आखिर क्या है 'हिन्दू आतंकवाद' का सच और क्यों साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर को जाना पड़ा था जेल?

Last Updated: शनिवार, 20 अप्रैल 2019 (12:51 IST)
आमतौर पर यही कहने-सुनने में आता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, लेकिन दूसरी ओर राजनीतिक दलों के नेता अपनी अनुकूलता के अनुसार और इस्लामी आतंकवादी जैसे शब्दों का खुलकर प्रयोग करते हैं। इसी तरह हिन्दू धर्म को भी भगवा आतंकवाद या हिन्दू आतंकवाद से जोड़ा जाने लगा। भगवा आतंकवाद शब्द का सबसे पहला प्रयोग फ्रंटलाइन पत्रिका ने 2002 के
गुजरात दंगों के संदर्भ में किया था। महात्मा गांधी की हत्या को भी हिन्दुत्व की विचारधारा से प्रेरित बताया जाता है।

क्या है हिन्दू आतंकवाद : कथित हिन्दू आतंकवाद या भगवा आतंकवाद का शब्द का सबसे अधिक प्रयोग 29 सितंबर 2008 में हुए मालेगांव विस्फोट के बाद किया गया। इस मामले में हिन्दू संगठनों से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया गया था। 18 फरवरी 2007 को समझौता एक्सप्रेस में हुए विस्फोट को भी हिन्दू आतंकवाद से ही जोड़ा गया था। इस धमाके में करीब 68 लोगों की मौत हुई थी। इस मामले में स्वामी असीमानंद और कर्नल श्रीकांत पुरोहित को भी आरोपी बनाया गया था।

ऐसा माना जाता है कि सबसे पहले भगवा आतंकवाद शब्द का प्रयोग कथित तौर पर एनसीपी के प्रमुख शरद पवार ने किया था। कुछ लोगों ने अयोध्या में विवादित बाबरी ढांचे के विध्वंस को भी हिन्दू आतंकवाद की संज्ञा दी थी। पूर्व केंद्रीय गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने तो यहां तक कहा था कि जांच रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा पर आतंकवादी ट्रेनिंग कैंप चलाने के आरोप हैं। मध्यप्रदेश के मुख्‍यमंत्री दिग्विजयसिंह पर भी हिन्दू आतंकवाद और संघ समर्थित आतंकवाद जैसे शब्दों का प्रयोग करने के आरोप हैं।

कौन हैं साध्वी प्रज्ञा : 29 सितंबर 2008 को महाराष्ट्र के मालेगांव में एक बाइक पर लगे दो बम फटने की वजह से 7 लोग मारे गए थे और 100 से ज्यादा लोग घायल हुए थे। इस मामले में पुलिस ने कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया था। जांच में सामने आया था कि विस्फोट में जिस बाइक का इस्तेमाल किया गया था वह प्रज्ञा ठाकुर के नाम से थी। हालांकि साध्वी ने दावा किया कि इस बाइक को उन्होंने 2004 में ही बेच दिया था। इस मामले में नाम आने के बाद ही साध्वी प्रज्ञा ठाकुर सुर्खियों में आई थीं। 2017 में साध्वी प्रज्ञा को बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत मिली थी।

साध्वी प्रज्ञा मूलत: भिंड जिले के लहार की रहने वाली हैं। उनके पिता डॉ. चंद्रपालसिंह कुशवाह पेशे से आयुर्वेदिक डॉक्टर थे। पिता राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े थे। यही कारण था कि उनका भी सहज ही संघ से जुड़ाव हो गया। संघ की महिला विंग राष्ट्रसेविका समिति और विहिप (दुर्गावाहिनी) से भी वे जुड़ी रहीं। बाद में उन्होंने संन्यास ले लिया।

