| | | | | | दहशत गर्दी का खात्मा सूफ़ीइज़्म से-प्रो. सादिक़ | | प्रो. सादिक़ की मादरी ज़ुबान उर्दू है लेकिन उन्हें हिन्दी, मराठी, गुजराती, सिन्धी, पंजाबी, वग़ैरा ज़ुबानें न सिर्फ़ आती हैं बल्कि इन ज़ुबानों में भी उन्हें वैसी ही महारत हासिल है जैसी उर्दू में। | | | | | | |
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शायर माहिर बुरहानपुरी |
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मेरे दाग़ों में निहाँ शम्सोक़मर देखेगा, कौन
ये नज़ारा दिल की आँखें खोल कर देखेगा, कौन अपनी नज़रों से सुलगता अपना घर देखेगा... |
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| | | | | रुबाईयाँ : फ़िराक गोरखपुरी | | लहरों में खिला कंवल नहाए जैसे, दोशीज़: ए सुबह गुनगुनाए जैसे, ये रूप, ये लोच, ये तरन्नुम, ये निखार, बच्चा सोते में मुसकुराए जैसे... | | | | | |
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