श्रीकृष्ण ने कम सेना के बावजूद इस तरह जिताया था पांडवों को युद्ध

श्रीकृष्ण की 1 अक्षौहिणी नारायणी सेना मिलाकर कौरवों के पास 11 अक्षौहिणी सेना थी तो पांडवों ने 7 अक्षौहिणी सेना एकत्रित कर ली थी। इस तरह सभी महारथियों की सेनाओं को मिलाकर कुल 45 लाख से ज्यादा लोगों ने इस में भाग लिया था।

कौरवों की सेना में एक से बढ़कर एक महारथी थे। भीष्म, द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, कर्ण, अश्वत्थामा, मद्रनरेश शल्य, भूरिश्र्वा, अलम्बुष, कृतवर्मा, कलिंगराज, श्रुतायुध, शकुनि, भगदत्त, जयद्रथ, विन्द-अनुविन्द, काम्बोजराज, सुदक्षिण, बृहद्वल, व उसके 99 भाई सहित अन्य हजारों यौद्धा थे।

पांडवों की ओर भीम, नकुल, सहदेव, अर्जुन, युधिष्टर, द्रौपदी के पांचों पुत्र, सात्यकि, उत्तमौजा, विराट, द्रुपद, धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, पाण्ड्यराज, घटोत्कच, शिखण्डी, युयुत्सु, कुन्तिभोज, उत्तमौजा, शैब्य और अनूपराज नील जैसे योद्ध थे।


कहने का मतलब यह कि सैन्य बल, शारीरिक आदि शक्ति में हर तरह से पांडवों से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और पराक्रमी थे लेकिन फिर भी वे हार गए। उनकी हार के कई कारण हो सकते हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण यह था कि कौरवों की ओर कृष्ण जैसा कोई भगवान नहीं था। और भगवान सिर्फ उधर ही होते हैं जिधर सत्य होता है। अब जानते हैं कि ने पांडवों को किस तरह जिताया, जबकि हर दिन युद्ध में पक्ष के हजारों सैनिक मारे जाते थे।


युद्ध की घोषणा से कहीं पहले ही श्री कृष्ण ने इस युद्ध में पांडवों की विजय सुनिश्चित करने के लिए अपनी रणनीति पर काम करने प्रारंभ कर दिया था। श्री कृष्ण चाहते थे कि युद्ध उनके अनुसार ही संचालित हो। इसीलिए उन्होंने सबसे पहले उन योद्धाओं को रास्ते से हटाना शुरू किया जो युद्ध में तबाही मचा सकते थे।


: भगवान कृष्ण यह भली-भांति जानते थे कि जब तक कर्ण के पास उसका कवच और कुंडल है तब तक उसे कोई नहीं मार सकता। ऐसे में की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं। तब श्रीकृष्ण ने देवराज इंद्र के साथ मिलकर एक योजना बनाई। इंद्र एक विप्र के वेश में कर्ण से दान मांगने पहुंच गए। दानवीर कर्ण ने कहा, मांगों क्या मांगते हो?

