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मंच अपना
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पुरुष है, पत्थर नहीं!
इंसान भावनाओं का पुतला है। तरह-तरह के उद्वेग, प्रतिक्रियाएँ, संवेग और संवेदनाएँ हमारे भीतर होती हैं। भीतर की ये हलचलें कई बार अभिव्यक्ति चाहती हैं। दबाने पर ये ज्वालामुखी भी बन सकती हैं और गलत समय पर गलत जगह फूटकर नुकसान भी पहुँचा सकती हैं। इसीलिए मानव समाज ने ऐसी परंपराएँ भी विकसित की हैं, जो भावनाओं को अभिव्यक्त करने का मौका देती हैं, उद्वेगों को खुलकर प्रकट होने का...
मुलाकात
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मीडिया में साहित्य नहीं बचा : डॉ. नामवर सिंह
'हिन्दी में आने वाले विदेशी प्रकाशक वास्तव में हिन्दी की जमीन को नहीं पकड़ पा रहे हैं और उनमें साम्राज्यवादी सोच का प्रभाव है।' यह बात हिन्दी के प्रख्यात आलोचक डॉ. नामवर सिंह ने कही है।
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काव्य-संसार
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क्यों तुम जाती हो!
सरकती है सिरहाने से धूप कि तुम जाती हो ये राह सिहरी-सी खड़ी देखती है तुम्हें कि तुम जाती हो यह पल अकेला है बहुत अकेला कि उतार दिया है तुमने उसे पुतलियों से उसे यह साँझ जो जाने को है अभी ठिठकी खड़ी है पीपल की पत्तियों के बीच देखती-सी कि तुम जाती हो... ये आ रही आवाज विकल-सी किसी मोर की उठ रही बीच जंगल से या मेरे भीतर से ही कहीं कि तुम जाती हो...
• रईसी की नई निशानी दाल • बनजारे हैं पहाड़ के बादल
• ग़ज़ल को ग़ज़ल ही रहने दो... • इब्न बतूता, पहन के जूता...
• क्यों नहीं है अब वह सब कुछ... • एक अप्रवासी मन की व्यथा