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लोकतंत्र की उम्र है इक दिन जिस दिन वोटिंग होती है बाकी दिन तो राजतंत्र है जिसमें जनता रोती है लोकतंत्र को गढ़ने वाले मेहंदी बनकर रचते थे जन गण मन के अंग अंग में प्राणों जैसे बसते थे। अब लोक अलग और तंत्र अलग है दिन होता है केवल इक दिन रात पांच साल की होती है लोकतंत्र की उम्र है इक दिन जिस दिन वोटिंग होती है बाकी दिन तो राजतंत्र है जिसमें जनता रोती है....
प्रख्यात कवि और गीतकार गोपाल दास नीरज का फिल्मी सफर भले...
 
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