दुष्ट व्रण (पुराना घाव), नाड़ी व्रण या अस्थि व्रण के कारण रोगी का शरीर जर्जर हो जाता है और कमजोरी के कारण रोगी का शरीर ऑपरेशन करने के लायक भी नहीं रह जाता। इस रोग के पूय-कीटाणु रक्त में मिलकर पूरे शरीर में घूम जाते हैं और एक जगह पर हड्डी सड़ने के बाद यहाँ के कीटाणु शरीर के दूसरे भाग में पहुँचकर वहाँ की हड्डी को सड़ाने लगते हैं। इन हालात में शीघ्र ही रोगी को कचनार का सेवन शुरू करा दिया जाए तो यह व्याधि दूर हो जाती है। ऐसी अत्यंत गुणकारी वनस्पति के चिकित्सा संबंधी कुछ घरेलू उपयोग प्रस्तुत हैं।
गलगण्ड : इसे कण्ठमाला भी कहते हैं, जिसमें गले में गांठ बन जाती है। गांठ को गलाने के लिए कचनार का काढ़ा बनाकर इसमें 3 ग्राम | अपच और गैस के कारण पेट में अफारा हो जाता है। कचनार की छाल का काढ़ा 4 चम्मच और आधा चम्मच पिसी अजवायन मिलाकर लेने से अफारा दूर हो जाता है |
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गूगल और 1 ग्राम शिलाजीत डालकर इसमें 3 ग्राम सौंठ का चूर्ण डालकर सुबह-शाम 4-4 चम्मच पीएं और ऊपर से एक कप चावल का धोवन पिएँ। यह प्रयोग 45 दिन तक करें। यदि गांठ पक गई हो तो कचनार, चित्रक और अड़ूसे की जड़, पानी के साथ पत्थर पर घिसकर लेप करें। इस लेप को गांठ पर लेप करें, इस प्रयोग से गांठ फूट जाती है। फूट जाए तो यह लेप लगाना बंद कर दें। इसकी जगह कचनार और अमरकंद का लेप तैयार कर लगाएँ।
कण्ठमाला के लिए कांचनार गुग्गुल आयुर्वेद की प्रसिद्ध और उत्तम औषधि मानी जाती है। त्रिफला के काढ़े के साथ इस औषधि की 2- 2 गोली सुबह-शाम, एक वर्ष लेते रहें तो फिर गांठ पैदा होने की संभावना ही समाप्त हो जाएगी। कचनार या त्रिफला का काढ़ा बनाने की विधि यह है कि 10 ग्राम चूर्ण 2 कप पानी में डालकर उबालें। जब पानी आधा कप बचे तब छानकर ठंडा कर लें। काढ़ा तैयार है।
खूनी बवासीर : इस रोग के रोगी को कचनार की छाल का महीन पिसा-छना चूर्ण आधा-आध चम्मच (3-3 ग्राम) लेकर मख्खन में मिलाकर या एक गिलास छाछ के साथ, सुबह-शाम सेवन कराना चाहिए। इससे उदर शुद्धि होती है और बवासीर में खून गिरना बंद होता है।
रक्त पित्त : इस रोग में शरीर के किसी भी हिस्से से खून गिरने लगता है। इसे होमोरेजिक डिसीज कहते हैं। कचनार के फूलों की सब्जी खिलाने या सूखे फूलों का चूर्ण आधा-आधा चम्मच थोड़े से शहद में मिलाकर सुबह-शाम खिलाने से यह व्याधि नष्ट हो जाती है।
दाह (जलन) : कचनार की छाल का काढ़ा 4 चम्मच, आधा चम्मच पिसा जीरा और कपूर एक रत्ती मिलाकर सुबह-शाम लेने से विष प्रकोप, रक्त विकार या मद्यपान आदि से होने वाली जलन शांत हो जाती है। यह प्रयोग अम्ल पित्त (हायपर एसिडिटी) के कारण होने वाली जलन के लिए सेवन योग्य नहीं है।
अफारा : अपच और गैस के कारण पेट में अफारा हो जाता है। कचनार की छाल का काढ़ा 4 चम्मच और आधा चम्मच पिसी अजवायन मिलाकर लेने से अफारा दूर हो जाता है। कचनार को प्रमुख घटक द्रव्य का रूप में लेकर आयुर्वेद के कुछ उत्तम योग बनाए जाते हैं जैसे कांचनार गुग्गुल, कांचनादि क्वाथ, कांचन गुटिका, गुलकंद कांचनार, पंचनिम्बादि वटी, रक्त शोधांतक आदि। पाठक-पाठिकाओं की जानकारी के लिए कांचनार गुग्गुल का परिचय यहाँ प्रस्तुत कर रहे हैं।
कांचनार गुग्गुल : यह प्रसिद्ध और अत्यंत प्रभावकारी आयुर्वेदिक योग है, इसे घर पर भी बनाया जा सकता है। कचनार की छाल 1200 ग्राम लेकर मोटा-मोटा (जौकूट) कूट लें और 10 लीटर पानी में डालकर उबालें। जब पानी ढाई लीटर बचे, तब उतारकर छान लें और इसमें शुद्ध गुगल 800 ग्राम, त्रिकटु (सौंठ, पीपल, काली मिर्च) 120 ग्राम, वरुना (वरुण) की छाल 40 ग्राम तथा छोटी इलायची, दालचीनी और तेजपान 10-10 ग्राम चूर्ण करके डाल दें। इसकी 2-2 रत्ती की गोलियाँ बना लें। यों 2-2 गोली सुबह-शाम 4-4 त्रिफला क्वाथ के साथ सेवन करने से गांठ, कण्ठमाला, अपच, अर्बुद, व्रण, गुल्म, कुष्ठ, भगंदर आदि रोग दूर होते हैं। इसके साथ आरोग्यवर्द्धिनी विशेष नं. 1 की 2-2 गोली लेने से जल्दी आराम होता है। यह योग इसी नाम से, बना-बनाया, बाजार में मिलता है।
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