कविवर डॉ. हरिवंशराय बच्चन का व्यक्तित्व व कृतित्व साकार हो जाता है। बच्चनजी का साहित्य पढ़ने से यह बात स्वतः ही सिद्ध हो जाती है। काव्य रचनाओं के साथ-साथ...
मीठे स्नेहमयी बोल सदैव पर्वत से शांत हो, आसमान से विराट हो, कलियों से मुस्कराते हो, भंवरों से गुनगुनाते हो या फिर झरने से चंचल हो, किन्तु कभी भी वज्र से कठोर न हों, तीर से नुकीले न हों, करेले से कड़वे न हों, सर्प से विषैले न हों। बोल न तो मिर्च से तीखे हों, न ही इमली से खट्टे, न तो जलते हुए हों, न ही तपते हुए। बोल ऐसे हों, जो सुनने वाले के लिए गुणकारी हों, न कि ऐसे कि सुनने के उपरांत रिश्तों के गुण-धर्म ही बदल दें!