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लघुकथा : अनमोल तोहफा

अनमोल तोहफा
मुझे याद है, मैं आठ साल की थी, अपनी सहेलियों के साथ बगीचे में खेल रही थी तभी हमने एक आवाज सुनी- 'चाय के कप ले लो', 'चाय के कप ले लो'। एक छोटा लड़का छोटे-छोटे चाय पीने के स्टील के कप बेच रहा था।
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कितना अच्छा होता है एक-दूसरे को बिना जाने पास-पास होना और उस संगीत को सुनना जो धमनियों में बजता है,...उन रंगों में नहा जाना जो बहुत गहरे चढ़ते-उतरते हैं। शब्दों की खोज शुरु होते ही हम एक-दूसरे को खोने लगते हैं और उनके पकड़ में आते ही एक-दूसरे के हाथों से मछली की तरह फिसल जाते हैं।
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