सदाबहार गीतकार : गोपाल दास नीरज

प्रख्यात कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज का फिल्मी सफर भले ही सिर्फ पाँच साल का रहा हो लेकिन मरते दम तक लिखने के ख्वाहिशमंद इस अदीब को इस अवधि में लिखे गए ‘कारवाँ गुजर गया गुबार देखते रहे’ और ‘जीवन की बगिया महकेगी’ जैसे अमर गीतों के लिए आज भी रायल्टी मिल रही है।

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अभी न जाओ प्राण ! ......

अभी न जाओ प्राण ! प्राण में प्यास शेष है, प्यास शेष है, अभी बरुनियों के कुञ्जों मैं छितरी छाया, पलक-पात पर थिरक रही रजनी की माया, श्यामल यमुना ...

मगर निठुर न तुम रुके.....

मगर निठुर न तुम रुके, मगर निठुर न तुम रुके! पुकारता रहा हृदय, पुकारते रहे नयन, पुकारती रही सुहाग दीप की किरन-किरन, निशा-दिशा, मिलन-विरह विदग्ध ...

नारी .....

अर्ध सत्य तुम, अर्ध स्वप्न तुम, अर्ध निराशा-आशा अर्ध अजित-जित, अर्ध तृप्ति तुम, अर्ध अतृप्ति-पिपासा, आधी काया आग तुम्हारी, आधी काया ...

यदि मैं होता घन सावन का ....

पिया पिया कह मुझको भी पपिहरी बुलाती कोई, मेरे हित भी मृग-नयनी निज सेज सजाती कोई, निरख मुझे भी थिरक उठा करता मन-मोर किसी का, श्याम-संदेशा मुझसे ...

अंतिम बूँद...

अंतिम बूँद बची मधु को अब जर्जर प्यासे घट जीवन में। मधु की लाली से रहता था जहाँविहँसता सदा सबेरा, मरघट है वह मदिरालय अब घिरा मौत का सघन ...

निभाना ही कठिन है ......

प्यार करना तो बहुत आसान प्रेयसि ! अन्त तक उसका निभाना ही कठिन है। है बहुत आसान ठुकराना किसी को, है न मुश्किल भूल भी जाना किसी को, प्राण-दीपक बीच ...

बहार आई....

तुम आए कण-कण पर बहार आई तुम गए, गई झर मन की कली-कली। तुम बोले पतझर में कोयल बोली, बन गई पिघल गुँजार भ्रमर-टोली, तुम चले चल उठी वायु रूप-वन की

नींद भी मेरे नयन की...

प्राण! पहले तो हृदय तुमने चुराया, छीन ली अब नींद भी मेरे नयन की। बीत जाती रात हो जाता सवेरा, पर नयन-पंछी नहीं लेते बसेरा, बन्द पंखों में किये ...

पाती तक न पठाई

ऐसी सुधि बिसराई कि पाती तक न पठाई। बरखा गई मिलन-ऋतु बीती, घोर घटा गहरी मन-चीती, पर गागर रीती की रीती, अधरों बूंद न आई

धर्म है...

जिन मुश्किलों में मुस्कराना हो मना, उन मुश्किलों में मुस्कराना धर्म है! जिस वक्त जीना गैर-मुमकिन-सा लगे, उस वक्त जीना फर्ज है इंसान का। लाजिम ...

धनियों के तो धन हैं लाखों

धनियों के तो धन हैं लाखों धनियों के तो धन हैं लाखों मुझ निर्धन के धन बस तुम हो। कोई पहने माणिक-माला कोई लाल जड़ावे, कोई रचे महावर-मेहँदी

प्यार न होगा...

जग रूठे तो बात न कोई तुम रूठे तो प्यार न होगा। मणियों में तुम ही तो कौस्तुभ तारों में तुम ही तो चन्दा, नदियों में तुम ही तो गंगा गन्धों में तुम ...

मुझे न करना याद...

मुझे न करना याद, तुम्हारा आँगन गीला हो जाएगा। रोज़ रात को नींद चुरा ले जाएगी पपीहों की टोली, रोज़ प्रात को पीर जगाने आएगी कोयल की बोली। रोज़ ...

'कवि मंच अब कपि मंच बन गया है'

हिंदी के सुप्रसिद्घ गीतकार गोपालदास नीरज मानते हैं कि कवि मंच अब पहले जैसा कवि मंच नहीं रह गया बल्कि कपि (बंदर) मंच बन गया है। उनका कहना है कि ...

अब तुम रूठो....

अब तुम रूठो, रूठे सब संसार, मुझे परवाह नहीं है। दीप, स्वयं बन गया शलभ अब जलते-जलते,

किसलिए आऊं तुम्हारे द्वार ?

जब तुम्हारी ही हृदय में याद हर दम, लोचनों में जब सदा बैठे स्वयं तुम,

तब मेरी पीड़ा अकुलाई!

तब मेरी पीड़ा अकुलाई! जग से निंदित और उपेक्षित, होकर अपनों से भी पीड़ित,

पिया दूर है न पास है

ज़िन्दगी न तृप्ति है, न प्यास है क्योंकि पिया दूर है न पास है।

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