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जिंदगी से गया 'एक्शन' लिखने में बढ़-चढ़कर आया
हमारे यहाँ किसी भी काम का कोई समय या कायदा नहीं है। दूर से देखते हैं कि थाने के पास की मस्जिद से अजान बंद हो गई है। मौलवी साहब ने दरवाजे की कुंडी चढ़ा दी, यानी उनके आ पहुँचने से पहले पाँच ही मिनट हाथ में है, छिपना-भागना जो भी हो इसी बीच कर डालो। कभी भाई आवाज लगाता है, 'टूटी साइकल' आ रही है

हिन्दी के सूखे पंडितजी कुछ इस तरह चलते हुए हाथ-पाँव फेंकते हैं कि उनका नाम पड़ गया है, 'टूटी साइकल।' हम लोगों का सारा दिन इन दो 'देवदूतों' के हमले से बचने की तिकड़में सोचने, भागने-छिपने, पेड़ों-खपरेलोंपर जा चढ़ने या पेट-दर्द, बुखार पैदा करने में जाता है। उर्दू-हिन्दी पढ़ने से ज्यादा जरूरी काम करने होते हैं-पतंग, लट्टू, गेंद, गिल्ली-डंडा, बढ़ईगिरी या किले बनाने के

केशी महाराज शाम को बस्ती की रामलीला में लक्ष्मण या परशुराम बनता है। लेकिन वहाँ तभी जा पाएगा जब यहाँ का काम खत्म कर लेगा। तीन बजे उसे जगाने से लेकर उसके साथ सफाई, पानी-छिड़काव और खाना बनाना और तब उसी के साथ रामलीला जाकर मेकअप में मदद करना या दरी पर सबसे सम्माननीय स्थान पर बैठना-'डाक्साब के बच्चे हैं!'

पढ़ाई की व्यवस्था या सामान्य वातावरण अच्छा नहीं है, इसीलिए हम दो भाइयों को पिताजी ने भेज दिया है चाचाजी के पास-मवाना कलाँ, जिला मेरठ। यहाँ ज्यादा अनुशासित माहौल है-कचहरी से लौटकर चाचाजी रोज देखते हैं कि हमने स्कूल या घर पर क्या पढ़ा है

हवन, गायत्री और प्रभातफेरियों का भी जोर है। लेकिन उस दिन स्कूल के मैदान में झड़प हो गई, बलवीर ने टखने में हॉकी मारी तो मैंने पलटकर कंधे का निशाना बनाया। घर आकर बताया, नया जूता पहनने से टखने में मोच आ गई है। सिंकाई, मालिश और आधे डॉक्टरों, आधे देसी इलाजों के बीच पाँव फूलता चला जाता है। महीने भर से कोई सुधार नहीं

पिताजी आते हैं और मथुरा ले जाते हैं। सिविल सर्जन व्यक्तिगत दिलचस्पी ले रहा है। एक्सरे, दवाएँ, क्लोरोफार्म, ऑपरेशन। घुटने से टखने तक की पूरी हड्डी गल गई है, इसलिए निकालने के सिवा कोई चारा नहीं है। सख्त-गुस्सैल और जिद्दी पिताजी बार-बार आँखों पर रुमाल रख लेते हैं, फिर एक ओर ऑपरेशन...

और फिर वही कम्पाउंडर, वही खेत-बस्ती, वे ही लोग। ड्रेसिंग, पट्टियाँ, सिंकाई और लकड़ी के चौखटे में जकड़ी टाँग...सारे दिन मन बहलाने के लिए पिताजी ताश, कैरम, शतरंज, चौपड़ खेलते हैं। मथुरा से नई-नई चीजें लाते हैं- लूडो, साँप सीढ़ी, पतंगें, आतिशबाजी या दवाओं के बड़े-बड़े बक्से

इन्हें खुलवाने, घास-फूस हटाने और एक-एक दवा या औजार को देखने में हमें बड़ा मजा आता है। शाम को आता है चाटवाला भिक्खी। हम लोग जुट पड़ते हैं। खोमचा खत्म। 'इन सब लोगों को खिला दो पैसे हमसे ले जाना।'
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