शोभना चौरे मैं कभी अमेरिका नही गई, न ही मुझे अंग्रेजी आती है ,लेकिन अमेरिका के बारे में अपने रिश्तेदारों, पडोसियों और अखबारों के माध्यम और हाँ फिल्मो में अमरीकी स्थलों की शूटिंग देखकर वहाँ की काफी जानकारी रखती हूँ । अमेरिका में इतनी सफाई है की वहाँ महीनों कपडे न धोओं तब भी मालूम ही नहीं पड़ता कि ये कपड़े बिना धुले हैं। यहाँ कोई पैदल ही नही चलता अगर एक हरी मिर्ची भी लाना हो तो कार से जाना पड़ता है,जबकि हमारे इंडिया(भारत)में घर के सामने बिना पैदल चले ही ठेले पर 5 रुपए में महीने भर की हरी मिर्च मिल जाती है। अमरीकी सड़कें, अमरीकी शिष्टता (थेंक्यु ,सॉरी )अमरीकी लोगों की हम इंडियन लोग बड़ाई करते नहीं थकते। अपने देश में गली गली पान की पीक थूकते लोग, अचानक वहाँ कैसे सभ्य हो जाते है बहुत सोचने पर भी मैं कभी जान नहीं पाई। मेरे रिश्तेदार जब भी कभी अमेरिका से आते सभी तरह की चर्चाएँ होती हैं। मैं उन्हें भारत की समस्याएँ बताती यहाँ की सरकार की भ्रष्टाचार की खबर देती तो वे लोग ओके ओके कहकर सर हिलाकर मेरी बात सुनते। तब मुझे लगता वे मेरी बात कितने ध्यान से सुनकर उनपर व्यथित हो रहे हैं। मैं आशावादी हो जाती। शायद भारत की समस्याएँ सुनकर यहाँ की समस्याओं का हल चुटकी में निकाल लेंगे ,क्योंकि उनके रहन-सहन में समृद्धि झलकती है और मेरी ये धारणा है कि प्रत्येक समृद्ध व्यक्ति हमेशा दूसरों की मदद करता है। | | यहाँ कोई पैदल ही नही चलता अगर एक हरी मिर्ची भी लाना हो तो कार से जाना पड़ता है,जबकि हमारे इंडिया(भारत)में घर के सामने बिना पैदल चले ही ठेले पर 5 रुपए में महीने भर की हरी मिर्च मिल जाती है। |
| |
और फ़िर इन्हें तो अपने देश का, अपने बंधुओं का कितना दर्द है जो हर साल इंडिया में आकर अपने पुराने कपड़े, जूते, जर्किन और अन्य सामान अपने रिश्तेदारों में शान से बाँट जाते हैं। अचानक मैं उनसे पूछ बैठी ,अमेरिका में नेता लोग,अभिनेता लोग, सरकारी अधिकारी कितने इमानदार होते हैं न? कभी भी हमने नहीं सुना की वहाँ कोई घोटाला हुआ। न वहाँ कोई चोरी करता है ना ही वहाँ कभी छापे पड़ते है,न ही पुलिस अधिकारी कोई भ्रष्टाचार करते है कितना अच्छा है न। भारत में उनसे ये सब चीजें क्यों नहीं सीखी जाती? तब मेरे भाई ने तपाक से उत्तर दिया दीदी वहाँ पर कोई ऐसी छोटी मोटी चोरियों धोखाधडि़यों में विश्वास नहीं करता वहाँ तो बड़े पैमाने पर हेराफेरी या स्केंडल होते है।तब मै हतप्रभ थी और मेरी मोटी बुद्धि में भी ये बात समझ नहीं आई। बात आई-गई हो गई। आज जब टीवी पर 'सत्यम' के बारे में सुना तो मुझे विश्वास हो गया कि हम इंडियन (भारतीय नहीं)बिल्कुल अमेरिकी नक्शे कदम पर चल कर दूसरों को गरीब बना रहे हैं। ख़ुद अमीरी की हवस से ओतप्रोत हो रहे हैं। पूंजीवाद को बढावा देकर समाजवाद को बौना बनाने में माहिर होते जा रहे है। पवित्र आचरण हम भारतीयों की पहचान हुआ करती थी आज वह लापता हो गई है। |