| | | | | | बचपन की यादों में उड़ते रूई के फाहे | | जब वे हँसते तो हमारे घर पर छाए दुःख रूई के फाहों में बदलकर उड़ने लगते। कभी-कभी मुझे लगता हमारे घर की दीवारों और छतों पर रूई के फाहे चिपके हुए हैं। लेकिन वे हमें दिखाई नहीं देते। हमें आश्चर्य तब होता जब दीवाली-दशहरे के .... | | | | | |
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| |  | | ND | | | | एक शहर हुआ करता था | | इस नगरी में अब कोई नहीं रहता-न कोई मानुस, न चौपाया और न ही परिंदा। सड़कें हैं पर वीरान हैं ... | | | | | |
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| | | | अव्यक्त खामोशी | | आज फिर सुबह से ही घर को युद्ध का मैदान बना दिया है सुनील के पापा ने। हर बात को चीख-चीखकर कह रहे हैं। अपने नित्य कार्यों में उलझी जया चुपचाप सुनती जा रही है। दफ्तर जाने के समय तक सुनना ही पड़ेगा, आदत जो हो गई है। | | | | |
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