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डाली : विद्रोही तेवर के शिल्पी
सर्रियलिज्म का एक प्रधान लक्षण है द्वैतवाद जो कि डाली के चित्रों में मौजूद है। हमारी कालीदेवी की मूर्ति में इस तरह का द्वैत मत है। वीभत्सता है और वे दयामयी माँ भी हैं। ज्यादातर सर्रियल शिल्प ही इस तरह की आपात विष्णता पैदा करती है। वृहद ब्रह्माण्ड के सामने मनुष्य की पाशविकता एक अन्य दार्शनिक मात्रा ले आती है। बुन्वेल की फिल्मों में भी यही अस्वीकृतिवाचकता का भाव काफी मिलता है। मैं जब 1965-66 में अपने ग्रांट लेन वाले स्टूडियो में काम करता था। तब इस तरह की कितनी ही अनुभूतियाँ मुझे हुई हैं।

एक दिन मैंने देखा कि खिड़की पर एक राजा का आविर्भाव हुआ, उनके दोनों पैरों में गिद्ध-जैसे नाखून थे, उनके होंठ भी शिकारी पक्षी की तरह मुड़े हुए थे और ‍सिर पर एक मुकुट भी था। हमारे पास इसी तरह के राजा आते हैं, शायद हम लोग उन्हें अपने मन में बुला लाते हैं।

मैंने राजा का चित्र बनाया था, उसका शीर्षक दिया था- 'विजिट ऑफ अ किंग'। और मैं अपने चित्र 'डेथ ऑफ अ हीरो' की बात भी बता सकता हूँ। इस चित्र में एक घोड़ा अपनी गर्दन पर एक सैनिक का शव लेकर आ रहा है, उसकी पीठ पर एक विशाल पक्षी बैठा हुआ है ‍जिसके बड़े-बड़े नाखून हैं। वह अपनी चोंच से उसे जकड़ लेना चाहता है।

आखिर में घोड़े को प्यार कर कंकाल रूपी देवदूत ने 'आहा!' कहते हुए जकड़ लिया है। उसके सिर पर स्वर्गीय विभा है। भगवान का नाम ले-लेकर बार-बार लोगों को नरक का दर्शन कराया गया है। दिखने में देवदूत-जैसा, सिर में अवज्ञा लेकिन भीतर वही पैशाचिक भाव। समाजवाद के नाम पर जो लोग एकनायकत्व दिखाने आए थे, उनकी तमाम वीभत्सता हम लोगों ने देखी है। लोगों ने सोचा था कि शायद स्वर्ग उतर आया है, लेकिन वह झूठ था। इस प्रसंग में याद आता है कि चित्पुर में एक तरह के चित्र मिला करते थे, जहाँ नरक के चित्रों की साफ तस्वीर बनाई जाती थी।

अब मैं डाली के नारी के प्रति मनोभावों को लेकर चर्चा करूँगा। डाली ने नारी को रक्त-मांस कामना-वासना से पूर्ण साधारण जीव के रूप में दर्शाया है, उसकी देहलोलुपता, हिंस्रता को लेकर भी उन्होंने वीभत्स चित्र बनाए हैं। मैंने भले ही नारी को इस रूप में नहीं देखा लेकिन नारी के अन्य छुपे हुए रूपों को देखा है। मैं जब किसी दफ्तर में जाता तो देखता कि सामने वाली टेबल पर जो रिसेप्शनिस्ट महिला बैठी है उसका चेहरा नहीं है, वहाँ‍ सिर्फ लाल लिपस्टिक लगाए दो होंठ हैं। खून पीने वाले। पड़ोसी संयुक्त परिवार में नई बहू आई।

लाल चूनर, लाल साड़ी, सिर से पैर तक लाल से ढँकी हुई। एक साल बीतते न बीतते उस बहू ने संयुक्त परिवार को कैसे तोड़ कर टुकड़े-टुकड़े कर दिया। लाल कपड़े पहनी बहू को देखता तो मुझे शीतला की मूर्ति जैसी लगती। कॉलेरा, चेचक होने पर लोग शीतला देवी की पूजा करते हैं। शीतला, काली, छिन्नमस्ता, मनसा की मूर्तियों से लोग डरते हैं, लोग इन देवियों के नाम लेकर डराते भी हैं। लोग तो डर के मारे ही इनकी पूजा करते हैं। लाल कपड़ों से लिपटी हुई ये बहुएँ मानो इन देवियों जैसी ही होती हैं।

डाली का क्रूसिफिकेशन वाला चित्र जबर्दस्त रूप से अलग है। हम लोग क्रूसिफिकेशन का जो अर्थ जानते हैं, उससे डाली ने बिल्कुल अलग मात्रा संयोजित की थी। वहाँ जीसस को लेकर किसी तरह का खून-खराबा नहीं था बल्कि वहाँ तो उनका उत्थान था जिसे महिमान्वित करके दिखाया गया था। नीचे एक स्‍त्री को दिखाया गया है, वे 'मेरी' नहीं हैं। असल में उस स्त्री के अंतराल में डाली ने अपनी पत्नी को देखा था। डाली के भीतर था पत्नी-प्रेम और सबसे बड़ी चीज ईश्वर-भक्ति जो मुझे बहुत अच्छा लगता है। डाली मेरे मन में हमेशा अटूट स्थान बनाए रहेंगे।

(मूल बांग्ला से अनुवाद : उत्पल बैनर्जी)
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