1. गुल को महबूब में क़यास किया फ़र्क़ निकला बहुत जो बास किया
दिल ने हम को मिसाल-ए-आईना एक आलम से रूशनास किया
कुछ नहीं सूझता हमें उस बिन शौक़ ने हम को बेहवास किया
सुबहा तक शम्आ सर को धुनती रही क्या पतिंगे ने इल्तिमास किया
ऐसे वहशी कहाँ हैं ऐ खूबाँ मीर को तुम अबस उदास किया
2. क़द्र रखती न थी मता-ए-दिल सारे आलम को मैं दिखा लाया
दिल के इक क़तरा खूँ नहीं है बेश एक आलम के सर बला लाया
सब पे जिस बार ने गिरानी की उस को ये नातवाँ उठा लाया
दिल मुझे उस गली में ले जाकर और भी खाक में मिला लाया
इब्तिदा ही में मर गए सब यार इश्क़ की कौन इंतिहा लाया
अब तो जाते हैं मैकदे से मीर फिर मिलेंगे अगर खुदा लाया
3. इब्तिदा-ए-इश्क़ है रोता है क्या आगे-आगे देखिए होता है क्या
क़ाफ़ले में सुबहा के इक शोर है यानी ग़ाफ़िल हम चले सोता है क्या
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं तुख़्म-ए-ख़्वाहिश दिल में तू बोता है क्या
ये निशान-ए-इश्क़ हैं जाते नहीं दाग़ छाती के अबस धोता है क्या
ग़ैरत-ए-यूसुफ़ है ये वक़्त-ए-अज़ीज़ मीर इस को रायगाँ खोता है क्या
4. बेकली बेख़ुदी कुछ आज नहीं एक मुद्दत से वो मिज़ाज नहीं
दर्द अगर ये है तो मुझे बस है अब दवा की कुछ एहतेयाज नहीं
हम ने अपनी सी की बहुत लेकिन मरज़-ए-इश्क़ का इलाज नहीं
शहर-ए-ख़ूबाँ को ख़ूब देखा मीर जिंस-ए-दिल का कहीं रिवाज नहीं
5. इश्क़ में जी को सब्र-ओ-ताब कहाँ इससे आँखें लगीं तो ख़्वाब कहाँ हस्ती अपनी है बीच में परदा हम न होवें तो फिर हिजाब कहाँ
गिरया-ए-शब से सुर्ख हैं आँखें मुझ बला नोश को शराब कहाँ
इश्क़ का घर है मीर से आबाद ऐसे फिर ख़ाँनुमाँ ख़राब कहाँ |