कुंभ में नया अखाड़ा बनाया : भोपाल में भाजपा की छात्र इकाई अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से भी जुड़ी रहीं। साल 2002 में प्रज्ञा ठाकुर ने 'जय वंदे मातरम जन कल्याण समिति' की शुरुआत की। स्वामी अवधेशानंद गिरी से प्रभावित होकर प्रज्ञा ने संन्यास का निर्णय किया। वर्ष 2019 में प्रयागराज कुंभ (अर्धकुंभ) के अवसर पर उन्हें 'भारत भक्ति अखाड़े' का आचार्य महामंडलेश्वर घोषित किया गया था। हालांकि अखाड़ा परिषद ने उनके अखाड़े को मान्यता नहीं दी। अब वे 'महामंडलेश्वर स्वामी पूर्णचेतनानंद गिरी' के नाम से जानी जाती हैं।
संघ नेता की हत्या में आया नाम : 29 सिंतबर 2007 में देवास के आरएसएस नेता सुनील जोशी की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस वारदात में साध्वी प्रज्ञा समेत अन्य 7 लोगों के नाम शामिल थे। हालांकि साल 2017 में मध्य प्रदेश की देवास कोर्ट में इस हत्यकांड में साध्वी प्रज्ञा को बरी कर दिया था।

जेल में गुजारे 9 साल : मालेगांव बम विस्फोट कांड को लेकर साध्वी प्रज्ञा के ऊपर लगे मकोका को कोर्ट ने बाद में हटा दिया था, लेकिन उन पर गैर कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा चलाया गया। साध्वी को करीब 9 साल जेल में बिताने पड़े। हालांकि बाद में उन्हें जमानत मिल गई। साध्वी ने तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदंबरम पर उन्हें झूठ केस में फंसाने का आरोप लगाया था।
इस तरह मिली जमानत : मालेगांव मामले में महाराष्ट्र पुलिस ने कर्नल पुरोहित और साध्वी प्रज्ञा समेत 14 लोगों को आरोपी बनाया था। 2017 में साध्वी प्रज्ञा को बॉम्बे हाईकोर्ट से जमानत मिली थी। कोर्ट में साध्वी ने बताया कि वे ब्रेस्ट कैंसर से पीड़ित हैं। उन्होंने बताया कि करीब 8 साल तक जेल में रहने के दौरान वे इस बीमारी की शिकार हुईं। उस वक्त जो मेडिकल रिपोर्ट दी गई थी, उसमें
दावा किया गया था कि वो बिना सहारे के चल भी नहीं सकती हैं। साथ ही साध्वी के खिलाफ पर्याप्त सबूत भी नहीं मिले थे। यही कारण था कि उन्हें जमानत मिलने में आसानी हुई।

अब भोपाल से भाजपा उम्मीदवार : वर्तमान में प्रज्ञा ठाकुर इसलिए सुर्खियों में हैं कि उन्हें भाजपा ने मध्यप्रदेश की भोपाल संसदीय सीट से उम्मीदवार बनाया है। प्रज्ञा के सामने राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता दिग्विजयसिंह हैं। प्रज्ञा को जिस दिन भाजपा का टिकट मिला था, उसी दिन वे पार्टी में शामिल हुई थीं।

दिग्विजय कनेक्शन : भाजपा ने साध्वी प्रज्ञा को भोपाल से दिग्विजय के खिलाफ मैदान में उतारकर हिन्दुत्व का कार्ड खेला है। दरअसल, दिग्विजय भगवा आतंकवाद, हिन्दू आतंकवाद और संघ समर्थित आतंकवाद जैसे मुद्दों को पूरी मुखरता के साथ उठाते रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने दिग्विजय को उन्हीं के 'हथियार' से उन्हें घेरने की कोशिश की है।

यातना की कहानी : भाजपा में शामिल होने के बाद साध्वी ने खुद पर हुए 'अत्याचारों' की कहानी बताते हुए कहा कि उन्हें गैरकानूनी तरीके से 13 दिन तक रखा गया। पहले ही दिन मुझे बुलाया गया। बिना पूछे ही चौड़े बेल्ट से पीटना शुरू कर दिया। बेल्ट पर लकड़ी की मूठ लगी हुई थी। जब बेल्ट हाथ पर पड़ता तो पूरा हाथ सूज जाता था। ऐसा लगता था कि मानो दूसरा बेल्ट पड़ते ही हाथ कट जाएगा।

आंसुओं को पोंछते हुए साध्वी प्रज्ञा ने अपनी कहानी जारी रखते हुए कहा कि बेल्ट की मार से पूरा नर्वस सिस्टम ढीला पड़ जाता था, सुन्न पड़ जाता था। मैं दिन-रात इस पीड़ा को सहन करती थी। उन्होंने कहा कि मैं अपनी पीड़ा नहीं बता रही हूं सिर्फ इतना बता रही हूं कि फिर कोई बहन इस तरह की पीड़ा से न गुजरे। असहनीय है मेरे लिए यह सब कुछ कहना।


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