एक चिट्ठी, विकृत होते समाज के नाम


प्रिय समाज,

हां, मैं समूचे समाज से मुखातिब हूं। उस समाज से, जो स्त्रियों पर हर दिन होते दुराचार पर अपनी राय व्यक्त करता है। उस समाज से, जो हर ऐसी किसी घटना पर जिसमें महिला प्रताड़ित हुई है अपने चाहे-अनचाहे विचार व्यक्त करता है। मैं उसी समाज से पूछ रही हूं, सदियों से पूछ रही हूं। हुआ था तब भी द्रोपदी ही दोषी थी आज जब नन्ही बच्ची से लेकर हर उम्र की महिलाएं शोषण का शिकार होती है तब भी तुम्हारी नजर में दोषी महिला ही
होती है।

कुछ रटे रटाए से वाक्य तैरते मिलते हैं तुम्हारी सतह पर.... जरूर असभ्य परिधान पहने होंगे, रात में आवारा घूम रही होगी, ऐसा ही होगा.... हो सकता है तुम्हारी अधिकांश 'राय', 'चिंता' और 'विचार' जायज भी हों मगर तुम तब क्यों नहीं बोलते जब एक महिला अपनी नौकरी कर रही होती है और साड़ी पहने रहती है तब भी उसके अधिकारी उसकी साड़ी खींचने की अभद्र कोशिश करते हैं।

घटना 29 जुलाई 2017, राजधानी दिल्ली की है। के सिक्योरिटी मैनेजर ने सेक्शन में कार्यरत महिला के साथ साड़ी खींचने का यह शर्मनाक कृत्य किया। यह घटना हो गई। महिला ने संबंधित व्यक्ति के खिलाफ शिकायत भी दर्ज करा दी लेकिन सवाल तो वहीं है बिना जवाब के....

द्रोपदी से लेकर आज तक ... फिर भी यह मानने में गुरेज क्यों कि विकृत और वहशी मानसकिता से हम आजाद नहीं हुए हैं। पिछले दिनों ही आंकड़े सामने आए हैं कि विक्षिप्त महिलाओं से दुष्कृत्य की घटनाओं में वृद्धि हुई है। दोनों बातों के आईने में मैं तुम्हें 'आईना' दिखाना चाहती हूं कि जब भी किसी महिला पर हुए अत्याचार की घटना सामने आए तो बिना सोचे-समझे अपना मुंह खोलने से पहले एक बार आत्म- मूल्यांकन कर लेना।

अगर समाज में नौकरी करना ही सुरक्षित नहीं है, साड़ी पहन कर नौकरी करना भी सुरक्षित नहीं है तो दोष कहां पर किसका और कितना है इस पर तुम्हें ही सोचना जरूरी है। अगर समाज में विक्षिप्त महिलाओं से होने वाले यौन दुराचार बढ़ रहे हैं तो भी सोचना तुम्हें ही है लेकिन निरपेक्ष और गंभीर होकर....

एक विक्षिप्त या मानसिक रूप से दुर्बल महिला अगर अत्याचार का शिकार होती है तो समझना तुम्हें ही होगा कि तुम्हारे ही भीतर विक्षिप्तता पनप रही है। विक्षिप्त 'महिला' नहीं वह 'मानसिकता' है जो गांव से लेकर राजधानी तक फल-फूल रही है। यही वह मानसिकता है जो संभ्रांत या कुलीन कहे जाने वाले पांच सितारा होटल के सीसीटीवी में 'कैद' होती है और रेलवे स्टेशनों पर भटकती महिलाओं के साथ कोने में उबकाती हुई कहीं कैद नहीं होती।

हां, मैं भारतीय समाज से मुखातिब हूं जो दोहरी मानसिकता को ओढ़कर नित-नए ढोंग रचता है। वह समाज जो आधी रात को घूमती लड़कियों पर तो वार करता है पर आधी रात को शराब पीकर घूमते लड़कों से सवाल नहीं करता, कम कपड़े पहनने वाली लड़कियों को कोसने का कोई मौका नहीं छोड़ता लेकिन 11 साल की बच्ची जब अपने ही मामा के कृत्य से गर्भवती होकर बच्चे को जन्म देती है तब बेशर्म खामोशी ओढ़ लेता है।
मैं इसी भारतीय समाज से पूछ रही हूं जो परंपरा और संस्कृति के सुंदर नारे रचकर आत्ममुग्ध होता है लेकिन नवरात्रि, जन्माष्टमी और 15 अगस्त को घरों को लौटती बच्चियों से होते दुष्कृत्य पर बोलना अपनी शान के खिलाफ समझता है। इसी समाज में हिमाचल की गुड़िया लहुलूहान हुई, इसी समाज में 2 साल की फलक जीने से पहले ही मर गई। इसी समाज में अरुणा शानबाग बरसों तक असहाय जिंदा रही लाश बनकर, इसी समाज में जाने कितनी निर्भया, जाने कितनी दामिनियां हर दिन, हर रोज अपनी देह होने का भयावह दंड झेलती है, झेल रही है .... कहीं कोई अखबार की सुर्खियां बनती है और असंख्य ऐसी हैं जिसका पड़ोस भी नहीं जानता कि क्या घटित हुआ होगा इसके साथ...

अ श्रुओं की अबाध धारा से लिखी इन इबारतों को क्या तुम पढ़ पाते हो, क्या तुम्हारी नजर एक बार भी गंभीरता और गहनता से उन विकराल समस्याओं पर पड़ती है जो इसी देश की नारियों से जुड़ी है? हे समाज, अगर नहीं तो फिर कृपया किसी भी घटना पर महिला को दोषी मान लेने के निष्कर्ष पर पहुंचने की जल्दी मत करना, अपवाद संभव है लेकिन हर जगह, हर बार, हर कहीं, हर किसी के साथ वह नहीं होता जो तुम सोचते हो, बल्कि वह होता है जो तुम्हारी सोच से परे होता है।

''रॉड, बोतल, सरिये, कंकड़, पत्थर'' जानते हो ना आजकल क्या उपयोग हो रहा है इनका? जानते हो पर तुम बोल नहीं पाओगे और हां मैं अपनी तथाकथित मर्यादा के दबाव में लिख नहीं पाऊंगी.... क्यों नहीं लिख पा रही हूं इस पर भी सोचना तुम्हें ही है समाज....

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