह घटनाओं की कड़ी को पेश किया है, उससे घटना की सच्चाई और आरोपियों को संदेह का लाभ मिला। चूंकि सीबीआई ने साक्ष्यों का बोझ आरोपियों पर डाल दिया, इसलिए यह साबित नहीं हो सका कि मर्डर केस में किसी बाहरी शख्स का हाथ है या नहीं। सीबीआई ने निचली अदालत के सामने तथ्य पेश किए थे कि हेमराज के खून का डीएनए सैंपल आरुषि के कमरे से उसके तकिए पर से लिया गया था लेकिन ट्रायल के दौरान फॉरेन्सिक लैबोरेटरी के डॉक्टर बी के महापात्रा ने कहा कि हेमराज के खून के नमूने आरुषि के कमरे से नहीं हेमराज के कमरे से लिए गए थे। बचाव पक्ष ने इस तरह के कुछ और तथ्यों में पाई गई गड़बड़ियों के सबूत कोर्ट को सौंपे। हाईकोर्ट ने भी माना कि ये तथ्य और सबूत तलवार दंपत्ति को दोषी ठहराने के लिए काफी नहीं हैं। उत्तर प्रदेश पुलिस ने इसके बाद आरुषि के पिता राजेश तलवार को गिरफ्तार किया था। जून, 2008 में मामला सीबीआई को सौंपा गया। सीबीआइ ने इसमें तीन लोगों को अभियुक्त बनाया, लेकिन वह नब्बे दिन तक आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकी। तब सितंबर, 2009 में इस हत्याकांड की जांच के लिए सीबीआई की दूसरी टीम गठित हुई, जिसने अदालत में क्लोजर रिपोर्ट लगा दी। हालांकि यह रिपोर्ट दंपति तलवार के पक्ष में ही थी, लेकिन कहते हैं कि नियति कई बार कुछ और ही खेल खेल रही होती है। राजेश तलवार ने इस क्लोजर रिपोर्ट को चुनौती दे दी। सीबीआई अदालत के न्यायाधीश ने क्लोजर रिपोर्ट को ही आरोपपत्र में बदल दिया।

25 नवंबर, 2013 को उन्होंने नूपुर दंपति को हत्या करने, सबूत मिटाने आदि आरोपों में उम्रकैद की सजा सुना दी। इस फैसले को हाइकोर्ट में चुनौती दी गई थी। यह भी आश्चर्यजनक है कि सीबीआई अदालत ने जिस पारिस्थितिक साक्ष्य को इस मुकदमे की मजबूती माना था, उसी को हाइकोर्ट ने इसकी कमजोरी माना है।
किसी हाई प्रोफाइल केस में जब ऐसा मोड़ आता है तब कई स्वाभाविक सवाल भी उठते हैं कि आखिर अपराध किया किसने? क्या हमारी जांच संस्थाएं ठीक से काम नहीं कर पाती हैं? अगर किसी को गलत आरोप में सजा हुई तो उनका खोया हुआ वक्त और सम्मान कैसे वापस हो सकता है? पुरानी कहावत है कि देर से न्याय मिलना मतलब न्याय नहीं हुआ। जानकार मानते हैं कि इस मामले में कोर्ट उतना दोषी नहीं जितना कि हमारी जांच संस्थाएं दोषी हैं।
सवाल तो यह भी होना चाहिए कि मृत आरुषि के चरित्र को दागदार क्यों किया गया। तरह-तरह की कहानियां कही गई। अभियोग पक्ष किसी तरह तथ्यों को तरोड़-मरोड़ कर केस जीतने की कोशिश करते हैं। उनका काम कोर्ट की मदद करना है ना कि किसी भी तरीके से किसी के पक्ष में केस जीतना।
अगर ये साबित होता है कि किसी को गलत सज़ा हुई तो प्रावधान है कि वो हर्जाने के लिए कोर्ट में जा सकता है। क्रिमिनल और सिविल दोनों तरह के मामलों में ये मिल सकता है। लेकिन इसका इस्तेमाल आम नहीं है। मामले में नौ साल का वक्त लग गया। इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सीबीआई सुप्रीम कोर्ट भी जा सकती है। यानी हो सकता है कि इस मामले में आखिरी फैसला आने में और देर हो सकती है। बहरहाल, कहानी कुछ मिलाकर उलझी हुई ही प्रतीत हो रही है। अब देखना है कि आगे क्या होता है?

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