विप्र बने इंद्र ने कहा कि मैं जो मागूंगा वह तुम दे न सकोगे। कर्ण ने कहा कि इस दर से कभी कोई खाली नहीं गया है।...विप्र ने कहा तब फिर पहले आप संकल्प लें। कर्ण संकल्प ले लेता है। फिर विप्र बने इंद्र कर्ण से उनके कवच और कुंडल मांग लेते हैं। एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। कर्ण ने इन्द्र की आंखों में झांका और फिर दानवीर कर्ण ने बिना एक क्षण भी गंवाएं अपने कवच और कुंडल अपने शरीर से खंजर की सहायता से अलग किए और विप्र बने इंद्र को सौंप दिए।
इंद्र वह कवच और कुंडल लेकर तुरंत भाग लेते हैं। लेकिन आगे जाकर उनका रथ भूमि में धंस जाता है और आकाशवाणी होती है कि इंद्र तुमने छल किया है इसलिए तुम और तुम्हारा रथ इसी भूमि में धंसा रहेगा। तब इंद्र कहते हैं कि इससे मुक्ति का कोई उपाय। आकाशवाणी होती है कि तुम इसी वक्त जाओं और कर्ण को कुछ देकर आओ। इंद्र जाते हैं और कर्ण को अपना अमोघ अस्त्र देकर कहते हैं कि यह अस्त्र तुम एक बार किसी पर भी चला देना वह तुरंत ही मारा जाएगा। यह अस्त्र अचूक है। इसके कोई रोक नहीं पाएगा और यह खाली नहीं जाएगा। जिस पर भी चलाओगे उसकी मौत तय है। कर्ण उस अस्त्र को युद्ध में अर्जुन पर चलाने की सोच कर रख लेता है।
घटोत्कच : घटोत्कच एक ऐसा योद्ध था जो अकेले ही सभी कौरव सैनिकों को मारने की क्षमता रखता था। कृष्ण ये बात जानते थे। लेकिन तब फिर युद्ध करने का कोई मतलब ही नहीं रह जाता। फिर तो अकेले घटोत्कच को ही भेज देते नाहक इतनी सेना लगाने का क्या मतलब। लेकिन कृष्ण जानते थे कि कब किसी युद्ध में लगाने और कब किसे मरना है। जैसे शतरंज की चाल में कई देफे किसी पड़ी सफलता के लिए अपने ही प्यादे को मरने के लिए छोड़ देना होता है वैसे ही श्रीकृष्ण ने किया।
तब युद्ध में कौरव पक्ष ने बढ़त हासिल कर ली थी और चारों और पांडवों की सेना में हाहाकार मचा हुआ था तब श्रीकृष्ण ने घटोत्कच को युद्ध में उतार दिया। युद्ध में जब घटोत्कच ने कौरवों की सेना को कुचलना शुरू किया तो दुर्योधन घबरा गया और ऐसे में उसे समझ नहीं आ रहा था कि क्या करें। तब कृष्ण ने दुर्योधश्र के सामने कर्ण से कहा कि आपके पास तो अमोघ अस्त्र है जिसके प्रयोग से कोई बच नहीं सकता तो आप उसे क्यों नहीं चलाते?
कर्ण कहने लगा नहीं ये अस्त्र तो मैंने अर्जुन के लिए बचा कर रखा है। तब श्रीकृष्ण कहते हैं कि अर्जुन पर तो तुम तब चलाओंगे जब ये कौरव सेना बचेगी, ये दुर्योधन बचेगा। जब ये सभी घटोत्कच के हाथों मारे जाएंगे तो फिर उस अस्त्र के चलाने का क्या फायदा? दुर्योधन को ये बात समझ में आती है और वह कर्ण से अमोघ अस्त्र चलाने की जिद करने लगता है। कर्ण मजबूरन इंद्र द्वारा दिया गया वह अमोघ अस्त्र घटोत्कच के उपर चला देता है। इस तरह भगवान श्री कृष्ण अर्जुन को बचा लेते हैं।
जयद्रथ : युद्ध में जयद्रथ के कारण अकेला अभिमन्यु चक्रव्यूह में फंस गया था और दुर्योधन आदि योद्धाओं ने एक साथ मिलकर उसे मार दिया था। इस जघन्नय अपराध के बाद अर्जुन प्रण लेते हैं कि अगले दिन सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का वध नहीं कर पाया तो मैं स्वयं अग्नि समाधि ले लूंगा। इस प्रतिज्ञा से कौरवों में हर्ष व्याप्त हो जाता है और पांडवों में निराशा फैल जाती है।
कौरव किसी भी प्रकार से जयद्रथ को सूर्योस्त तक बचाने और छुपाने में लग जाते हैं। जब काफी समय तक अर्जुन जयद्रथ तक नहीं पहुंच पाया तो श्रीकृष्ण ने अपनी माया से सूर्य को कुछ देर के लिए छिपा दिया, जिससे ऐसा लगने लगा कि सूर्यास्त हो गया। सूर्यास्त समझकर जयद्रथ खुद ही अर्जुन के सामने हंसता हुआ घमंड से आ खड़ा होता है। तभी उसी समय सूर्य पुन: निकल आता है और अर्जुन तुरंत ही पलटकर जयद्रथ का वध कर देता है।
भीष्म : महाभारत के युद्ध में भीष्म पितामह कौरवों की तरफ से सेनापति थे। भीष्म घोर युद्ध करते हुए न केवल पांडवों की सेना के हजारों सैनिकों का संहार कर दिया बल्कि अर्जुन को घायल कर उनके रथ को भी जर्जर कर दिया था। ऐसे में श्रीकृष्ण को एक युक्ति समझ में आती है और कृष्ण के कहने पर पांडव भीष्म के सामने हाथ जोड़कर उनसे उनकी मृत्यु का उपाय पूछते हैं। भीष्म कुछ देर सोचने पर उपाय बता देते हैं।
दरअसल, भीष्म ने अपनी मृत्यु का रहस्य यह बताया था कि वे किसी नपुंसक व्यक्ति के समक्ष हथियार नहीं उठाएंगे। इसी दौरान उन्हें मारा जा सकता है। इस नीति के तरह युद्ध में भीष्म के सामने शिखंडी को उतारा जाता है और उसी दौरान भीष्म को अर्जुन तीरों से छेद देते हैं। वे कराहते हुए नीचे गिर पड़ते हैं और भीष्म बाणों की शरशय्या पर लेट जाते हैं।

