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मंच अपना
जीवन के रंगमंच से
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बचपन की यादों में उड़ते रूई के फाहे
जब वे हँसते तो हमारे घर पर छाए दुःख रूई के फाहों में बदलकर उड़ने लगते। कभी-कभी मुझे लगता हमारे घर की दीवारों और छतों पर रूई के फाहे चिपके हुए हैं। लेकिन वे हमें दिखाई नहीं देते। हमें आश्चर्य तब होता जब दीवाली-दशहरे के ....
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व्यंग्य
आओ खेलें सर्वे-सर्वे
साहित्य में सहकारिता
जी हाँ, मैं हूँ मिस्टर चिटचोर
जल संकट में काव्यधारा की नमी
तुम छुपे हो कहाँ, हे ग्राहक!
मोबाइली संज्ञाओं से सावधान
नल, जल और बल की महत्ता
चुनाव ड्यूटी : एक लघु शोध
 
और भी
कथा-सागर
कथा-सागर
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एक शहर हुआ करता था
इस नगरी में अब कोई नहीं रहता-न कोई मानुस, न चौपाया और न ही परिंदा। सड़कें हैं पर वीरान हैं ...
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वेबदुनिया में और भी
लघुकथा
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अव्यक्त खामोशी
आज फिर सुबह से ही घर को युद्ध का मैदान बना दिया है सुनील के पापा ने। हर बात को चीख-चीखकर कह रहे हैं। अपने नित्य कार्यों में उलझी जया चुपचाप सुनती जा रही है। दफ्तर जाने के समय तक सुनना ही पड़ेगा, आदत जो हो गई है।
जो दमदार होगा, वही टिकेगा !
हर शख़्स तड़पता हुआ मिला
मुस्लिम मन को समझने का प्रयास
तुझको दिन-रात याद करते हैं
जब तेरी याद मुझको आती है
नंगा सच : द्वन्द्व दर्शाती लघुकथाएँ