हिन्दी व्यंग्य : ठेकेदारी


राकेश शर्मा 
ठेकेदारी एक व्यवसाय है। परंपरागत रूप से जिसका मतलब कुछ न कुछ निर्माण करने वाली संस्था या व्यक्ति या व्यक्ति समूह से है, जो किसी कार्य को करने के लिए एक निश्चित प्रक्रिया के तहत अधिकृत किए जाते हैं जिसके बदले में वे पारिश्रमिक प्राप्त करते हैं। वर्तमान समय में यह ठेकेदारी स्वैच्छिक हो गई है। अब इसमें लाभ का कोई ज्यादा सरोकार नहीं रह गया है और बस अब यह शौक बन गया है।
 


आप जिधर देखें आपको हर जगह स्वैच्छिक मिल जाएंगे जिनमें प्रमुख है धर्म के ठेकेदार, वोटों के ठेकेदार, हिन्दुओं के ठेकेदार, मुस्लिमों के ठेकेदार इत्यादि। पर इनमें जो सर्वोपरि हैं वे हैं खबरों के ठेकेदार। ये कोई और नहीं टीवी पर आने वाले प्रतिष्ठित ही हैं। इन ठेकेदारों की तो बात ही निराली है। ये चाहे जिसकी खबरों का ठेका ले लेते हैं जैसे अभी।


अधिकतर चैनलों ने यूपी की नई-नवेली सरकार की खबरों का ठेका ऐसा लिया हुआ है कि बस पूछिए मत। दिन-रात, धूप-ताप की चिंता किए बगैर खबर आप तक पहुंचाए जा रहे हैं। अब जब ठेका लिया है खुद से तो छुड़ाए कौन? काम पूरा हो गया ये बताए कौन? हद तो तब हो जाती है, जब इन्हीं खबरों के ठेके के ऊपर बहस का ठेका भी शुरू होता है।

शाम को प्राइम टाइम नामक क्लब में ठेकेदारों के सभी रूप आपको यहां देखने को मिलते हैं। अब ठेका खुद ने लिया माल भी खुद लगाना है, गुणवत्ता की कोई चिंता नहीं है तो बस माल लगाए जाओ और 'ठेका', 'ठेका' गाए जाओ।
इन्हें पता है कि यूपी में मसाला अच्छा बनता है, तो बिल्डिंग भी अच्छी बन जाएगी। अब दूसरे राज्य जैसे मेघालय, मिजोरम, केरल, असम, अरुणाचल, सिक्किम, झारखंड जहां मिट्टी के सिवा कुछ नहीं है, वहां कौन जाए ठेकेदारी करने? और जैसा कि आप जानते हैं कि खबरों की ठेकेदारी बिना मसाले के कतई न हो पाएगी, तो ठेकेदारी का धंधा यूपी में ही फलेगा-फूलेगा।

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