द्रोण : भीष्म के शरशय्या पर लेटने के बाद अश्‍वत्थामा के पिता द्रोण सेनापति बनकर युद्ध में कोहराम मचा देते हैं। पिता पुत्र की जोड़ी मिलकर युद्ध में मौत का तांडव खेलते हैं। इससे पांडवों के खेमे में दहशत फैल जाती है। पांडवों की हार होते हुए देखकर श्रीकृष्ण युधिष्ठिर से भेद का सहारा लेने को कहते हैं। इस योजना के तहत युद्ध में यह बात फैला दी गई कि 'अश्वत्थामा मारा गया', लेकिन युधिष्‍ठिर झूठ बोलने को तैयार नहीं थे। तब अवंतिराज के अश्‍वत्थामा नामक हाथी का भीम द्वारा वध कर दिया गया। इसके बाद युद्ध में यह बात फैला दी गई कि 'अश्वत्थामा मारा गया'।
जब गुरु द्रोणाचार्य ने धर्मराज युधिष्ठिर से अश्वत्थामा के मारे जाने की सत्यता जानना चाही तो जवाब दिया- 'अश्वत्थामा मारा गया, परंतु हाथी।' श्रीकृष्ण ने उसी समय जोर से शंखनाद किया जिसके शोर के चलते गुरु द्रोणाचार्य आखिरी शब्द 'हाथी' नहीं सुन पाए और उन्होंने समझा मेरा पुत्र मारा गया। यह सुनकर उन्होंने शस्त्र त्याग दिए और युद्ध भूमि में आंखें बंद कर शोक में डूब गए। यही मौका था जबकि द्रोणाचार्य को निहत्था जानकर द्रौपदी के भाई धृष्टद्युम्न ने तलवार से उनका सिर काट डाला। यह सब कृष्ण की नीति के चलते हुआ, जिसकी बाद में बहुत आलोचना हुई।
कर्ण : कवच कुंडल उतर जाने के बाद, अमोघ अस्त्र नहीं होने के बावजूद कर्ण में अपार शक्तियां थी। युद्ध के सत्रहवें दिन शल्य को कर्ण का सारथी बनाया गया। इस दिन कर्ण भीम और युधिष्ठिर को हराकर कुंती को दिए वचन को स्मरण कर उनके प्राण नहीं लेता। बाद में वह अर्जुन से युद्ध करने लग जाता है। कर्ण तथा अर्जुन के मध्य भयंकर युद्ध होता है। तभी अचानक कर्ण के रथ का पहिया भूमी में धंस जाता है। इसी मौके का लाभ उठाने के लिए श्रीकृष्ण अर्जुन से तीर चलाने को कहते हैं। बड़े ही बेमन से अर्जुन असहाय अवस्था में कर्ण का वध कर देता है। इसके बाद कौरव अपना उत्साह हार बैठते हैं। उनका मनोबल टूट जाता है। फिर शल्य प्रधान सेनापति बनाए जाते हैं, परंतु उनको भी युधिष्ठिर दिन के अंत में मार देते हैं।

दुर्योधन:
यदि दुर्योधन का संपूर्ण शरीर वज्र के समान बन जाता तो फिर उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता था। दरअसल, दुर्योधन की माता गांधारी ने अपने पुत्र को अपने पास नग्न अवस्था में बुलाया था ताकि वह अपनी आंखों के तेज से अपने पुत्र का शरीर वज्र के समान कठोर कर दें। माता की आज्ञा का पालन करने के लिए दुर्योधन भी नग्न अवस्था में ही जा रहा था, तभी रास्ते में श्री कृष्ण ने दुर्योधन को रोककर कहा कि इस अवस्था में माता के सामने जाओगे तो तुम्हें शर्म नहीं आएगी? क्या यह पाप नहीं होगा?

यह सुनकर दुर्योधन ने अपने पेट के नीचे जांघ वाले हिस्से पर केले का पत्ता लपेट लिया और इसी अवस्था में गांधारी के सामने पहुंच गया। गांधारी ने अपनी आंखों पर बंधी पट्टी खोलकर दुर्योधन के शरीर पर दिव्य दृष्टि डाली। इस दिव्य दृष्टि के प्रभाव से दुर्योधन की जांघ के अलावा पूरा शरीर लोहे के समान हो गया। युद्ध में भीम ने दुर्योधन की जांघ उखाड़ कर फेंक दी थी जिसके चलते उसकी मृत्यु हो गई थी।


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